स्वर्ण वसंत मालती खाया करो
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"कपड़े तो बड़े कंटाप झाड़े हो गुरु! नील, टिनोपाल, कलफ...सब टिंच!! लेकिन मुंह काहे लटकाए हो? कोउ कहत तो कि बिलाइत गे रहौ! आँय?"
"चुप रहो, भोपट। यह जेटलैग है। पर तुम क्या जानो। पैसेंजर ट्रेन में चलने वाला हवाई यात्रा के बारे में क्या समझेगा..."
"सही कहत हौ। कबहूं उड़ै॑ केर जरुरतै न भै हमका। डेर लागत है कि कहूं गिरि गेन तौ का हुई!? लेकिन यो जेटलैग का होत है?"
"समझ लो कि लंबी यात्रा की थकान।"
"यो का कहत हौ! पहिले तौ तुम थकतै न रहौ। लेकिन का करिहौ... उमिरौ तौ हुइ गे है। हमते छैसात साल बड़ेहे हुइहौ। अब एक काम करौ। बैदराज ते स्वर्ण वसंत मालती, स्वर्ण वसंत कुसुमाकर, अश्वगंधारिष्ट लइ के खाब सुरू करि देव। थोड़ी सिलाजीतौ। बहुत थोड़ी। तुमका नुस्कानौ करि सकति है।"
"अच्छा बस करो। जिसे देखो ज्ञान पेले पड़ा है। विलायत में भी तुम्हारी तरह ज्ञान पेले पड़े थे।"
"यो का? उलटे बांस बरेली को! विश्वगुरुहू का ज्ञान दें लाग!? सारेन का हुलकी चबांय..."
"चने के झाड़ पर मत चढ़ाओ। मैं विश्वगुरु नहीं। विश्वगुरु तो हमारा देश है। भारत है।"
"हमरे खातिर तौ तुमहीं भारत। तुमहीं महाभारत। वइसे हुन भा का? तुमते का कहेन गोरवा?"
"अरे वही...लोकतंत्र, सहिष्णुता और गांधी के बारे में ज्ञान पेल रहे थे। अब बताओ जिनके यहां कुछ सौ साल पहले लोकतंत्र आया वे हमको बता रहे थे। अरे, तुम्हारे ईसा मसीह से सैकड़ों साल पहले से है लोकतंत्र हमारे यहां। पूरी दुनिया में कत्ल ओ गारत करने वाले सहिष्णुता सिखा रहे थे। और गांधी का तो ऐसा इस्तेमाल करते हैं कि वे कोई डंडा हों। अभी जॉर्ज फ्लॉयड कांड हुआ था। बेचारा आय कांट ब्रीद कह के मर गया। कहीं ऐसा होता है हमारे यहां? बताओ.."
"कत्तई, नहीं। हम ब्वालहें नहीं देतेन। लेकिन तुम यो बताव कि तुम इत्ता सुनिकै चुप्पचाप लौटि कइसे आएव?"
"तो क्या करता?"
"मुंहतोड़ जवाब देतेव..घर मा घुसि के मरितेव।"
"क्या करता उन्हीं के घर में तो बैठा था।"
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