भोर के सपने में जब मिल गए विभीषण
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पितृपक्ष के दौरान पुरखों को जलम्-तिलोदकम् का एक बार भी तर्पण न करने वाले लंतरान जी गली के नुक्कड़ पर टकरा गए। उनके चेहरे पर विचित्र सा आसमानी भाव था। ऐसा भाव मैं पहचानता हूं। यह तभी उपजता है जब उनके मुखारबिंद से घंटे भर से भरी गुटके की पीक की तरह कुछ गिरने वाला होता है।
"सुनाइए" मैं उगलदान बनकर प्रस्तुत हो गया।
"का बताई भइया, रात मा एक ठइंयां अइस सपन दीख कि दिमाक खराब हुइ गा। सपन मा पहिले विभीषण जी मिले। फिर हनुमान जी। हनुमान जी ने तो हमका पटक के मारा।"
"अरे! तुम तो उनकी टीम के मेंबर हो...जय श्रीराम का हुंकार भी दिन में सौ बार तो करते ही होगे!! राम जी के दर्शन नहीं मिले?"
"न भइया। हनुमान जी के बहुत हाथ जोड़े। लेकिन वे न माने। जवाब में एक चौपाई जरूर सुना गए। वो क्या थी... निरमल मन जन पावा..अब याद नहीं।"
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा। यह रामायण की चौपाई है। इसमें राम जी कह रहे हैं कि मुझे बदमाश लोग नापसंद हैं, मुझे भले लोग ही पा सकते हैं।"
"अब बताओ भइया, हम का करी। का नहीं कीन राम जी के लिए!? अजुध्या जी मा लंका कांड तक कर डाला!! बच्चे की जान ले लेंगे क्या?!!
"परेशान न हो। तुम सपना देख रहे थे। सपने झूठ होते हैं। सपने के देवताओं को तुम फर्जी मानो।"
"लेकिन भइया, हम तौ सबेरे चार बजे सपन दीख रहै। अउर, भोर का सपन झूठ नही होत।"
"चलो ठीक। तुम पहले अपना सपना सुनाओ। फिर मैं स्वप्नफलादेश बताऊंगा।"
"तौ सुनौ। हम सपन देख रहे हन...पितृ विसर्जन के दिन गंगा जी, गोलाघाट में धारा के बीच तर्पण कर रहा हूं। तभी मेरी नज़र घाट पर पड़े तख्त पर पड़ती है। का देखता हूं कि तख्त पर एक नमूना बैठा है: नौटंकी में राजाओं द्वारा पहने जाने वाला लंबा फ्रॉकनुमा नेवी ब्ल्यू कलर का रेशमी लबादा। भगवा रंग की सिल्क धोती। सिर पर हीरा पन्ना नीलम से जड़ा सोने का मुकुट। और, बेहद खूबसूरत म्यान में समाई तलवार, जिसे इस शख्स ने तख्त पर रखा हुआ था।
"देखते ही मेरे अंदर कनपुरिया हरामीपन जाग उठता है। मैं नंगे बदन, गीली चड्डी में ही तख्तनाशीन नमूने को पूरे मुरहेपन के साथ सिर झुका के प्रणाम करता हूं: महाराज की जय हो।
नमूना: यशस्वी भव। आयुष्मान भव। पुत्रवान भव।
मैं: ये भो भो भो का भौंक रहे हौ भो...मैं पूरी चिकाई के मूड में आकर भव को कनपुरिया ट्विस्ट दे देता हूं।
नमूना: खबरदार! भो के आगे स भी बोला न तो मेरी चंद्रहास तलवार तेरी गर्दन उड़ा देगी। कल शाम से कानपुर घूम रहा हूं। जानता हूं कि भो के आगे क्या होता है।
मैं: चंद्रहास! आंय!?
नमूना: गंगा नहाते हो, रामायण नहीं पढ़ते क्या? फर्जी हिंदू हो क्या? अरे चंद्रहास माने लंकेश की तलवार।
मैं: अच्छा, तो महाराज लंकाधिपति रावण हैं। रामलीला वाले। गत्ते वाली चंद्रहास लेकर परिहास करते घूम रहे हैं!
नमूना: लंकाधिपति हूं। लेकिन रावण नहीं। विभीषण। असली विभीषण। रामलीला वाला नहीं। और, यह चंद्रहास भी गत्ते की नहीं। असली है। जो शंकर जी ने बड़े भइया को दी थी। उनके मरने के बाद मैंने उनके पार्थिव शरीर से उतार ली थी।
मैं: अबे, गप्पू गप्प गपंगप खां, तू तो हमारे गुरु गप्प शिरोमणि का भी उस्ताद है। काम करेगा? आइटी सेल से बात करूं? फी पोस्ट पांच रुपए...
नमूना: बालक, तू मूर्ख है।
मैं: देखो, अंडबंड न बकना। समझ लेव। रामभक्त हूं। हेंइं पटक के मरिबे। अउर गंगै मा बहा देबे...जय श्रीराम।
नमूना: हा हा हा...नहीं मार पाओगे। मैं तो अमर हूं।
मैं: अमरौती खाए हौ का? राम जी तो सरजू में समा गए और तुम गद्दार, भाई के हत्यारे लाखों साल बादौ जिंदा हौ?
नमूना: कहा न, तुम रामभक्त जरूर हो लेकिन फर्जी। रामकथा की तुम्हे कोई जानकारी नहीं। अन्यथा, पता होता कि प्रभु राम जिन लोगों को अमरता प्रदान कर गए थे, उनमें एक मैं, यानी विभीषण भी था।
मैं: चलो, थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं। अब यह बताओ कि लंका के राजा तो तुम हो। फिर ये राजपक्षा वहां क्या कर रहा है? गद्दी पर तो तुम्हें होना चाहिए था, विभीषण!"
नमूना: राम जी ने अमरता प्रदान की थी। यह नहीं कहा था कि लंका में हमेशा तुम्हारा ही राज्य रहेगा।
मैं: गद्दी खो दी? तुम्हें धिक्कार है। अमरता पाने के बाद भी जो सिंहासन खो दे वह महामूर्ख है। क्या जनता को बरगला नहीं पाए? कुछ नहीं तो सिंहलियों और तमिलों को आपस में लड़वाते!
नमूना: मैं रामभक्त हूं। सत्ता के लिए नीचता नहीं कर सकता था। वैसे भी त्रेता काल में लंका में यक्ष और राक्षस जातियां रहती थी। ये सिंहली और तमिल तो बाद में गए हैं। तुम्हारे बंगाल, ओडिशा और तमिलनाडु से।
मैं: तो तुमको सिंहलियों ने परास्त किया कि तमिलों ने?
नमूना: दोनों ने नहीं। मुझे परास्त किया महाराज विजय ने। वे भी तुम्हारे भारत से गए थे।
मैं: कहां से? यूपी से? नाम तो अपनै लग रहा है!
मैं: न यूपी से। न दिल्ली से। गुजरात से। बाबर की तरह उनका भी राजपाट छिन गया था। बाबर ने इंडिया फतेह किया था। विजय ने लंका को जीत लिया था। तभी तो उनका दिया लंका का प्रतीक चिह्न सिंह है। गिर वाला सिंह। लंका में तो सिंह कभी हुआ ही नहीं।"
मैं: वाह वाह वाह! क्या खबर सुनाई है। लंका को हम लोगों ने दो बार जीता!जय श्रीराम!! अभी प्रेस जाकर रिपोर्ट फाइल करता हूं। जानते हो न, मैं पत्रकार भी हूं। राष्ट्रवादी नाबीना टाइम्स में।
नमूना: पत्रकार हो? लेकिन बातें तो बड़ी बेहूदगी से करते हो।
मैं: अब ज्यादा बमकौ न। मिल गै हौ तो इंटरव्यू दइ देव। फिर अपन रस्ता लेव।"
नमूना: हमको फिलहाल कहीं नहीं जाना। परेड वाली रामलीला का भरत मिलाप देखकर ही जाऊंगा।
मैं: कहां? कहां जाओगे?
नमूना: हिमालय में कहीं बैठकर प्रभु राम का भजन करूंगा। एक साल बाद फिर दशहरे में रामलीला देखने निकलूंगा। अच्छा लगता है। पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। अब पूछो क्या पूछना है?
मैं: यह बताइए कि आपने सगे भाई के साथ विश्वासघात किया। नाभि में अमृत है, यह बात राम जी को बताई। पूरी दुनिया तुम्हे धिक्कारती है। मुहावरे तक हैं तुम पर कि घर का भेदी लंका ढाए। इतने सब के बाद तुम्हे भगवान ने अमरता क्यों दे दी?"
नमूना: यह तो बहुत कठिन प्रश्न है। इसका जवाब मैं खुद त्रेता से खोज रहा हूं। लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। आप, बहरहाल परेशान न हों। मैं पवनपुत्र को बुलाता हूं। हम दोनो हर साल साथ साथ रामलीला देखने निकलते हैं। उनको भी अमरत्व प्राप्त है। वे ज्ञानी भी हैं।
"भइया, अब हमार चोक लेने लगी। डर लगा कि अगर बजरंगबली सच्चीमुच्ची आ गए तो क्या होगा। सारा हरामीपन घुसेड़ देंगे। उधर वह नमूना या विभीषण जो भी था, आंख बंद कर मंत्र पढ़ते हुए हनुमान का आह्वान कर रहा था और इधर मैं घिग्घीबंद गले से हनुमान चालीसा पढ़ने की कोशिश कर रहा था।
"तभी मेरे पीछे से एक गंभीर लेकिन विनम्र आवाज गूंजी: जय सियाराम, विभीषण। कहो, कैसे याद किया!
"मैं पीछे मुड़ा तो देखता हूं एक लंबा तगड़ा ब्राह्मण खड़ा है और नमूना उसके चरणों में पड़ा है । ब्राह्मण को देख मेरी धुकधुकी रुकी। मुझे विश्वास हो गया कि वह ब्राह्मण हनुमान नहीं हो सकता। इतना विनम्र और संत जैसा चेहरा बजरंगी का हो ही नहीं सकता। कारों के पीछे चिपकने वाले क्रुद्ध अवतार बजरंगी के पोस्टर से यह चेहरा कतई मेल नहीं खा रहा था। तिस पर इसके पूंछ भी नहीं थी। मेरा भय जाता रहा। मुझे वे दोनों टप्पेबाज लगने लगे। मेरा डबलपना फिर जागने लगा।
मैं विभीषण से बोला, "क्यों बे लंकापति। तूने ने तो चलो मेकप भी कर रखा है लेकिन इस हनुमान ने तो वह भी नहीं किया। ब्राह्मण के पूंछ तो लगवा देते!"
"यह ध्रष्ट पुरुष कौन है, विभीषण?" ब्राह्मण की गुरु गंभीर आवाज गूंज उठी।
"महाराज, यही वह आदमी है जिसकी वजह से मुझे आपको बुलाना पड़ा" विभीषण ने कहा, "यह खुद को रामभक्त कहता है। मगर गंदी ज़बान बोलता है। पहले मुझसे विभीषण होने का सबूत मांग रहा था। अब आपकी पूंछ देखना चाह रहा है। बहरहाल, इसी के पूछे सवाल से हारकर मैंने आपको बुलाया है।
"अच्छा! इतना दुस्साहस!!" ब्राह्मण ने गुस्से में भरकर मेरी तरफ देखा और विभीषण से बोला, "लंकापति मेरे साथ आइए।"
इसी के साथ भइया, ब्राह्मण देवता ने मुझे चढ्ढी पकड़ कर टांग लिया और एक छलांग में गंगा जी को पारकर मुझे रेत में बद्द से जा पटका। मैं कुत्ते की तरह कोंयकोंय करते हुए ब्राह्मण रूपी हनुमान जी के चरणों में लोटने लगा।
हनुमान जी ने मुझे बालों से पकड़ कर खड़ा कर दिया और बोले, "हां तो तुझे पता करना है कि अमरता का अवॉर्ड क्यों मिला? मेरे बारे में तो तू जानता ही है। मैंने सीता की खोज की। लंका फूंकी। युद्ध लड़ा और लक्ष्मण को बचाया। राम की भक्ति की। कुछ लोग कह सकते हैं कि राम के मन में मेरे लिए सॉफ्ट कॉर्नर था। हालांकि मर्यादा पुरुषोत्तम ने ऐसा नहीं सोचा होगा पर यह एक तथ्य है कि मैं उनका बालसखा भी था।"
"जी, पवनपुत्र। आपके बारे में जगत में कौन नहीं जानता मेरा सवाल विभीषण जी के लिए था। एक राष्ट्रद्रोही, भाई पर घात करने वाले इस व्यक्ति को अमरता क्यों दी प्रभु ने। प्लीज़, बताएं।"
"मूर्ख लंतरान, बताता हूं, बताता हूं। सुन। प्रभु राम की नजर में विभीषण से बड़ा सत्य साधक दूसरा नहीं हुआ। विभीषण के जीवन में सत्य सीता के रूप में आया। सीता का अपहरण उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ। दिलचस्प यह कि रावण से उनकी कोई रंजिश नहीं थी। रावण भी छोटे भाई का सम्मान करते थे। तुम्हें याद होगा विभीषण की सलाह पर ही रावण ने मुझे मृत्यु न देते हुए पूंछ में आग लगवाई थी।"
"जी याद है... हर मंगल सुंदरकांड पढ़ता हूं। सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना.. बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना।"
"बहुत सुंदर" हनुमान जी मेरे सर पर हाथ फेरते हुए खुश होकर बोले, "समझे? विभीषण सीता नाम के सत्य के लिए उस महापराक्रमी से भिड़ गया था, जिसके आगे सारा संसार नतमस्तक था। वह आदमी उसका सगा भाई भी था और दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे। उसने पहले उसे समझाया। लेकिन हार गया। तब इस सत्य साधक को राम के पास जाना पड़ा ताकि सीता मुक्त हो और सत्य जीते। विभीषण जानते थे कि राष्ट्रद्रोह के लिए पूरी दुनिया उस पर थूकेगी। लेकिन सीता के लिए। सत्य की जीत के लिए, उन्होंने वह भी स्वीकार किया। उनके लिए सत्य की कीमत राष्ट्र से ज्यादा थी। तो समझ गए नादान लंतरान विभीषण का सत्य और उनकी अमरता?
"जी, महाराज" उनकी बातें सुनकर मेरा दिमाग सन्नसन्न कर रहा था। तो भी मैने खुद को संभालते हुए पूछा, हनुमान जी, हमने तो सुना है कि विभीषण राम भक्त थे। लेकिन आप उन्हें सत्य और सीता का भक्त बता रहे हैं।"
मेरा सवाल सुनकर हनुमान जी बड़े जोर से हंसे और बोले, "राम और सत्य अलग अलग थोड़े ही हैं। सुना नहीं..राम नाम सत्य है।"
लंतरान ने लंबी सांस भरकर कहा, "इसके बाद, भइया में मेरी नींद खुल गई। न गंगा थी, न हनुमान और न ही विभीषण। अब बताओ कि भोर के सपने का क्या मतलब। क्या मुझको हनुमान जी का आशीष मिल गया?
"इतना पक्का है कि कुछ अच्छा होने वाला है तेरे साथ। यह बता आज कल तू कोई विशेष काम कर रहा है?"
"न तो।"
"दिमाग पर जोर दे..ऐसा काम जो तूने पहले कभी न किया हो?"
"हां भइया, याद आया। एक किताब पढ़ रहा हूं, जिससे पहले मैं नफरत करता था। एक साथी आए थे। दे गए थे। बोले थे...इस कमीने की किताब पढ़ और इस आदमी के ऐब निकाल। अब भइया क्या बताऊं। ऐब तो निकले नहीं उलटे किताब इतनी अच्छी लगी कि चौथी बार पढ़ रहा हूं।"
"अरे किताब का नाम भी बताएगा?"
"गांधी जी की आत्मकथा है: सत्य के साथ मेरे प्रयोग।"
"बस बस बस। समझ गया। वो फिल्म देखी है..लगे रहो मुन्ना भाई? यह किताब और रामायण तेरे दिमाग में गड्डमड्ड होकर केमिकल लोचा पैदा कर रही हैं। लेकिन तू परेशान न हो। तेरे सपने से मैं साफ देख रहा हूं कि तेरे अच्छे दिन जल्द आने वाले हैं।"
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