7 दिसंबर 1992
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रामनवमी के दिन देश के कुछ स्थानों पर उद्भूत हिंसक रावणत्व से उपजी उदासी के बीच आज शाम 7 दिसंबर 1992 का दिन याद आ गया। मेरी रिपोर्टिंग टीम अयोध्या से लौटी थी। टीम के एक प्रमुख सदस्य थे धीरेंद्र श्रीवास्तव जी। वे सीधे मेरे पास आए और बोले, "सर जी, आपके लिए अयोध्या से एक स्मृति चिह्न लाया हूं।"
"क्या मस्जिद की ईंट ले आए हो?"
"नहीं सर। एक कॉपी है। अधजली जो रास्ते के गांव में एक जले हुए घर में पड़ी थी।"
इतना कहकर धीरेंद्र जी ने अधजली कॉपी मेरे आगे रख दी। कॉपी पर मेहरुन्निसां का नाम लिखा था। मैंने पहला पन्ना खोला। इमला शीर्षक के नीचे लिखा था: अयोध्या के राजा दशरथ के चार बेटे थे। सबसे बड़े पुत्र का नाम था राम...
इसके आगे कुछ नहीं बचा था। नफरती आग शेष रामकथा को जला चुकी थी।
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