Monday, May 2, 2022

इस देश का यारो क्या कहना

 इस देश का यारो क्या कहना



सर, मैं सांस लेता हूं तो उसका सन्देश मेरे पास आ जाता है। और, जब सांस छोड़ता हूं तो मेरा सन्देश उस तक चला जाता है।...

यह बात कह रहा था एक 26 साल का युवक। मेरे ड्रॉइंग रूम में सोफे पर  बैठा था। पांच मिनट पहले मेरे घर के बाहर सड़क से गुज़र रहा था। प्यासा। इतना प्यासा कि वह बोल नहीं पा रहा था। 

मैं किसी काम से घर के दरवाज़े पर ही था। मैंने देखा। वह बहुत शिथिल था। आइए, मैंने दरवाज़ा खोल कर उसे भीतर आने का इशारा किया और सहारा देने के लिए हाथ बढ़ा दिया। उसने त्योरियां चढ़ा कर इशारे से ही मेरा हाथ झटक दिया।

अंदर ठंडे कमरे में सोफा देखते ही वह उसमें धंस गया। वह आंख मूंदकर ठंडक को जज़्ब कर रहा था। मैंने उसे पानी दिया। उसने दो घूँट पिए। आंख खोली और गिलास मेज़ पर धर दिया।

"गिलास धोया था?'' उसने आंखों में आंखें डाल कर मुझसे पूछा। उसकी आवाज़ में न कृतज्ञता थी और न किसी किस्म की कृतघ्नता। ज़मींदाराना तेवर थे। मैंने रिआया बनने में देर न की, "जी, धोया था।" घर का मालिक मैं था। थोड़ा मस्ती करने का अधिकार तो था ही।

"काहे से धोया था?"

"जी, विम से।"

"राम-राम-राम! राख से मांज कर लाओ और हां पानी सुराही का लाना।"

घर में न राख थी और न सुराही। लेकिन, इस अटपटे मेहमान को प्यासा तो नहीं विदा कर सकता था! मैंने स्टील का नया गिलास निकाला। उसमें थोड़ा फ्रिज का पानी डाला, थोड़ा सादा। और, उसे मेहमान के आगे रख दिया। साथ में बर्फी के चार टुकड़े भी। 

दो कौर में बर्फी और दो घूंट में पानी पीकर मेरे अतिथि ने तृप्ति से मुझे देखा और कल्याणमस्तु भाव के साथ मुस्कुराए। वे अब अतिथि देवो भव जैसी प्राचीन भारतीय परम्पराओं का गुणगान कर रहे थे और गर्व से कह रहे थे कि हम ब्रह्मांड में सर्वश्रेष्ठ हैं। 

सहसा वे रुक गए। पूर्णविराम। 15-16 सेकंड मुझे देखते रहे। फिर एकदम से बोले, "कौन आस्पद?"

"आँय, कउन आफत?" मैं कुछ समझ नहीं पाया।

"मेरा मतलब, नाम क्या लिखते हैं?" उन्होंने समझाया।

मैं समझ गया। मैं होस्ट था। घर का मालिक था। थोड़ी उछलम-कूदम तो मैं भी कर सकता था।

"अरे, छोड़ो  जात-पांत...चाय बन रही है...समोसे भी ले आऊंगा। खा-पी के जाइएगा।"

"आप मुझे डरा रहे हैं। मैंने पानी पिया है। जाति जानने का अधिकार है मेरा..बताना पड़ेगा।"

और मैंने बता दिया,"मेरा नाम है ग़ुलाम मोहम्मद ख़ादिम।"

मेरे बोलते ही 26 साल का यह दुबला-पतला युवक सोफे से उछलकर फर्श पर खड़ा हो गया और रोने लगा...अब मैं क्या करूँ मैं ब्राह्मण हूं। पाठक। तुमने तो बर्फी और पानी में थूका भी होगा?...मुझे हल्की सी चिंता हुई थी कि  आज के ज़माने में किसी अनजाने आदमी को कोई बर्फी-पानी कहां करता है। लेकिन, प्यास ने मेरी मति हर ली।..

वह बोले जा रहा था। वह रोए जा रहा था। मुझसे न देखा गया। मैंने उसे जोर से डपटा, कहा कि मैं भी ब्राह्मण हूं।

जैसे गाड़ी में एकदम ब्रेक लग जाए, उसने रोना बन्द कर दिया पर आंखों में शक अब भी तैर रहा था। 

"तो सुनाओ गायत्री मंत्र" वह बड़े गुस्से में बोला

मैंने सुना दिया–ॐ भूर्भुवः स्व: ....प्रचोदयात्।

उसे विश्वास नहीं हुआ, बोला: जनेऊ दिखाओ। 

मन में आया कि युवक को दरूद शरीफ सुना कर भगा दूं लेकिन खेल में मज़ा भी आ रहा था। मैं खेल गया। मैंने उसे न सिर्फ जनेऊ दिखाया वरन् कुल, गोत्र बिस्वे तक बताए। 

मैं मानदंडों के अनुसार श्रेष्ठतर ब्राह्मण था। वह साष्टांग हो गया। अब वह कह रहा था–अपरिचित से इतना अच्छा बर्ताव तो सिर्फ उच्चकोटि का ब्राह्मण ही कर सकता है।

"और उच्चकोटि का क्षत्रिय... और उच्चकोटि का वैश्य... और उच्चकोटि का चौथा खंभा?" मैंने जवाब में एक प्रश्नगुच्छ उछाला।

जवाब में वह हंसने लगा। फिर वह इतिहास पर लेक्चर पिलाने लगा। मोहम्मद बिन क़ासिम से लेकर बहादुरशाह ज़फ़र तक को खूब कोसा। मैंने उसे करेक्ट करने की कोई कोशिश नहीं की क्योंकि इतिहास के काल्पनिक दुख उसको अगियाबेताल बना चुके थे।

दाहिर, हेमू, राणा प्रताप आदि को जिताने के बाद वह अब शांत था। मुझ पर उसे भरोसा हो गया था। प्रेमभरी नज़रों से मेरी ओर देखकर बोला, "सर, आप मेरे पिता की तरह हैं। एक राय लेनी है... दरअसल, मैं एक लड़की से प्रेम करता हूं।"

"वेरी गुड, खूब करो...किसने रोका है?"

"समस्या है कि वह दूर रहती है, अमरीका में।"

"वीडियो टॉक किया करो, दिक़्क़त क्या है?"

"फोन नम्बर ही नहीं है।"

"कब से नहीं देखा?"

"15 साल हो गए।"

"कहां देखा था?"

"क्लासरूम में, पांचवीं क्लास में।"

"क्या बोली थी?"

"कुछ नहीं। कभी बोली ही नहीं।"

"तुमने उससे कुछ कहा था कभी भी?"

"नहीं सर, मैं बस चुपचाप प्रेम करता रहता था।"

"कौन रोकता है? चुपचाप करते रहो..समस्या क्या है?"


" समस्या यह है सर कि जब मैं सांस लेता हूं तो उसका सन्देश मेरे पास आ जाता है। और, जब सांस छोड़ता हूं तो मेरा सन्देश उस तक चला जाता है।..."

"तो फिर?"

"आप नहीं समझ पा रहा हैं। आदमी दिन में 20000 बार सांस लेता-छोड़ता है। सोचिए, 20 हज़ार संदेशों का लेना-देना!! मैं पागल हो जाता हूं।"

मैं उसकी पूरी बात समझ चुका था। उसे एक खास किस्म के चिकित्सक की आवश्यकता थी। लेकिन, विलक्षण ज्ञान और प्रेम में डूबे दीवाने को यह समझाना नामुमकिन था। ऐसे में उसे महीने में एक बार वृंदावन जाकर राधा जी की पूजा करने की सलाह दी। वह खुश होकर चल दिया। उसने मेरे पैर छुए। मैंने आशीर्वाद में राधे-राधे कहा। मुझे लगता है कि कन्हैया इस दीवाने की प्रार्थना सुन लेंगे।


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