व्यंग्य
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भीषण सर्दी की कठिन रात। शहर में कोरोना कर्फ्यू लागू है। आदमी तो दूर, भूत प्रेत तक रजाई ताने धुंधुआ रहे हैं!! कूकुर भौंकना-भागना भूल कर हलवइये की भट्ठी के बगल में घोड़े बेच कर सो रहे हैं। डीएम, सीएम, पीएम सो रहे हैं...... मेढक सो रहे हैं... सांप सो रहे हैं...चीटियां सो रही हैं। मच्छर सो रहे हैं। परमात्मा सो रहा है। शायद कोरोना भी सो रहा है।
.....लेकिन, महात्मा गांधी मार्ग के पुलिस नाके पर ड्यूटी पर तैनात सिपाही जग रहे हैं। और, पूरी सृष्टि को गालियां दे रहे हैं।
"का हो यादव जी" एक सिपाही दूसरे से कहता है, "मान लो यहीं बैठे बैठे हम सब अचानक हार्ट अटैक से मर जाएं!? तब का हुई?"
"हुई का, पूरी धरती मा कोविड फइल जई...सारा सिस्टम फेल हुइ जई...दुनिया खत्म हो जाएगी" दूसरा ठहाका मारकर हंसता है।"
"मल्लब, जिस कोरोना को महारानी एलिजाबेथ न रोक पाईं, जिंग पिंग न रोक पाए, ट्रंप न रोक पाए, शक्तिमान न रोक पाए...उसे अब हम रोकेंगे! क्यों सचान?" तीसरा सिपाही माथे पर हाथ मारकर अपनी किस्मत पर तंज करता है, "वा भई वाह!"
"स्साली चवन्नी की भी वसूली न हो पाएगी रात भर में। कोई बिना हेल्मेट वाला भी न मिलेगा" सचान अपने श्रम की निरर्थकता पर मायूसी जताता है।
"बाकी सब तो ठीक है लेकिन.." एक सिपाही अपना डर जताता है, "..मान लो, कोई कर्फ्यू तोड़ने वाला मिल जाए और खुदा न ख्वास्ता वह कोरोना पॉजिटिव हो तो हम क्या करेंगे? उसको पकड़ेंगे कैसे? और, पकड़ भी लें तो उसे थाने ले जाएं या अस्पताल?"
"मिसिर जी" एक सिपाही कहता है, "तुम तो वाकई बुद्धिमान हो, यह बात तो हमने सोची ही नहीं! अब क्या किया जाए? क्यों सचान जी?"
"करना क्या है!" सचान जी कहते हैं, "सवेरे ही एसएचओ साहब से सबके लिए पीपीई किट की मांग करेंगे ताकि हम दोषियों को बेखौफ दबोच सकें।"
"और हां, नाके पर एक छोटे से क्वारनटाइन सेल फिट करने के लिए भी कहना" मिसिर जी ने फिर दिमाग़ दौड़ाया, "क्वारनटाइन व्यवस्था होगी तो हम अपराधी को रात भर उसमें रख सकेंगे। सुबह एंबुलेस बुलाकर उसको अस्पताल भिजवा देंगे।"
तभी सुनसान सड़क पर खटपट-खटपट-खटपट गूंजती है। सिपाही चौकन्ने। लाठी पटकते हैं। एक सिपाही गाली देकर जोर से बोलता है, "आओ, कोरोना के पट्ठो...सालो, करफू तोड़ते हो। आओ देखो मैं तुम्हारी कौन कौन सी चीज़ तोड़ता हूं।"
थोड़ी देर में, कदमों की आहट सिपाहियों के सामने छह युवकों के रूप में नमूदार होती है।
"कहां से सवारी आ रही है, ससुर के नाती। चल थाने चल। जमकर खातिर करते हैं। हां, अस्पताल आदि की इमरजेंसी हो तो हम छूट दे सकते हैं।" एक सिपाही बोलता है।
युवक ठहाका मार कर हंसते हैं। "अरे, हम अस्पताल नहीं जाते।" एक बोलता है, "हम तो अस्पताल पहुंचाते हैं... हा हा हा।"
"क्या मतलब? गुंडई दिखाता है, स्साला"
"जरा, ज़बान संभाल के। हम अस्पताल ही नहीं पहुंचाते, वरन् हमसे जो टकराता है, उसे वहां भी पहुंचाते हैं।"
"कहां?"
"शमशान या कब्रस्तान... धरम के मुताबिक।"
"मार स्सालों को!" पुलिस वाले भड़क उठते हैं। एक सिपाही सबसे आगे खड़े आदमी का गिरेबान पकड़ लेता है।
"तू तो गया.." युवक ज़ोर ज़ोर से हंसता है, "अच्छा है, पहला शिकार तो मिला।"
"आओ, हमें भी पकड़ो" बाकी युवक भी हंस कर उकसाते हैं, "हम तो निकले ही हैं शिकार पर.. हा हा हा।"
"अभी तुम सबकी गुंडई निकलते हैं" पुलिस वाला गुस्सा कर पूछता है, "कहां रहते हो? चल नाम बता..."
"कोरोना वायरस" पहला युवक बोलता है।
"तू तो आदमी है। साढ़े पांच फीट का।" पुलिस वाला खीझता है।
"मैं इच्छाधारी हूं।"
"इच्छाधारी तो सांप होते हैं!"
"हम सांप के भी बाप हैं। हमारा काटा भी पानी नहीं मांगता।"
(सिपाही आपस में खुसुर-पुसुर करने लगते हैं...
....क्या किया जाए...इच्छाधारी बता रहे हैं खुद को...तुम मानते हो ये बातें...भाई का बताई, भूत तो होते हैं...तो इच्छाधारी कोरोना भी हो सकता है…नहीं नहीं...यह सब पोंगापंथी की बातें हैं...ऐसा करते है, डंडा दिखाकर इनसे सख्ती से पूछतांछ करते हैं...फर्जी होंगे तो फंस जाएंगे...तो ठीक है... तो परमार जी आप जरा कर्रा करो इनको... ओके...)
परमार डंडा पटक कर कड़क लहजे में सबसे पास खड़े युवक से पूछता है, "हां तो कहां की पैदाइश हो?"
"वुहान, चाइना।"
"वल्दियत?"
"पता नहीं। हरामज़ादे हैं हम।"
"निवास?"
"पूरी धरती।"
"नाम?"
"कोरोना वायरस, अल्फा"
"हां, अब बाकी लोग एक एक कर आगे आओ.." सिपाही दूसरे युवकों से कहता है।
"हम सब एक ही कुनबे के हैं। सबका पता एक ही है। नाम थोड़ा अलग अलग हैं।" पहले वाला युवक कहता है।
"बोलो नाम।"
"कोरोना वायरस बीटा, कोरोना वायरस गामा, कोरोना वायरस डेल्टा, कोरोना वायरस ओमीक्रोन, कोरोना वायरस डेलमीक्रोन, कोरोना वायरस आईएचयू और फ्लोरोना।"
(सिपाही फिर आपस में मशविरा करते है................
....क्या किया जाए... सब बड़ा बेहिचक बोल रहे हैं...नाम तो ऐसे बोल रहे हैं की मानो डब्ल्यूओएच के हेड साइंटिस्ट हों...ऐसा करते हैं जाने देते हैं हो सकता है कि वाकई में इच्छाधारी हों...कल से पीपीई पहन कर बैठेंगे...तो ठीक इनको विदा करते हैं)
"ठीक है, जाओ। लेकिन कल मत दिखाई देना" एक सिपाही कड़क आवाज में हुक्म देता है।
युवक बड़े जोर से हंसते हैं और दौड़ कर कोहरे में गुम हो जाते हैं।
इधर सिपाहियों की पंचायत जारी है....
"काहे मिसिर जी, ठीक किया न?"
"पता नहीं भइया, मुझको तो लगता है कि नई सड़क के पढ़े लिखे लौंडे थे। साले दारू पीकर मस्ती करने निकले होंगे और उल्लू बना गए।"
"हो सकता है" एक सिपाही कहता है, "कुछ महक तो मुझको भी आ रही थी।"
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(जागरण Inext में प्रकाशित))
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