Monday, May 2, 2022

अंतिम परीक्षा

 



व्यंग्य

......


(जब कन्नौज में एक इत्र कारोबारी के घर से 284 करोड़ निकले थे)



नव गुरुकुल। सत्र का अंतिम दिन। आज परीक्षा है। फाइनल। इसके बाद छात्र अपने घर लौट जाएंगे। शिष्यगण वट वृक्ष के नीचे एकत्र हो रहे हैं।  गहमा गहमी का माहौल। गुरु जी अभी दिख नहीं रहे। सबकी नज़र उन्हीं की कुटिया पर लगी है। लो, देखो देखो! वे बाहर निकल रहे हैं। उनके हाथ में गुलाब का एक फूल है। लड़के दौड़कर साष्टांग दंडवत करते हुए चरणरज ले रहे हैं।


"शुभमस्तु" गुरु जी आशीर्वाद देते हैं, "बैठो बैठो.....कल्याणमस्तु सर्वेषाम्।"


छात्र बैठ जाते हैं। गुरु जी की गंभीर वाणी गूंजती है:


"बच्चो, मैंने तुमको अपना सर्वस्व ज्ञान दे दिया है। आज दीक्षांत है। जैसा कि तुम जानते हो, मैं किसी को उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण नहीं करता। बस, आशीर्वाद और सलाह देकर विदा कर देता हूं।.... तो, परीक्षा शुरू की जाए?"


"जी गुरु जी" लड़कों ने समवेत स्वर में कहते हैं। 


"ठीक। अब तुम लोग एक-एक करके मेरे पास आओ और परीक्षा दो।"


पहला लड़का।


"मेरे हाथ में क्या है?" गुरु जी पूछते हैं।


"एक फूल।"


"सही जवाब" गुरु जी कहते हैं, "तुम अच्छे मजदूर बनोगे।"


"यह क्या गुरु जी!?" लड़का आहत स्वर में कहता है, "मैने भी बारह साल अध्ययन किया है!!"


"दुखी मत हो स्नातक" गुरु जी समझाते हैं, "मजदूर होना गर्व की बात है। इस धरती की सारी चमक श्रमिकों की ही देन है। भाखड़ा नंगल हो या बुर्ज खलीफा या काशी विश्वनाथ का आधुनिक विस्तीर्ण प्रांगण। यह तमाम सब श्रमिकों की मेहनत का परिणाम है। जाओ, नए भारत के निर्माण में जुट जाओ। बोलो, भारत माता की जय।"


छात्र देशप्रेम में विह्वल होकर जवाबी नारा लगाता है, "भारत माता की जय!"


"नेक्स्ट" गुरु जी मंद मंद मुस्करा रहे हैं।


"हां, अब तुम बताओ कि मेरे हाथ में क्या है।" गुरु जी अगले लड़के से पूछते हैं।


"जी, यह गुलाब का फूल है।"


"बिलकुल सही जवाब" गुरु जी कहते हैं, "तुम पादपों के नाम जानते हो। जाओ किसानी करो। खूब नाम कमाओ।"


"गुरु जी, इतना पढ़ लिख कर किसानी?" छात्र मायूस होकर कहता है, "सब मेरा मज़ाक उड़ाएंगे! आपके गुरुकुल की प्रतिष्ठा भी घटेगी।"


"लगता है, मेरे अध्यापन में ही कसर रह गई जो तुम सबसे सम्मानित व्यवसाय को घटिया समझ रहे हो" गुरु जी नाज़िर हुसैन की तरह भर्राए हुए गले से कहते हैं, "तुम्हें क्या पता, पीएल 480 वाले सड़े गेहूं से मुक्ति दिलाकर हरित क्रांति किसान ही लाया था और शास्त्री जी को जय जवान, जय किसान का नारा देना पड़ा था। आज भी सरकार जो गल्ला बांट कर लहालोट है, वह भी किसान के बदौलत है। और, यह फ्रेश फ्रूट और सब्ज़ी का करोड़ों का ऑनलाइन कारोबार भी तुम्हारे दम पर है। बीसियों भंबानी, रंबानी, दंडपानी तुम्हारे दम पर जी रहे हैं...। और बताऊं? अभी कुछ दिन पहले ही किसानों ने सरकार को झुका दिया। मंत्री लोग तबसे अन्नदाता और अन्नपूर्णा के नाम का जाप करते रहते हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि कोई किसान यूपी में मुख्यमंत्री बन जाए..."


"बस गुरु जी बस!" छात्र गुरु के पैरों पर गिर पड़ता है, "यहां से सीधे गांव जा रहा हूं।" 


छात्र प्रसन्न होकर गाता है... अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है क्यों न इसे सब का मन चाहे.. अहा।


"नेक्स्ट" गुरु जी मुंह दबा कर हंस रहे हैं।


तीसरा छात्र।


"हां, तो तुम्हे क्या दिख रहा है? गुरु जी खुद को संयत करते हुए पूछते हैं।


"मुझे हरे रंग की कांटे युक्त शाख से लगा गुलाब दिख रहा है। गुलाब स्वस्थ है और उसके सेमल, पेटल्स, कैलिक्स, एपिकेलिक्स, गाइनोशियम और पिस्टिल्स भी दिख रहे हैं।"


"बहुत बढ़िया। तुम तो बॉटनिस्ट हो। जाओ, जीएम फूड पर काम करो" गुरु जी ने प्रसन्न होकर कहते हैं।


अगला छात्र को गुलाब के फूल में प्रेमिका के ओंठ दिखाई पड़ते हैं। गुरु जी धिक्कारते हैं, "ब्रह्मचारी के लिए  यह दृष्टि सही नहीं।" 


"लेकिन, गुरुदेव!" युवक ने पलटकर जवाब देता है, "कुमार संभव, अभिज्ञान शकुंतलम आदि ग्रंथ तो आपने ही तो रस ले लेकर समझाए थे। मुझे तो यह भी याद है कि केले का तना किसकी उपमा है। बताऊं?


"नहीं मेरे बाप" गुरु जी ने खीझ उठते हैं, "जा तू कविता लिख। बॉलीवुड ट्राइ कर। सफल न होना तो कवि सम्मेलन के मंच पर गलेबाज़ी करना। बस तार सप्तक टाइप हाई क्लास मत लिखना, नहीं तो भूखे मर जाओगे।"


दीक्षांत समारोह समाप्त प्राय है। बस दो छात्र बचे हैं। 


अंतिम से पहला छात्र सामने है। गुरु जी उसको भी गुलाब का फूल दिखाते हैं, "बोल, बालक..."


"गुरुदेव, मुझे जवाहर लाल नेहरू दिख रहे हैं....और मुझे वैलेंटाइन डे दिख रहा है...और..और मुझे मॉल्स और होटलों में तोड़फोड़ करते वीर युवक दिख रहे हैं।"


"वाह वाह, वाह वाह, वाह!" गुरु जी खुशी से नाच उठते हैं, "तू मेरा नाम रोशन करेगा। जा तू नेता बन।"


अंतिम छात्र सामने है। गुरु जी घिसापिटा सवाल एक बार फिर बोलते हैं। छात्र के चेहरे पर एक मुस्कान खेल रही है। "हंस मत, जवाब दे" गुरु जी डपटते हैं, "बोल क्या देख रहा है?"


"मुझे गुलाब नहीं, रुपए दिख रहे हैं, गुरु जी" लड़के ने कहा, "जी, रुपए। एक दो नहीं 284 करोड़। मैं कन्नौज देख रहा हूं। इत्र का कारखाना देख रहा हूं। भभके भभक रहे हैं। इत्र टप्प टप्प टपक रहा है। अवशिष्ट, कचरे की नाली में 2000 के नोटों की धारा बह रही है।"


"तूने कब पाया यह ज्ञान? मैं तो यह सब्जेक्ट पढ़ाता ही नहीं" हतप्रभ होकर गुरु जी पूछ रहे हैं।


"यह ज्ञान तो मैंने आचार्य बंटाधार की कोचिंग में पाया है।शाम को उल्लू बाड़ी में पढ़ाते हैं" छात्र अब भी मुस्करा रहा है।


गुरु जी का दिल टूट गया है। मरियल सुर में कहते हैं,"जा बालक जा, जी ले अपनी जिंदगी। मैं तुझे ज्ञान देने के लायक नही रहा।"


गुरु जी धीमे धीमे कुटिया की ओर जा रहे हैं। उनका सिर झुका हुआ है। लड़का कुलांचें मारता महानगर की ओर जा रहा है।














 





 












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