Sunday, May 15, 2022

गीत

  बसन्त 

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खेतों में पसरा है केसर 

अमराई भी बौराई,

पके बेर-सी हुई दोपहर 

मशक बजाते शहनाई।।


घटघट, पोरपोर रस-विह्वल 

हिरदय में बाजे मिरदंग,

नील गगन भी मगन-मगन है 

देख-देख धरती के रंग।


देखो तो पलाश ने कैसे बन-बन

 मन-मन अगन लगाई।।


खेतों में पसरा है केसर 

अमराई भी बौराई...


नींद खुली औ सपना टूटा

बूढ़ा तन फिर अंगड़ाया,

दादा जी ने सुबहसुबह

'जब दिल ही टूट गया' गाया।


मोतियाबिन्दी आंखों में भी

वापस आई बीनाई।।


खेतों में पसरा है केसर 

अमराई भी बौराई....

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