Monday, May 2, 2022

चुटहिल जी का काव्य संसार

 चुटहिल जी का काव्य संसार


*अजय शुक्ल*



घर का नाम मुन्नू। ऑफिशियल नाम राम भरोसे। पुराना पेशा रोडवेज़ में कंडक्टरी। नया पेशा काव्य रचना। तखल्लुस चुटहिल। चलने में थोड़ा मचकते थे। जवानी में एक लड़की के बाप ने उनकी बाईं टांग पर लाठी का प्रयोग किया था। चुटहिल नाम उसी लाठी, सॉरी, लड़की की स्मृति में था। 


ठीकठाक आदमी थे, रिटायरमेंट से पहले। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने जीवन के अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प ले लिया। इन सपनों में से एक था कविता लिखना। बस उसी दिन से मुहल्ले वाले उनको देखकर भागने लगे हैं क्योंकि वे जब भी घर से बाहर निकलते हैं, एक नई कविता उनकी जेब में फड़फड़ा रही होती है।


मेरे लिए उनके काव्य से बचना मुश्किल होता है। मुहल्ले के हैं। और, म्युनिसिपैलिटी के स्कूल में साथसाथ पढ़े भी हैं। सो, जब चाहता हैं, इस बेरोजगार पत्रकार के पास आ धमकते हैं। अभी दो दिन पहले ही वह अपनी सद्य प्रसूता रचना के साथ सवेरे सवेरे नमूदार हो गए थे।


"बिलकुल लेटेस्ट है" सोफे पर पसरते हुए  बोले, "फ्रेश फ्रॉम द अवन।"


"अरे भाई, चाय तो..." मैंने कहा।


"पहले कविता" उसने बात काटते हुए कहा और शुरू हो गए...


एक था कुत्ता

एक था कुकुरमुत्ता

कुकुरमुत्ते ने कहा आदाब

कुत्ते ने कर दिया पेशाब

कुकुरमुत्ता रात भर रोता रहा

कुत्ता रात भर सोता रहा

छप्पर टपकता रहा, और 

बिलौटा मलाई गटकता रहा


मैंने कविता सुनकर माथा पीट लिया। "इसका क्या अर्थ है?" मैंने पूछा।


"येल्लेव!वह ठहाका मारकर हंसे, "कैसे संपादक हो जी? कविता भी नहीं समझते!"


"तुमहीं बता देव।" मैंने खीझ कर कहा।


वह फिर हंसा, "जब मैंने कविता लिखी, उस क्षण इसका अर्थ बस दो लोग जानते थे। एक मैं। और दूसरा ईश्वर। और, इस वक्त इसका मतलब सिर्फ एक व्यक्ति जानता है। और, वह है ईश्वर। मेरा दिमाग तो अब दूसरी कविता पर विचर रहा है। मुझे फुर्सत कहां। मीनिंग खोजना तो अब समीक्षकों का काम है।"


"अबे गधे" मैंने दोस्ती का नाजायज फायदा उठाते हुए कहा, "समीक्षा तो कोई तब करेगा, जब यह कथित कविता किसी पत्र पत्रिका में छपेगी!"


मेरी बात पर वह विद्वानों की तरह मुस्करा कर बोले, " यह 21वीं सदी है, संपादक जी। आज का रचनाकार अखबारों और पत्रिकाओं का मोहताज नहीं। अभी प्रकाशित करता हूं फेसबुक पर और देखना क्या रिएक्शन मिलता है समीक्षकों का।"


इतना कहकर वे अपना फोन निकाल कर कविता टाइप करने में लग गए। मुझे हाज़त महसूस हो रही थी।  मैं मौका पाकर बाथरूम में जा घुसा। 


पंद्रह मिनट बाद फ्रेश होकर निकला तो चुटहिल जी मेज़ पर पांव धरे बीड़ी पीने में मस्त थे। मुझे देखते ही प्रफुल्लित हो उठे। बोले, "जितनी देर में तू निपटा, उतनी देर में मैंने एक और कविता निषेचित कर दी। अब तू चाय पिला तो प्रसव भी कर दूं। मेरे पास नौ महीने का झंझट नहीं। यहां तो चट मंगनी, पट बच्चा।"


मेरे में अब दाई बनने की हिम्मत न थी। "घर में चीनी नहीं है" मैंने बचने की कोशिश की।


"कोई बात नहीं। गुड़ की बना ले। वह भी न हो तो कश्मीरी चाय बना ले। नून टी।" चुटहिल जी कविता के मुख प्रसव पर आमादा थे। मुझे चाय का इंतजाम करना पड़ा। कविता भी सुननी पड़ी। इस बार उन्होंने आधुनिक रोमांटिक कविता सुनाई। आप भी सुने:


तुम किसी काठ की कुर्सी पे तो बैठा न करो

हॉट हो बेहद कहीं काठ सुलगने न लगे

आग कोठी में जो लग जाए तो फिर क्या होगा


"चुप बे कवि की दुम!" कविता सुन कर मेरे तनबदन में आग लग चुकी थी। "अब आगे एक भी लाइन नहीं सुनूंगा। चाय पी और कट ले।"


मेरे गुस्से पर वह मंदमंद मुस्कराने लगे। बोले, "अगर दुत्कार से फर्क पड़ता तो मैं कविता लिखना जाने कब का छोड़ चुका होता। तुम अनपढ़ क्या जानो, कवियों को कितना सहना पड़ता है। इलियट को भी कोई समझ नहीं पाता था!? लेकिन बाद में उनको नोबेल मिला। एमिली डिकिंसन को तो तब कवि के रूप में जाना गया जब वे मर चुकी थीं। देखना एक दिन जब मुझे ज्ञानपीठ मिलेगा! तब यही मोहल्ला फख्र के साथ कहेगा कि चुटाहिल यहीं रहते हैं। हो सकता है कि बाद में जब कोई सरकार नाम बदलने की ठाने तो इस भन्नाना पुरवा का नाम चुटहिल नगर रख दिया जाए।"


इतना कहकर चुटहिल जी चल दिए। मैंने राहत की सांस ली और आंख मूंद कर सोफे पर पसर गया। सहसा कुछ आहट हुई। मैंने आंख खोली तो चुटहिल जी वापस खड़े थे। बोले, "जा ही रहा था कि सोचा तुझे फेसबुक दिखा दूं। कुत्ता और कुकुरमुत्ता को एक घंटे में 100 लाइक्स मिले हैं। और, पचास लोगों ने सकारात्मक समीक्षा की है।"

 

अगले पल मैं फेसबुक पर प्रकाशित चुटहिल जी की कुकुरमुत्ता देख रहा था। लाइक्स की संख्या दो मिनट में 100 से बढ़कर 115 हो चुकी थी। कमेंट भी 60 जा पहुंचे थे। एक समीक्षक ने लिखा था गजब। दूसरे ने सुपर। तीसरे ने सुपर से भी ऊपर। चौथे ने लिखा था लाल सलाम। पांचवें ने जयश्रीराम। आदि आदि इत्यादि। एक ने कुत्ते में आततायी तानाशाह और कुकुरमुत्ते में गरीब आम आदमी देख लिया था।

मैंने चुटहिल जी को नमन किया और बदजबानी के लिए माफी मांगते हुए कहा, "आपके नोबेल और ज्ञानपीठ का इंतजार कर रहा हूं।













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