ला मजहब
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वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन। दिसंबर का महीना था। शाम ढल रही थी। और, मैं रांची या शायद पटना की ट्रेन पकड़ने के लिए पुल की सीढ़ियां उतर कर प्लेटफार्म नंबर पांच पर खड़े हो आसपास का मुआयना कर रहा था। गोधूलि वेला के वक्त में प्लेटफार्म पर, इक्का दुक्का पीले बल्ब जलने के बाद भी, धुंधलका सा छाया हुआ था। तब तक इस स्टेशन का कायाकल्प नहीं हुआ था।
मेरी ट्रेन लेट थी। मैं इधर उधर नज़र दौड़ाने लगा और मेरी आंखें बाईं तरफ लाल रंग का ट्रैक सूट पहने एक गोरे युवक पर जा अटकी। वह थोड़ी थोड़ी देर में दौड़ता और कभी किलकारी मारकर उछलता या रुक जाता।
मेरे पास मुफ्त का टाइम था। मैं उसी की तरफ चल दिया। तब तक वह उछलना कूदना बंद कर एक बेंच पर बैठ गया। पास पहुंचा तो युवक विदेशी निकाला। मंगोल नस्ल का। लेकिन वह अकेला न था। उसके अगल बगल स्टेशनों पर भटकने वाले, स्लमडॉग मिलिनेयर टाइप दो मैले कुचैले लड़के बैठे थे। एक लड़का खड़ा था।
चारो ज़ोर ज़ोर से खिलखिला रहे थे और बेंच में रखे उस विदेशी के झोले से निकाल निकाल कर कुछ खा रहे थे। मुझे अत्यंत संपन्न दिखते इस विदेशी और समाज बहिष्कृत लड़कों की मैत्री समझ में अटपटी लगी। मैं थोड़ा और आगे चला गया। युवक ने मेरी तरफ एक नजर डाली और फिर अपने मित्रों के साथ ठहाका लगाने लगा।
"हेलो!" मैंने कहा।
विदेशी ने मुझे देखा और झोले से केक का टुकड़ा निकाल कर मेरी तरफ बढ़ाते हुए मुस्कराने लगा।
तो यह मुझे भिखमंगा समझ रहा है! दिमाग ने फौरन रिएक्ट किया। मैं आहत हो गया था। लेकिन मैंने खुद को शांत रखा और उससे कहा, "थैंक यू, बट आय डोन वॉन एनी केक..."
मानो मुझे सुना ही न हो, उसने केक का टुकड़ा फिर मेरी ओर हिलाते हुए आंखों ही आंखों में खाने की गुजारिश की। जैसे कह रहा हो...अरे यार खा भी लो... ऐसी भी क्या नाराजगी!
"वॉद्दा हेल" मैंने अपमान के बावजूद खुद को जब्त करते हुए जितनी मधुरता से संभव था प्रतिक्रिया दी और दूर हटते हुए आगे बोला, "वॉड्यू थिंक? एम आय सम ट्रैंप ऑर ब्लडी बेगर?"
मेरी आवाज़ थोड़ी कड़वी हो गई थी। मगर उसने मानो मेरी बात सुनी ही न हो। वह विदेशी उन स्ट्रीट चिल्ड्रेन के साथ फिर बिज़ी हो गया था।
मुझे बेइज्जती महसूस हो रही थी। लेकिन इसके बावजूद मेरे अंदर के पत्रकार को पूरा मामला बड़ा इंट्रीगिंग लग रहा था। ऊंचनीच वाली सामाजिक व्यवस्था के बीच विकसित हुआ मेरा मन इस बात को समझ पाने में असमर्थ था कि ओमेगा घड़ी और रेबैन के एविएटर्स से सजा यह विदेशी इन गंदे, बदबूदार बच्चों के साथ भला कैसे खुद को जोड़ पा रहा है।
मैंने एक बार फिर उसको हेलो बोला। इस बार उसने खड़े होकर कमर झुकाते हुए हाथ जोड़कर जवाब दिया। वह कुछ बोला भी लेकिन उसकी भाषा मेरी समझ से परे थी।
"इंग्लिश?" मैंने भौहों से प्रश्नवाचक मुद्रा बना कर सवाल पूछा।
उसने सर और हाथ के इशारे से बताया कि उसे अंग्रेजी नहीं आती।
उसके जवाब पर मुझे अपने अंग्रेजी ज्ञान पर गर्व हो उठा। लेकिन अगले ही पल अपने ज्ञान की व्यर्थता का भी अहसास हो गया।
"हिंदी?" मैंने अगला सवाल किया।
मगर उसे हिंदी भी नहीं आती थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि बिना हिंदी या अंग्रेज़ी के ज्ञान के यह आदमी हिंदुस्तान में घुमक्कड़ी कैसे कर रहा है! मैंने खुद को यह सोचकर समझाया कि हो सकता है कि इसकी टीम में और लोग भी हों, जिन्हे ये भाषाएं आती हों।
अब मैंने उसका मुल्क पता करने की ठानी।
"थाई? थाईलैंड?"
उसको मेरा शब्द ही समझ में नहीं आया। शायद उसकी भाषा में थाईलैंड का कोई और शब्द रहा हो।
अब मैंने दूसरा तरीका अपनाया और अपनी छाती की ओर उंगली से इशारा करके कहा, "इंडियन, इंडिया..भारत।"
अपना परिचय देने के बाद मैने उसकी ओर हाथ से इशारा कर पूछा, "मैं भारतीय, तो तुम?"
मेरा सवाल उसकी समझ में आ गया। वह मुस्कुराया और बोला, "निप्पॉन, जापान।"
मेरे मन का भारतीय अपनी विरासत का स्मरण कर प्रसन्न हो गया। ओ हो, तो यह मेरे भगवान बुद्ध का अनुयायी है।
अब मेरा भारतीय मन उसका धर्म जानने पर आमादा हो उठा।
"बुद्धिस्ट?" मैंने पूछा।
जवाब में वह मुस्कुराने लगा। उसने यह शब्द सुना ही नहीं था।
मैंने बुद्ध, बुद्धा और बौद्ध आदि कई शब्द बोले। जवाब में वह मुस्कुराता रहा।
अब मैंने बुद्धि पर ज़ोर डाला तो जापान का एक और धर्म शिंतोइज्म की याद आ गई।
मैंने कहा, "शिंतो?"
इस बार वह जोर से हंस पड़ा और हाथों से सर पर मुकुट जैसी आकृति बनाने लगा। मैंने उसकी हंसी पर आश्चर्य की मुद्रा बनाई तो वह और जोर से हंसने लगा।
मेरे अंदर बैठे भारतवासी ने हार नहीं मानी और मैने तय कर लिया कि इसका धर्म, जाति और गोत्र को मैं खोद कर मानूंगा।
मेरा अगला सवाल था, " कन्फ्यूशियस?"
जवाब में उसकी कन्फ्यूज्ड मुस्कुराहट जारी थी।
अब मैंने प्रभु यीशु का नाम लिया क्योंकि मेरी पढ़ाई के मुताबिक जापान में ईसाई भी पाए जाते हैं। लेकिन वह बंदा न तो जीसस का नाम जानता था न क्राइस्ट का। अंग्रेजी शब्द क्रिश्चियानिटी शब्द तो उसके लिए बहुत ही भारी पड़ता।
मैं हार चुका था। तभी अचानक मेरे मोबाइल की घंटी बज उठी। नाइजीरिया से फोन था। मेरे दोस्त चिबोका का।
"मान, यो गॉट्टा कम ओवर टु लेगोस दिस क्रिसमस।"
मैंने ओवरसीज कॉल जल्दी से निपटाई। मुझे जापानी से पूछने के लिए अगला शब्द मिल गया था। फोन काटते ही मैंने सवाल उछाल दिया, "क्रिसमस?"
यह सवाल उसकी समझ में आ गया। वह उठा। उसने हाथों से दावत खाने और दारू पीने जैसा इशारा किया। इसके बाद वह "जिंगल बेल जिंगल बेल जिंगल ऑल द वे" की शब्द रहित धुन गुनगुनाने लगा। अगले ही पल वह ताली बजा कर नाचने लगा। साथ में वे गंदे बच्चे भी नाचने लगे।
मेरी ट्रेन प्लेटफार्म पर लग गई थी। मैं अपने कोच की तरफ भागा। जापानी एक बार फिर भारत के मजहब के पाबंद बच्चो के साथ खेलने में मस्त हो गया था।
क्या वह जापानी ईसाई था? आप अपना जवाब जरूर बताइएगा। मेरा जवाब है: नहीं।
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