Monday, May 2, 2022

भारत की भाषा

 भारत की भाषा

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जिस दिन से शाह जी ने सबसे हिंदी बोलने को कहा है,  मैं बेहद खुश हूं। सुना है कि  मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और त्रिवेंद्रम के बड़े बड़े सेठों ने हिंदी सीखनी शुरू कर दी है ताकि भइया-लैंड से जाने वाले हम मजदूरों के साथ वे अच्छा तादात्म्य स्थापित कर सकें। मुंबई में तो शिवसेना और मनसे वालों ने वीटी स्टेशन पर हिंदी में बड़े बड़े पोस्टर अभी से लगा दिए हैं: केसरिया बालम पधारो म्हारे देश।


यह तो हुई थोड़ी सी चुहलबाज़ी। आइए, अब मुद्दे पर आते हैं। हमारी कनपुरिया ज़बान में एक कहावत है: धरे-बांधे बजारैं नहीं लगतीं। मतलब आप किसी जगह ज़बरदस्ती बाज़ार नहीं स्थापित कर सकते। अगर यह संभव होता तो आज बांग्लादेश वाले उर्दू बोल रहे होते और उनके देश का नाम पाकिस्तान होता। 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। इसका रिश्ता बांग्लादेश से है। बांग्ला के लिए जान न्योछावर करने वालों की याद में वहां शहीद मीनार भी है।

मैं डरा नहीं रहा। भारत एक सहिष्णु देश है। लेकिन इसके बावजूद तमिल माता का झंडा तो लहरा ही दिया गया। और, यह काम भी उसने किया जिसने 'अम्मा तुझे सलाम' गाया है। खुशी की बात यह कि किसी ने अभी तक हिंदी माता गढ़ने की कोशिश नहीं की है।


आज के नेताओं के साथ दिक्कत यह है कि उन्हें जनसामान्य के बारे में कुछ पता ही नहीं। अरे भइया, कुछ अड़ियल मूर्खों को छोड़ दें तो पूरा हिंदुस्तान आपस की बातचीत में सिर्फ दो भाषाएं बोल रहा है। हिंदी, जिसे बहुसंख्यक गरीब बोलते हैं। और, अंग्रेजी, जिसे अल्पसंख्यक भद्रलोक बोलता है। हिंदुस्तान हिंदी बोल रहा है। यहां तक कि दक्षिण भारत के दो भिन्न प्रदेशों के अनपढ़ एक दूसरे से इंटरएक्ट करते हैं तो वे बिना किसी शर्म के टूटीफूटी हिंदी से ही काम चलाते हैं। एक बार त्रिवेंद्रम में मैंने जब अंग्रेजी में रास्ता पूछा तो बताने वाले ने हिंदी में जवाब दिया था। यह कहते हुए कि उसकी अंग्रेजी कमज़ोर है।


अभी एक महीने पहले मैं 45 साल बाद शिलांग गया था।  पूरा शिलांग हिंदी बोलता मिला। 45 साल पहले टैक्सी वालों, सब्ज़ी वालियों और ट्रैफिक पुलिस वालों तक से अंग्रेजी में बात करनी पड़ती थी। तब दो महीने रहा था और अंग्रेजी बोलते बोलते मुंह टेढ़ा हो गया था। 

इस बार बात अलग थी। मेरा ड्राइवर संगमा था तो मेघालय मूल का लेकिन वह खासी नहीं असमिया और हिंदी बोलता था।

शाह जी, आपको पता ही नहीं कि हिंदुस्तान बदल रहा है। मसलन, मेरी भांजी के किशोर वय बच्चे हिंदी और अंग्रेजी के अलावा मलयालम, कन्नड़ और तेलुगु भी बोल लेते हैं। यह तो हुई उच्च वर्ग की बात। अब बताता हूं निम्न वर्ग की बात। कुछ साल पहले मैं मुंबई से कानपुर आ रहा था। ट्रेन से। मेरे स्लीपर कोच में एक मजदूर टाइप दिखने वाला आदिवासी समूह भी था। वे मूलरूप से आंध्र और तमिलनाडु सीमा क्षेत्र के रहने वाले थे। वे मेटल्स के काम के एक्सपर्ट कारीगर थे और कोलकाता, मुंबई जैसे शहरों में काम करते थे। इस बार वे काम करने सागर जा रहे थे। वे लोग तमिल, तेलुगु, हिंदी, मराठी और बांग्ला बोल लेते थे। उनके कुनबे में बहुएं भी भिन्न भिन्न प्रदेशों की थीं।


मेरे कहने का मतलब यह कि अगर लोग नफरत की जगह प्रेम करें तो भाषा की दिक्कत खत्म हो जाती है। ऊपर के उदाहरण में मेरी भांजी को लें। इस कान्यकुब्ज ब्राह्मण लड़की की शादी एक मलयाली से हुई है। और, मेरे सहयात्री ट्राइबल्स ने भी कई प्रांतों में शादियां की हैं।


क्या सरकार ऐसे किसी इंसेंटिव का ऐलान कर सकती है जिसमे दूसरे प्रांतों में शादी वालों को दस बीस लाख रुपए देने की व्यवस्था हो? खर्चा तो आएगा लेकिन अगर यह योजना सफल हुई तो एक भारत नेक भारत का सपना पूरा होने में दो तीन दशक से ज्यादा न लगेंगे।


एक काम और कर सकते है शाह जी। आईएएस और प्रांतों की पीसीएस परीक्षाओं के लिए मातृभाषा के अलावा दो या तीन भाषाओं में पारंगतता अनिवार्य कर दें।


हिंदी प्रसार का एक तरीका नेता जी सुभाष चंद्र बोस का भी है। सिंपल। देशी लिपियों का मोह छोड़िए और भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि प्रदान कर दीजिए। ऐसा करने से हिंदी बर्मा से लेकर अफगानिस्तान तक में फेल जाएगी। इसका एक साइड इफेक्ट यह भी होगा कि  उर्दू खत्म हो जाएगी। वह हिंदी में घुस जाएगी और कालांतर में हिन्दुस्तानी कहाएगी।


वैसे हिंदी को देश ही नहीं विदेशों तक में स्थापित करने का एक और तरीका जो आसान भी है और जो प्रधानमंत्री का सपना भी है। वह है पांच ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी का। आप गोबर पट्टी में 5 ट्रिलियन इकॉनमी  ला दीजिए। फिर देखिए। हिंदी विरोधी तमिल, भद्र बंगाली और तमाम नंबूदिरी ब्राह्मण हिंदी सीख सीख कर उत्तर भारत में आबाद हो जाएंगे।

शाह जी, मैंने अपनी क्षुद्र बुद्धि के मुताबिक आपको विकल्प बताए हैं। अब आप जैसा चाहें। वैसे मुझे 5 ट्रिलियन इकॉनमी की बात बेस्ट लगती है। ऐसा हुआ तो तमाम अंग्रेजवे भी हिंदी सीख सीख कर भारत के एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंजों की लाइन लगा देंगे। बाकी आप समझदार हैं।

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