मूर्ख
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सामने ताजमहल खड़ा था। शाहजहां का शाहाना शाहकार। मैं ठगा सा उसकी ओर बढ़ रहा था। Overwhelmed. आत्मविस्मृत! इसी अवस्था में चलते चलते मैं सीढ़ियां चढ़कर विशाल चबूतरे तक पहुंच गया, जिसके बाद ताज के भीतर प्रवेश करते हैं। मेरी मंत्रमुग्ध सी आंखें प्यार की चाशनी में डूबे शिल्प को देर तक चखती रहीं।
मेरी trance की अवस्था तब टूटी जब कानों में मेरे कानपुर की ग्रामीण बोली सुनाई पड़ी। मातृभाषा का प्यार ताज के सौंदर्य पर भारी पड़ा। और, मैं कनपुरिया ज़बान बोलने वालों की तरफ देखने लगा।
उन्हें साफ सुन सकता था। मेरे बगल में ही खड़े थे वे दोनों। पति और पत्नी। सांवले रंग के मजदूर जैसे दिखने वाले आदमी ने लंबा मटमैला सा कुर्ता और अलीगढ़ कट पाजामा पहन रखा था। पायंचे पंजों से छह इंच ऊपर। और, हां! सर पर स्कल कैप भी। स्त्री काले, अपारगम्य बुर्के में थी। सो, चेहरा नहीं देख सकता था लेकिन, उसके सलवार के पायंचे दिख रहे थे। लाल। लेकिन मैल से चीकट।
मेरे कान बातचीत सुनने लगे।
"बेगम, देखती हौ न?"
"का?"
"यहै, ताजमहेल..."
"तौ का? एहमां का है? बिल्डिंगै तौ आय। टिकस मां बेफालतू पइसा फूंकि डारेव.. अउक्का! रोटिन का लाले पड़े हैं अउर ई देखावैं चले हैं ताजमहेल!!"
बीवी की धिक्कार का इस 32-33 साल के व्यक्ति पर कोई असर नहीं पड़ा। वह बोलता गया........
"....का जाहिलन ते पाला पड़ा है! चमन उर्दू के बाद दूसरी किताब तो पढ़ी न होगी!! अरे, गंवार थोड़ा इतिहास भी जानो। ये ताजमहल अपने बाश्शा ने बनवाया था। अपन राजा, अपन सुलतान। इतना तो जानती ही होगी कि शाहजहां मुसलमान थे। अपनी तरह। तब मुलुक मां अपनै राजपाट रहै। मुसलमानन केर! कुछ समझ मां आवा?
" हां। कि शाहजहां तुम्हारे नगड़दादा थे!!!"
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( की मूर्खता को हाईलाइट करना था। बस।)
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