दुःस्वप्न
.........
*अजय शुक्ल*
......गमक रहा है
विभिन्न सुगंधों से भरे
रंग बिरंगे फूलों का एक बगीचा
तोड़ रहा है एक वानर
फूलों की पंखुड़ियां
एक एक कर
जमा कर रहा है
कोमल पुष्प दलों को
चक्षुहीन ऐनक के चित्र से सजे
कचरे के डिब्बे में
हर पंखुड़ी को तोड़कर
चीखता है वह ज़ोर से...
"...सब पंखुड़ियों को
गोंद से चिपकाऊंगा, और
एक विराट
दुनिया का सबसे बड़ा
फूल मैं बनाऊंगा, फिर
लेकर पेंट ब्रश
उस पर पोतूंगा
अपने मन का रंग, और
अंत में फूल पर बना दूंगा
अपना चित्र".....
अभी अभी, मुंह अंधेरे
टूटा है यह दुःस्वप्न, और
एक गिलास पानी पीकर
मैंने रजाई तान ली है
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