Monday, May 2, 2022

व्यंग्य

 


व्यंग्य 


(जब एक हाथी बारूद भरा फल खिलाके मारा गया था)

 


कुछ खड़खड़ाहट जैसी आवाज़ से नींद टूटी। आंख खुली तो खिड़की पर एक उल्लू बैठा था। "क्यों भाई, हर शाख़ पर तुम्हारा कब्ज़ा है..अब क्या हर घर पर कब्ज़ा करोगे?" मैंने घर आए परिन्दे को छेड़ा। बेज़ुबान जीव ने अपनी बड़ी-बड़ी गोल आंखों से मुझे दो पल देखा और रोने लगा।

"हम क्या कब्ज़ा करेंगे" मैं चौंक गया। उल्लू बोल रहा था। मैं उसके पास चला गया। वह बोला, " हमारी जान पर आफत है और आपको छेड़छाड़ में सुख मिल रहा है...आदमी हो न, तभी!!"

"क्या!?" मैं उल्लूवाणी से अकबकाया हुआ था...यह बोल कैसे रहा है.. चलो वो बोल भी रहा है तो मैं समझ कैसे रहा हूं..कहीं मेरा शरीर उल्लू में तो नहीं बदल गया...कहीं मैं उल्लू तो नहीं!?

"नहीं, आप उल्लू नहीं" इस बार उल्लू सिर्फ बोल नहीं रह था, वह मेरे मन में उठ रहे सवालों को पढ़ भी रहा था। वह बोलता गया, ''आप आदमी हैं। आदमी यानी कि सबसे घटिया जीवधारी। उल्लू छोड़िए, आप चीटी नहीं बन सकते।''

मेरे मन में उठ रहे सवालों का खुद-ब-खुद जवाब देते हुए उल्लू बोला, " दरअसल, जंगल में सुल्तान शेरख़ान ने मानव इतर सभी पशु-पक्षियों की रैली आहूत की है। शेरख़ान को लगा कि आप बिना भेदभाव के कवरेज करेंगे। इसलिए आपको बुलाया है। हम लोगों की ज़बान समझने की कुव्वत भी शेरख़ान ने भगवान पशुपतिनाथ से कहकर दिलाई है।"

मैंने हामी भर दी और तय वक़्त पर नेशनल पार्क के गेट पर पहुंच गया। वहां उल्लू पहले से राह दिखाने के लिए मौजूद था। वह मेरे सर पर बैठ गया। 

"सर" वह बैठते ही बोला,"रैली केरल में गर्भवती हथिनी की हत्या के विरोध में है। वहां, मेरे जैसे उल्लुओं के मुद्दे छूट जाएंगे। मैं चाहता हूं कि आप मेरा मुद्दा भी अपनी रिपोर्ट में उठाएं।" 

"ओके, गो अहेड"

"सर, जब से हैरी पॉटर बुक्स और फिल्म्स आई हैं तब से मैं परेशान हूं। बच्चे, खासकर अंग्रेज़ीदां बच्चों में उल्लू पालने का शौक पैदा हो गया है।...हर शाख पर उल्लू छोड़िए, भाग कर छिपने की जगह भी नहीं मिल रही है... इतना भी नहीं सोचते कि हॉगवर्ट्स स्कूल हिंदुस्तान में नहीं गप्पीस्तान में है।"

इस बीच रैली स्थल आ चुका था। मैंने उल्लू को सर पर बिठाकर एक सेल्फी ली और आगे बढ़ गया। शेरख़ान एक ऊंची चट्टान पर विराजमान थे। मुझको देखते ही मेरी ओर बढ़ चले। मैं उपस्थित पशु समुदाय को देखने लगा। सबसे आगे गिलहरी और खरगोश जैसे जानवर थे। फिर सियार, कुत्ते, भेड़िए और हिरन।  छोटे से बड़े के क्रम में बिठाया गया था। सबसे पीछे हाथी थे। पक्षी पेड़ों पर थे।तकनीकी समस्या के मद्देनजर मछलियां नहीं आईं थीं।उनकी नुमाइंदगी क्रोकोडाइल और हिप्पोपोटेमस कर रहे थे। सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि शाकाहारी और मांसाहारी, सब साथ बैठे थे। और, हंस-बोल रहे थे।

तब तक शेरख़ान मेरे सामने आ चुके थे। उन्होंने अपनी आइकोनिक दहाड़ और पूंछ लहराकर मेरा स्वागत किया। 

"आइए" शेरख़ान ने कहा,"मैंने आपकी सीट अपने बराबर  रखी है।"

हम दोनों चट्टान की तरफ चल दिए। इस बीच बातचीत होती रही। मैंने पूछा,"शेरख़ान साहब, ये खरगोश, लोमड़ी, हिरन और तेंदुआ आदि सब साथ बैठे हैं...अचरज यह कि तेंदुआ आदि और आप खुद प्रथम कोटि के मांसाहारी हैं.."

शेरख़ान मेरी बात सुनकर चलते-चलते रुक गए। अपनी लाल-लाल आंखों से मुझे देखने ले और बोले, "हम जानवर हैं। नरपिशाच नहीं। भूख लगती है तभी खाते हैं और खा भी तब पाते हैं जब शिकार कर पाते हैं..यहां एक प्लेट हिरन देना जैसी कोई व्यवस्था नहीं है।...मैंने अनगिनत हिरन खाए हैं। उसे मारता तो हूं पर उससे नफरत नहीं करता। हिरन भी मुझसे नफरत नहीं करते। किसी ने आज तक मेरे सोने के समय पेट में सींग नहीं घुसेड़ा। हम दोनों जानते हैं कि एक को मारने का अधिकार प्राप्त है और दूसरे को बचके भागने का। वैसे,आज के लिए मैंने सभी मांसाहारियों से कह रखा था कि घर से खा कर आएं ताकि रैली में डिस्टरबेंस न हो।"

इस बीच रैली में आया पशु समुदाय अधीर हो रहा था। हाथी के हत्यारों को

दांत से काटो

xxxसालों को..

भीड़ नारे लगा रही थी।


 शेरख़ान ने मेरी तरफ देखकर कहा, ''चलिए, सभा की कार्यवाही शुरू की जाए।''

उधर शेरख़ान ने इशारा किया और कोयल ने मंच की ज़िम्मेदारी सम्भालते हुए मच्छर जी से बोलने का आग्रह किया। मच्छर जी बेआवाज़ उड़कर माइक तक आए लेकिन उनसे पहले शेरख़ान बोलने लगे, " दखल दे रहा हूं क्योंकि यह बताना जरूरी है कि मच्छर धरती का सबसे बहादुर प्राणी है। एक बूंद खून के लिए मौत से रोज़ाना भिड़ने वाला दूसरा शख्स मेरी प्रजा में नहीं। तो, तालियों से स्वागत कीजिए मच्छर जी का।"

मच्छर जी ने माइक संभाल लिया और अपनी महीन, सुरीली आवाज़ में बोले, "आप सबको मेरा लाल सलाम। पालघाट में मारी गई हथिनी बहन को आज इस मंच से श्रद्धांजलि देता हूं और आदमी को चेतावनी कि उसने अगर इस तरह की हरकत दोबारा की तो मैं ऐसी तबाही मचाऊंगा कि लोग कोरोना को भूल जाएंगे। याद रखना कि हर साल दस लाख लोग मेरे दंश से मरते हैं।...दस लाख मानव मौतों को लेकर गुस्सा आए तो आदमी सोच ले कि वह कितने जीव रोज़ मारता है...और हां, मेरे सर्वनाश की साजिश रचने से पहले इतना और जान ले कि पशुपतिनाथ ने कोई चीज़ ख्वामख्वाह नहीं बनाई है। मैं कितना इम्पोर्टेन्ट हूं, अगर बताऊं तो किताब लिख जाए। तू बस इतना जान ले कि मेरे लारवा पानी मे पड़े आर्गेनिक कचरे को खाते रहते हैं। तभी तुझे नदी, तालाब का साफ पानी मिलता है। ये लारवा, मछली को बहुत प्रिय हैं। और, मछली किसे प्रिय है?" मच्छर ने खुद को आदमी से वरिष्ठ बताते हुए कहा कि मैं डेढ़ करोड़ साल पहले डायनासोरों के साथ खेलता था। आदमी तो 60 लाख साल का बच्चा है।

मच्छर जी के बाद लगभग सभी जीवों ने हथिनी की हत्या पर आक्रोश जताया। हाथी ने गणेश चतुर्थी, सिद्धि विनायक, अष्टविनायक की पूजा को स्वांग करार देते हुए आदमी को फ्रॉड एवं धरती का बोझ बताया। बन्दर ने भी आदमी के आचरण पर दुख जताया और कहा कि हमारी पीड़ा गहरी है क्योंकि आदमी भाई लगता है।

आख़िरी भाषण शेरख़ान ने दिया। उन्होंने आदमी की श्रेष्ठता की सोच को सिरे से खारिज़ किया। ऐसा क्या है जो हम नहीं कर पाते। आदमी(बहुत) खाता है: हम भी (संतुलित) खाते हैं। वह सोता है: हम सोते हैं। वह बच्चे पैदा करता है: हम भी करते हैं। यही तीन सुख हैं जो हाथी और चीटी दोनों को उपलब्ध हैं। मानव मंगल पर जाकर भी भोजन, नींद और नर/मादा तलाशेगा। हमारा बीटल यही सुख धरती पर गोबर की गोली लुढ़काते हुए हासिल कर लेता है।

शेरख़ान ने कहा, मुझे वह वक़्त भी याद है जब यह आदमी हमारे साथ जंगल में रहता था। एक दिन यह पिछले पावों पर खड़ा हो गया और फिर सारे जंगल में शोर मचाता फिरता रहा। सबके पास जाता और कहता, मैं अब जानवर नहीं रह गया। सारा जंगल उस दिन हंसता रहा था। फिर एक दिन यह हिरन की खाल लपेट कर आ गया और सबको नंगा-नंगा कहता रहा। एक दिन इसने पत्थर मार-मार के 20 खरगोश मार डाले। 

जंगल में भोजन संग्रह पर रोक है। मुझे आदमी को आखिरकार जंगल से बाहर खदेड़ना पड़ा।

शेरख़ान ने कहा: आदमी में एक बड़ा ऐब यह है कि यह गर्व बहुत करता है। काहे का गर्व!! आदमी थूकता है तो कोरोना फैलता है। मधुमक्खी थूकती है तो शहद बनता है। ज़रा-सी चीटी अपने वजन का 20 गुना उठा लेती है। और गोबरखोर गुबरैला वज़न का सौ गुना उठाता है। तो भी यह नकली दोपाया ऐंठा घूमता है। अरे, उसैन बोल्ट भी चीते से तीन सेकंड धीमे हैं। 

शेरख़ान ने कहा: आदमी की एकमात्र उपलब्धि कूड़ा उत्पादन है। हर दिन 35-40 लाख टन कचरा। अरे, हम जंगली जानवर भी यहां रहते आए हैं। कोई कूद नहीं। यहां मल-मूत्र खाद है। मृत शरीर ह्यूमस। गुटखा-तम्बाकू खाते नहीं। थूकने का हुनर हमें वैसे भी नहीं आता।

अंत में शेरख़ान ने आदमी को सुधरने की चेतावनी दी और कहा कि न मानने पर पशुपतिनाथ से शिकायत की जाएगी। 

सभा का समापन भृमर गीत से हुआ। इसके लिए कोयल ने भँवरा जी को आमंत्रित किया। भँवरा जी ने गीत सुनाने से पहले स्पष्ट किया कि उसे यह गीत फूल का है। आदमी से त्रस्त एक फूल का। फूल ने भँवरे को सुनाया था। ये रहा गीत


हम हैं फूल हमारा मजहब हंसना, महकाना, सरसाना।

तुम हो कौन तुम्हारा मजहब क्यों धरती में आग लगाना।।

हमने डायनासुर देखे हैं तुम जिनके फॉसिल चुनते हो।

खशबू की सौं हमने देखा बड़े बड़ों का आना-जाना।।

पूजे है अवतार पयम्बर तुझसे भी ज़्यादा हमने।

धर्म हमारा खुशबू वाला ना बदला तो ना बदला ना।।

गंगा बैतरणी कर डाली फाड़ा तूने नील गगन।

यह जग कितना सुंदर होता जो तू पैदा ही होता ना।।













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