Wednesday, May 18, 2022

वन टू का फोर

मदारी और जमूरा
एक रुपए को
दो में बदलने का
झूठ दिखाते हैं
आपसे आपकी 
चवन्नी ले जाते हैं
आप ताली भी बजाते हैं
ग़ज़ब तो यह है 
आप खुश भी हो जाते हैं 

Sunday, May 15, 2022

गीत

  बसन्त 

............ 



खेतों में पसरा है केसर 

अमराई भी बौराई,

पके बेर-सी हुई दोपहर 

मशक बजाते शहनाई।।


घटघट, पोरपोर रस-विह्वल 

हिरदय में बाजे मिरदंग,

नील गगन भी मगन-मगन है 

देख-देख धरती के रंग।


देखो तो पलाश ने कैसे बन-बन

 मन-मन अगन लगाई।।


खेतों में पसरा है केसर 

अमराई भी बौराई...


नींद खुली औ सपना टूटा

बूढ़ा तन फिर अंगड़ाया,

दादा जी ने सुबहसुबह

'जब दिल ही टूट गया' गाया।


मोतियाबिन्दी आंखों में भी

वापस आई बीनाई।।


खेतों में पसरा है केसर 

अमराई भी बौराई....

गीत

 न आना है न जाना है

.................................


न आना है न जाना है

न कोई पता ठिकाना है

फिर भी क़ासिद का इंतज़ार

यह दिल कितना दीवाना है

न आना है न जाना है....


ऐसा भी नहीं तुम्हारे बिन

रातें काटीं तारे गिन गिन

निंदिया को लेकिन मालुम है

कि सपना कौन दिखाना है

न आना है न जाना है....


जो एक प्यार का घूंट पिया

काबा, काशी बन गया हिया

मन के वृंदावन में अब तक

राधा का आना जाना है

न आना है न जाना है....

ग़ज़ल

          आंख मीचो मत

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आंख मीचो मत अंधेरा और गहरा हो चलेगा

एक शोले से घना जंगल सुनहरा हो चलेगा


सीख लो गूंगे की मानिंद अब इशारों की ज़बां

ढाई आखर बोलने पर कल से पहरा हो चलेगा


नहर लाओ काटकर बरबाद न हो फसल ये

अश्क से सींचोगे तो ये खेत सहरा हो चलेगा


भूल कर बन्दर के हाथों जो थमाया उस्तरा

वो हजामत होगी तेरी लाल चेहरा हो चलेगा

                             






Tuesday, May 10, 2022

कानपुर फाइल्स: 1984

 कानपुर फाइल्स: 1984

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वर्ष 1984। तारीख 31 अक्टूबर। दिन मंगलवार। स्थान–मॉल रोड, कानपुर। समय–शाम साढ़े तीन बजे।

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नून शो छूटने पर अप्सरा, सुंदर, रॉक्सी, रीगल और हीर पैलेस से फ़िल्म देखकर निकले दर्शकों के हुजूम में किसी को भी न पता था कि कानपुर नरसंहार की तैयारी में जुटा हुआ है। प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को उनके सुरक्षा गार्ड मार चुके थे। मौत की सरकारी घोषणा अभी नहीं हुई थी लेकिन खबर सबके पास पहुंच चुकी थी। सतवंत और बेअंत के नाम तो अभी न खुले थे पर यह बात फैल चुकी थी कि क़त्ल 'सरदारों' ने किया है–इन्दिरा के बॉडीगार्डों ने।

शहर के बाजार दोपहर से ही बन्द होने शुरू हो गए थे। अच्छे बच्चे घर पहुंच चुके थे। बुरे बच्चे लाठी, हॉकी और सब्बल आदि लेकर सिक्खों को तलाश रहे थे। बुरे बच्चों के ये हुजूम मॉल रोड में भी घूम रहे थे। अचानक पांच-पांच सिनेमा हॉल छूटे तो इन लिंचरों के भाग्य जाग गए। विडम्बना यह कि सिनेमा घरों से निकल रहे सरदारों, यानी भीड़ के भावी शिकारों को भान तक नहीं था कि उन पर क्या बीतने जा रही है। 


टॉकीज से निकलने वालों में कितने सिक्ख थे? यह चिंता आप न करें। यह भी न सोचें कि उनके साथ क्या हुआ। 

यह एक आदमी की कहानी है, जिसका नाम...चलिए अमरीक रख लेते हैं।


छह फीट को छूता गोरी रंगत और भूरी आंखों वाला यह सिक्ख युवक जैसे ही हीर पैलेस से बाहर निकला तो सड़क पार रियो रेस्टोरेंट के बाहर लाठी-डंडों से लैस एक भीड़ नारेबाज़ी कर रही थी। उसने कान लगाए। नारा था: खून का बदला खून से लेंगे। "की होइया", अमरीक ने बराबर से चल रहे एक अन्य सिक्ख युवक से पूछा। "मैनू की पता" युवक इतना कहकर आगे बढ़ने लगा। तभी सामने से आ रही आवाज़ों ने उसे रोक दिया...अबे देख दो-दो सरदार। अमरीक के पांव भी ठिठक गए। उसने अपने और अन्य सिक्खों के लिए हमेशा सरदार जी का सम्बोधन सुना था। उसे अपमान महसूस हुआ। "क्या बात है भाई...क्या हुआ है?" उसने सड़क के उस पार खड़े हुजूम से तेज़ आवाज़ में पूछा। उसकी आवाज़ में डर कहीं न था। डरता तो तब जब उसे खबर पता होती। फिर वह अपने घर में था। कानपुर की पैदाइश थी। वहीं मॉल रोड स्थित एलपी इंटर कालेज से उसने 12वीं तक की पढ़ाई की थी। चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ था। 

तभी एक अद्धा ईंट उसके पैरों पर आकर लगी। वह पैर सहलाने लगा कि उसे "मार सरदार को" का हांका सुनाई दिया। अमरीक ने आंख उठाकर देखा– भीड़ उसी की तरफ बढ़ रही थी। सहसा उसे महसूस हुआ कि वह अकेला है। उसने नज़र दौड़ाई। सब तितर-बितर हो चुके थे। पास में दूसरा सिक्ख युवक ज़रूर खड़ा था। कांपता हुआ। अमरीक के अंदर शिकारी के सामने होने पर शिकार के अंदर उपजने वाला आदिम भय जग चुका था।

"भाग सरदारे भाग" वह चीखा और दौड़ पड़ा। वह नरोना एक्सचेंज के बगल से एलपी इंटर कॉलेज की तरफ भागा और दूसरा सिक्ख युवक घसियारी मंडी की तरफ। पर वह कैनाल रोड पहुंचने के पहले ही सड़क पर गिर गया। अमरीक ने भागते-भागते देखा: भीड़ युवक को लाठियों से पीट रही है। 


उसका क्या होगा? अमरीक के पास यह चिंता करने का वक़्त नहीं था क्योंकि भीड़ का दूसरा टुकड़ा उसी की तरफ भागता आ रहा था। वह पूरी ताकत से दौड़ा लेकिन शिकारियों का फेंका गुल्ली-डंडे वाला डेढ़-दो फीट का डंडा उसके पांवों में इस तरह आ फंसा कि वह मुंहभरा गिरा।

अमरीक के पास अब ज़्यादा विकल्प नहीं थे। उस पर लाठी बजनी शुरू हो गई थी। उसने खुद को गर्भस्थ शिशु की मुद्रा में सिकोड़ कर अपना आकार कम कर लिया। लातें रिबकेज के नीचे मारी जा रही थीं और लाठी सर पर। सर पर पगड़ी थी। 

"पहले इसकी पगड़ी नोच तभी तो सर फटेगा सरदार का" अमरीक ने सुना। उसने अपनी 'पाग' ज़ोर से पकड़ ली। पर कोई फायदा नहीं। लिंचरों ने उसे कॉलर पकड़ कर खड़ा किया। कोई भारी चीज़ माथे पर दे मारी और कई हाथों ने मिलकर पगड़ी नोच दी। "अब दे लाठी इसके खोपड़े पर" अमरीक ने सुना। उसने आंखे बंद कर रखीं थीं। वह लड़ नहीं रह था।  वह बेहरकत खड़ा था। सिर्फ ओंठ हिल रहे थे। वह वाहे गुरु का जाप कर रहा था। तभी उसके सर पर लाठी पड़ी। उसे लगा कि वह बेहोश हो जाएगा। लेकिन उसी क्षण उसके कानों ने जो सुना तो दिमाग़ को बेहोशी का कार्यक्रम पोस्टपोन करना पड़ा।

"ये लो, मैं चापड़ ले आया..अब लाठी रखो...बस एकइ झटका मा उद्धार.."

अमरीक ने आंखें खोल दीं। एक लिंचर ने चापड़ थाम रखा था। उसने अमरीक के बाल पकड़ लिए और एक अन्य आदमी ने पूरा जोर लगाकर गर्दन झुका दी।


अमरीक के शरीर में सहसा मानो हाथी जितना बल आ गया और जैसे ही चापड़ चला उसने झटका देकर खुद को बचा लिया। चापड़ गर्दन की जगह केश पर पड़ा। अमरीक फिर भाग पड़ा।


एलपी इंटर कालेज में पढ़े अमरीक को वहां के सारे रास्ते मालूम थे। वह कॉलेज गेट से दाहिनी ओर मुड़कर रीगल के पिछवाड़े से होते हुए गल्ला गोदाम के पास रेल की पटरी को जा सकता था। या, फिर वह एबी विद्यालय की तरफ जा कर कैनाल रोड निकल सकता था। 

न..न…न...! दिमाग़ ने रोका। एड्रेनलिन रश के कारण दिमाग़ शकुंतला देवी की तरह कैलकुलेट कर रहा था और टांगों में मिल्खा सिंह की तरह भाग रही थीं। हत्यारों की सांसें वह अपनी गर्दन पर महसूस कर रहा था। 

न..न…न...! कॉलेज गेट 200 मीटर दूर है...,दिमाग़ ने कहा बाएं मुड़ और अमरीक मानो टेक-ऑफ कर गया। वह एबी विद्यालय से कैनाल रोड की ओर भागा। भागते भागते उसके जब वह सड़क से 50 मीटर दूर रह गया तो उसे एकदम रुक जाना पड़ा: सामने हत्यारों का दूसरा जत्था टहल रहा था!! दिमाग़ इमरजेंसी मोड में आ गया। आंखों ने चौथाई सेकेंड में दाएं-बाएं का नज़ारा लिया और पलक झपकते ही अमरीक वहां रखे कूड़े के डिब्बे में कूद गया। हत्यारे कूड़े के डिब्बे के बगल से भागते हुए कैनाल रोड पहुंच गए, जहां नए जत्थे से मिलकर वे नए शिकार तलाशने में जुट गए। अमरीक उनके दिमाग़ से हट चुका था।


अमरीक की जान बच गई थी। एड्रिनल ग्लैंड सुस्त हो चुकी थी। धड़कन और सांसें सामान्य हो रही थीं। उसने गर्दन का पसीना पोछा। पसीना गाढ़ा था। उसने हथेली देखी, उस पर खून लगा हुआ था। उसे अब दर्द का अहसास होने लगा था। वह शरीर की टूटफूट का मुआयना करने लगा। माथे पर घाव, पसलियों में इतना दर्द की चौथाई से ज़्यादा सांस खींचना मुश्किल। स्क्रोटम पर भी बहुत लातें पड़ी थीं। वहां का दर्द सिर्फ मर्द ही जानता है।


मौत के मुंह से निकलने के बाद अब उसे प्यास भी लग रही थी। पानी की तलब के साथ ही उसे अपने घर की याद आ गई...नन्ही बिटिया अमृतबानी, सुरजीत उसकी ज़नानी, माता-पिता और छोटा भाई...सब कितना परेशान होंगे। पर उसकी अपनी इतनी गम्भीर थी और मौत का भय इस क़दर तारी था परिवार पर कंसन्ट्रेट न कर सका। वह होश खोने लगा....।


होश आया तो अंधेरा हो चुका था। हवा में नवम्बर वाली खुनक थी। अमरीक को तरावट अच्छी लगी। वह हिम्मत कर कूड़े के डिब्बे से बाहर निकला और सशंकित कदमों से कैनाल रोड तक आ गया। सड़क सूनी थी। ट्रैफिक नदारद। कानपुर का सर्वव्यापी रिक्शा भी दूर-दूर तक नहीं। वह सोचने लगा...घंटाघर से चावला मार्केट के लिए टेम्पो तो मिल ही जाएगा! वह मॉल रोड की तरफ बढ़ चला। पर चाइनीज़ रेस्टोरेंट चुंग फ़ा से आगे रास्ता नहीं था। मॉल रोड पर लिंचरों का हुजूम मौजूद था।

अमरीक दो कदम पीछे की ओर चला और खड़ा हो गया। अब वह नहीं जानता था कि क्या करे।  इधर-उधर देखने लगा। सहसा उसकी निगाह एक दरवाज़े पर पड़ी, जो शायद उसी के लिए खोल कर रखा गया था। दरवाज़े के बाहर नेमप्लेट लगी थी: चंदर मल्होत्रा। दरवाज़े के साथ ही सीढियां लगीं थीं, जो ऊपर की रिहाइश की तरफ जा रही थीं।

अमरीक बिना सोच-विचार के भीतर घुस गया। दरवाज़ा बन्द किया और सीढियां चढ़ने लगा। तभी भक्क से रोशनी हो गई। अमरीक ने देखा ऊपर एक युवती खड़ी है। "कौन हैं आप...वहीं रुक जाइए..." युवती ने कहा और हाथ के इशारे से रोकते हुए घर के भीतर मुंह कर के चिल्लाई, "चंदर,  ज़रा आना तो देखो ये कौन हैं।"

वह रुक गया। युवती की आवाज़ मीठी थी। वह तू-तड़ाक की भाषा नहीं बोल रही थी। अमरीक का ढाढस बंधने लगा।

"क्या है..." यह कहते हुए 40-42 साल का एक आदमी सीढ़ियां उतर कर अमरीक के पास आ गया। उससे पूरी बात पूछी। "चलिए, ऊपर चलिए। फिर देखते हैं क्या करना है।" उसने अमरीक को अपनी बाहों का सहारा दे दिया।

"बैठिए" आदमी ने सोफे की ओर इशारा किया और पानी लाने चला गया। कमरे के दूसरे कोने पर वही युवती किसी से फ़ोन पर बात कर रही थी। अमरीक उसे एकटक देखने लगा। इस बीच वह आदमी पानी, चाय, बिस्किट ले आया। "लीजिए" उसने अमरीक से कहा। लेकिन वह युवती को ही देखता रहा। "नाश्ता कीजिए" आदमी ने इस बार तनिक रुखाई से कहा। अमरीक एक सांस में पानी पी गया और युवती से बोला, "मैं एक फ़ोन कर लूं। अपने घर। सब चिंता कर रहे होंगे"

"बिलकुल" युवती फोन कर चुकी थी। उसने तार खींच कर रिसीवर दे दिया। अमरीक ने नम्बर डायल किया और बोलने लगा:


"हल्लो, मैं बोल रहा हूं, अमरीक.. ठीक हूं। परेशान न होना। अभी घंटाघर से टेम्पो पकड़ के आता हूं... पर तू रुक क्यों जाती है...''


"................."


"हमला करने आ रहे हैं...क्यों..तू रुक क्यों जाती है..क्या कहा.. इंदिरा गांधी का क़त्ल हुआ है..?"


"....................."


"बस पांच लोग हैं भीड़ में....ऐसा कर पहलवान को बुला ले जनार्दन पहलवान को भगत है अपना.."


"...................."


"क्या? मशाल लेकर सबसे आगे वही है–जनार्दन! तू, एक काम कर। तू दरवाजे पर बेड, सोफा, फ्रिज और जितनी भारी चीजें हैं–सब वहां लगा दे। मैं बेदी साहब को फोन लगाता हूं। और हां, तू और मा अपनी कृपाण हाथ में ले ले। अलमारी में दो लम्बी कृपाण हैं। एक छोटे को दे दे और एक पापा को।"


"---------------------"


"कक्क्क्क क्या, रोशनदान से पेट्रोल और मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी..धुआं बहुत है...दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलो और जब तक सांस है चलाओ कृपाण..."


अमरीक के हाथ से फ़ोन छूट गया। वह बेहोश हो चुका था। युवती ने रिसीवर कान में लगाया। कुछ देर तक वस्तुओं के आग में जलने की आवाज़ें आती रहीं। फिर फोन डिस्कनेक्ट हो गया।






Monday, May 2, 2022

राखी सावंत और बापू

 राखी सावंत और बापू

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(संदर्भ: हृदय नारायण दीक्षित ने बापू की तुलना राखी से की थी)


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"बापू, क्या बात है..बड़ा मंद मंद मुस्करा रहे हैं?"


"जवाहिर, कुछ न पूछो...बड़ी मुश्किल से हंसी रोक रखी है...सुना तो होगा? मेरी तुलना राखी सावंत से हो रही है!


"तो क्या करना है?"


"तू क्या कर पाएगा तू तो खुद ही दिनरात गालियां खाता रहता है।"


"तो भी बापू...कुछ बताइए तो..."


"अरे उसी का फ़ोन आया था.. राखी सावंत का। बहुत गुस्से में थी। कह रही थी कि हृदय की बात की निंदा कर दूं ताकि आइंदा कोई उसको मेरे से न जोड़े।"


"तो क्या बापू, अब हृदय की बात भी होने लगी है?अभी तक तो..."


"ज़बान को लगाम दे जवाहिर, लगाम। कुछ करना ही चाहता है तो मेरा प्रेस नोट  लिख दे, ताकि राखी अपमान से मुक्त होकर खुलकर नाच सके।"


"ओके बापू, बोलिए। ऐसी बढ़िया अंग्रेजी लिखूंगा कि लोग मेरी तुलना शशि थरूर से करने लगेंगे।"


"अरे नहीं, जवाहिर नहींं। तेरी अंग्रेजियत ने भी बहुत बेड़ा गर्क किया है। तू लिखेगा ट्रिस्ट और वो पढ़ेंगे ट्विस्ट। तू रहने दे जवाहिर। मैं महादेव से लिखवा लूंगा। गुजराती है। मेरे मन की बात समझ जाएगा।"


"बापू, उर्दू में लिख दूं...दरअसल मेरी हिंदी..यू नो.."


"बस कर मेरे बाप, तुझे लोग पहले से गयासुद्दीन गाज़ी से जोड़ते हैं। अब तू मेरी भी ऐसी तैसी कराएगा। अरे, मेरे प्रेस नोट उर्दू में जाएगा तो राजघाट पर वो तमाशा होगा कि तुझे आंख मीचनी पड़ेगी।"


"तो क्या करूं"


"ऐसा कर तू रोमन में हिंदी लिख। आजकल वह चल भी रही है और किसी राष्ट्रभक्त को खटकती भी नहीं। तो लिख, मैं बोलता हूं:


Main original faqeer, Mohandas Karamchand Gandhi hriday ke bayaan ki ghor ninda karata hoon. Bayaan mein rakhi ji ki tulana mujhse ki gai hai, jisase  rakhi ji ka apmanan hua hai. Rakhi maan haani ke liye muaavaze ka daawaa kar sakti hain. Sach baat toh yeh hai ki rakhi meri barabari kabhi nahin kar sakati. Rakhi ki tulna Helen aur Bindu se ho sakti hai, mujhse nahin. Kyonki main toh topless rahta thaa.


"यह क्या है बापू! खुद को टॉपलेस कहलवा रहे हो?"


"क्यों? क्या भूतों को ठिठोली करने का हक़ नहीं?"


"तो भी बापू..."


"क्या है जवाहिर, तुम तो पढ़ेलिखे आदमी हो! क्या कपड़े न पहनने से कोई नंगा होता है क्या? क्या दिन में बारबार कपड़े बदलने से नंगई छिप जाती है? क्या गोमतेश्वर बाहुबली नंगे हैं। किसी जैन ने आज तक उन्हें कपड़ों से क्यों नहीं ढका"






To Gurudeb Tagore

 To Gurudeb Tagore

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Where the mind is full of fear and the head is sunk low in shame

Where ignorance is free

Where the world has been broken up into smithreens

By narrow domestic walls

Where words come out from the depth of falsehood

Where tireless striving  leaders stretch their arms towards destruction

Where the clear stream of reason has lost its way

Into dreary desert sand of dead habit

Where the mind is pulled backwards  by Lucifer 

Into ever shrinking thought and delusion

Into that abyss of wretchedness, 

Gurudev, your country has slipped

स्वर्ण वसंत मालती खाया करो

 


स्वर्ण वसंत मालती खाया करो

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"कपड़े तो बड़े कंटाप झाड़े हो गुरु! नील, टिनोपाल, कलफ...सब टिंच!! लेकिन मुंह काहे लटकाए हो? कोउ कहत तो कि बिलाइत गे रहौ! आँय?"


"चुप रहो, भोपट। यह जेटलैग है। पर तुम क्या जानो। पैसेंजर ट्रेन में चलने वाला हवाई यात्रा के बारे में क्या समझेगा..."


"सही कहत हौ। कबहूं उड़ै॑ केर जरुरतै न भै हमका। डेर लागत है कि कहूं गिरि गेन तौ का हुई!? लेकिन यो जेटलैग का होत है?"


"समझ लो कि लंबी यात्रा की थकान।"


"यो का कहत हौ! पहिले तौ तुम थकतै न रहौ। लेकिन का करिहौ... उमिरौ तौ हुइ गे है। हमते छैसात साल बड़ेहे हुइहौ। अब एक काम करौ। बैदराज ते स्वर्ण वसंत मालती, स्वर्ण वसंत कुसुमाकर, अश्वगंधारिष्ट लइ के खाब सुरू करि देव। थोड़ी सिलाजीतौ। बहुत थोड़ी। तुमका नुस्कानौ करि सकति है।"


"अच्छा बस करो। जिसे देखो ज्ञान पेले पड़ा है। विलायत में भी तुम्हारी तरह ज्ञान पेले पड़े थे।"


"यो का? उलटे बांस बरेली को! विश्वगुरुहू का ज्ञान दें लाग!? सारेन का हुलकी चबांय..."


"चने के झाड़ पर मत चढ़ाओ। मैं विश्वगुरु नहीं। विश्वगुरु तो हमारा देश है। भारत है।"


"हमरे खातिर तौ तुमहीं भारत। तुमहीं महाभारत। वइसे हुन भा का? तुमते का कहेन गोरवा?"


"अरे वही...लोकतंत्र, सहिष्णुता और गांधी के बारे में ज्ञान पेल रहे थे। अब बताओ जिनके यहां कुछ सौ साल पहले लोकतंत्र आया वे हमको बता रहे थे। अरे, तुम्हारे ईसा मसीह से सैकड़ों साल पहले से है लोकतंत्र हमारे यहां। पूरी दुनिया में कत्ल ओ गारत करने वाले सहिष्णुता सिखा रहे थे। और गांधी का तो ऐसा इस्तेमाल करते हैं कि वे कोई डंडा हों। अभी जॉर्ज फ्लॉयड कांड हुआ था। बेचारा आय कांट ब्रीद कह के मर गया। कहीं ऐसा होता है हमारे यहां? बताओ.."


"कत्तई, नहीं। हम ब्वालहें नहीं देतेन। लेकिन तुम यो बताव कि तुम इत्ता सुनिकै चुप्पचाप लौटि कइसे आएव?"


"तो क्या करता?"


"मुंहतोड़ जवाब देतेव..घर मा घुसि के मरितेव।"


"क्या करता उन्हीं के घर में तो बैठा था।"


गांधी मुक्त भारत कैसे बनाएं

 गांधी मुक्त भारत कैसे बनाएं

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"क्या बात है राजन? बड़े उद्विग्न प्रतीत होते हो। आज तो खुशी का दिन है। भारत और पूरा विश्व दो अक्टूबर मना रहा है। तुम भी उत्सव मनाओ। भजन गाओ...वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे..."


"गुरुदेव, झूठ कैसे गाऊं? मुझे दूसरे की पीड़ा की अनुभूति ही नहीं होती।"


"झूठ। तुम तो पशुओं तक की पीड़ा को समझते हो। तभी तो शाकाहारी हो। वैष्णव हो।"



"सही कहा आपने, गुरुदेव। लेकिन, यह पीड़ा जानवरों से आगे नहीं जा पाती।"


"यह तो बड़ा दुखद आश्चर्य है! तुम तो रामभक्त हो राजन। मानस नहीं पढ़ते क्या? गोस्वामी जी कह गए हैं...परहित सहित धर्म नहि भाई/परपीड़ा सम नहि अधमाई।"


"कहां वक्त मिलता है रामायण पढ़ने का। फिर, राजा रामायण पढ़ेगा तो शासन कौन संभालेगा?"


"ठीक है। वैष्णव जन नहीं गा सकते तो ईश्वर अल्ला तेरो नाम का ही भजन गाया कर। राम नाम का सुमिरन हो जाएगा और राज्य में सामाजिक समरसता को बल मिलेगा।"


"गुरुदेव! लगता है आप समाज से कट गए हैं। यह अब वह भारत नहीं जिसे आपने अपनी जवानी में देखा था। आज अगर मैं ईश्वर अल्ला तेरो नाम गाऊं तो मेरे चाहने वाले ही मुझे तड़ीपार कर देंगे।"


"तो बता राजन, मैं तेरी क्या मदद करूं?"


"बस ऐसा कोई रास्ता बता दीजिए कि यह देश चतुर बनिया को भूल जाए।"


"चतुर बनिया! ऐसा क्या!! राष्ट्रपिता या बापू या महात्मा गांधी कहने में तेरी नानी मरती है क्या?"


"गुरु जी, समझा करिए..."


"तो ठीक, तुझे गांधी मुक्त भारत चाहिए न? हो जाएगा। मेरे पास रास्ता है। सरल और सहज।"


"जल्दी बताइए प्रभु। ताकि पुतले को गोली मारने जैसी  हास्यास्पद भड़ैती किसी को न करनी पड़े।"


"बताता हूं। बताता हूं। लेकिन तुझे कुछ सवालों के जवाब देने होंगे। चलो, बताओ: राम नाम का राजकुमार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम में कैसे रूपांतरित हो गया?"


".................."



"नहीं पता। चलो, मैं बताता हूं। उत्तर सिंपल है। रावण ने राम को सताया। उनकी पत्नी को उठा ले गया और आततायी रावण को सबक सिखाने के क्रम में अयोध्या का राजकुमार विराट से विराटतर होता चला गया। वह  भगवान राम बन गया। आज भी जयजयकार होती है। तुम भी तो हुंकार लगाया करते हो.. जय श्रीराम। कुछ समझे?"


"......................."


"इसमें समझना क्या है? सीधी से बात है। जब सीता का अपहरण होगा तो एक स्वाभिमानी व्यक्ति आततायी से भिड़ेगा। तो राजन, अगर चाहते हो कि कोई राम न बने तो अपने राज्य में सीता का अपहरण मत होने दो।"


"..........................."


"राम की तरह कृष्ण भी भगवान माने गए। उनके उद्भव के पीछे कंस की मेहरबानी थी।"


".............................."



"ऐसे ही जलियांवाला बाग़ कांड और लाला लाजपत राय की मौत ने एक बेहद जहीन ऐसे लड़के को भगत सिंह बना दिया जो एक महान दार्शनिक भी बन सकता था।"


"................................"



"और तुम्हारा चतुर बनिया तो रोजीरोटी कमाने अफ्रीका गया था। गोरों ने उसे ट्रेन से फेंक कर महात्मा गांधी बनवा दिया।"


"............................."


"तो हे राजन, अगर तुम चाहते हो कि न तो गांधी या भगत सिंह पैदा हों और न कोई उनका नाम ले तो ऐसा  समाज बनाओ कि गांधी सत्याग्रह की जगह गायक, पेंटर, एक्टर और मास्टर बनने लगें। अब भई, गुरु के नाते मैंने राह दिखा दी। आगे राज्य है तुम्हारा और मर्जी भी है तुम्हारी। पर द्वारिकाधीश की बात हमेशा याद रखना .. 


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।


"राजन, कुछ बोलते क्यों नहीं? चलो कोई बात नहीं बस सबक याद रखना कि अच्छा समाज बनाना है।"


" पर गुरु जी, अच्छे समाज के क्या तत्व होते हैं। यह भी बता दें।"


"रामभक्त के लिए यह जानना बड़ा आसान है। रामराज्य की स्थापना में लग जाओ। और रामराज्य कैसा होता है इसके बारे में गोस्वामी जी खूब बता गए हैं। चलो, कुछ चौपाइयां मैं ही सुना देता हूं:


नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना, नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना


दैहिक दैविक भौतिक तापा। 

राम राज नहिं काहुहि ब्यापा


सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती


अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा




 








 


अकेली औरत

 अकेली औरत

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औरत के लिए भरी दोपहरी में भी शहर में अकेले निकलना कितना कठिन होता है, यह बात औरत ही जानती है। लेकिन अगर उसे कहीं आधी रात में अकेले बाहर निकलना पड़े तो? तो उस पर क्या बीत सकती है? इसका जवाब शायद ही कोई औरत जानती हो। यही बताने के लिए यह रिपोर्ताज़ लिखा है। कतिपय मर्दाना आंखें इस सत्यकथा की मुख्य पात्र को ग़लत नज़रों से देख सकती हैं। पर आप ऐसा न करेंगे। आप सब मेरे FB friends हैं। भरोसा है आप पर।


1994 के जाड़ों की एक रात। तब मैं ‘स्वतंत्र भारत’ कानपुर में काम करता था। दो बज चुके थे। मैं सुबह का एडिशन फाइनल कर चुका था। अब बस घर लौटना था। सिविल लाइन से हर्ष नगर। उस रात मेरे पास संयोगवश कोई वाहन न था। मैं पैदल निकल पड़ा। अभी हडर्ड स्कूल तक ही पहुंचा था कि पीछे से आवाज़ आई, ”भइया, हमहूं।” यह रॉबिन डे थे। मेरे पेस्टर। पेस्टर नहीं जानते तो आप पेजीनेटर कह लीजिए।


रॉबिन पाटलिपुत्र टाइम्स में काम कर चुके थे। वे जगन्नाथ मिश्र और माधवकांत मिश्र का कोई किस्सा सुनाने लगे। बातों-बातों में परेड चौराहा आ गया। कुहासा घना था।आसमान टपक रहा था। हम रिक्शा तलाश रहे थे। रॉबिन की बंगाली आंखों को मुझसे पहले रिक्शा दिखा। वह कैनिको ड्राइक्लीनर्स के बाहर खड़ा था। “खाली हो?” मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाकर रिक्शेवाले से पूछा।


हम जवाब का इंतजार करते-करते रिक्शे के पास जा पहुंचे। रिक्शेवाला एक किनारे खड़ा था। रिक्शे के पांवदान पर अपना बूट टिकाए एक ख़ाकीवर्दीधारी खड़ा था। और, रिक्शे पर एक युवती बैठी थी। युवती ने हाथ जोड़ रखे थे। वह रो रही थी और पांवदान पर रखे काले बूट को छु-छू कर इल्तिजा कर रही थी…साहब मुझे जाने दो…मैं बहुत मुसीबत में हूं…।


मैं थोड़ा और आगे बढ़ा। देखा कि कैनिको ड्राइक्लीनर्स के नीचे सहन में दो ख़ाकीवर्दीधारी स्टूल पर बैठे हैं और ठहाका लगा रहे हैं। मेरी एड्रीनल ग्लैंड सक्रिय होने लगी। मन ने खुद से पूछा: क्या लड़की का सड़क पर निकलना गुनाह है। जवाब मिला नहीं। फिर क्या था। क्रोध उमड़ने लगा। लेकिन मैंने ग़ुस्से पर क़ाबू किया और गंभीर आवाज़ में कहा, “क्यों भाईसाहब, क्या बात है?”


” कौन है बे?” वर्दीधारी रिक्शे से पांव हटाकर मेरी ओर मुखातिब हुआ, “तू क़ाज़ी है कि मुल्ला?”


“मैं कोई नहीं लेकिन मैं किसी को एक औरत की बेइज़्ज़ती नहीं करने दूंगा।” मैं अब भी शांत था मगर अपमान भरी टोन से मैं सुलगने लगा था।


सिपाही मुझे ‘अंदर करने’ की धमकी देने लगा। पर मैंने उसकी धमकी को नज़रअंदाज़ करके रिक्शे पर बैठी औरत से पूछा, “क्या कह रहे हैं ये लोग?”


“कहते हैं, रिक्शे से उतरो” वह रोते हुए बोली, “कहते हैं, थाने ले जाएंगे?


“क्यों?”


“कहते हैं, तुम ग़लत काम करती हो।”


“क्यों दीवान साहब” मैंने हंसते हुए पूछा, “सड़क पर चलना ग़लत काम कब से हो गया?”


“पूछो इससे कि आधी रात के बाद कहां घूम रही है और कहां जा रही है? सिपाही ने पलट कर मुझसे कहा।


मैं जानता था कि किसी के घूमने पर रोक नहीं है। तो भी मैंने औरत से पूछा कि शायद बातचीत में उसकी मुक्ति का कोई रास्ता निकल आए।


“कहां से आ रही हो?”


“अलीगढ़ से। बस से चुन्नीगंज उतरी और रिक्शे से घंटाघर जा रही हूं।”


उसका जवाब क़तई दुरुस्त था। उन दिनों अलीगढ़ और दिल्ली की बसें चुन्नीगंज बस अड्डे से ही आती-जाती थीं।


“अब कहां जा रही हो?” मैंने अगला सवाल पूछा


“घंटाघर से लखनऊ की बस पकड़ूंगी और सोहरामऊ के जाऊँगी”


“सोहरामऊ क्यों?”


“सोहरामऊ थाने से ही मुझे खबर मिली थी?”


“क्या खबर?”


“मेरे आदमी के एक्सीडेंट की। वह टिरक चलाता है।”


मेरा क्रोध चरम पर था। “देखा, किस परेशानी में है यह औरत” मैं लानत भेजते हुए सिपाहियों को मुखातिब हुआ। सिपाही हंस रहे थे।


वह औरत सड़क हादसे का शिकार हुए पति को देखने के लिए तीन सौ किलोमीटर दूर से हांफती-भागती चली आ रही थी और सोहरामऊ जैसी गुमनाम-अनजान जगह जा रही थी; और जनता के रखवाले उसे दबोच कर ठहाके लगा रहे थे! यह मेरे जैसे आदमी के लिए बर्दाश्त करने की बात नहीं थी। मैं ग़ुस्से से दहाड़ उठा, “शरम नहीं आती तुम लोगों को!?”


मैंने पुलिसिया लाठी खाने की मानसिकता बना ली थी। मगर, आश्चर्य! सिपाही मेरे ग़ुस्से को बर्दाश्त कर गए!! शायद वे सड़क पर निस्सहाय खड़े आम आदमी के क्रोध से सहम गए थे!!!


मेरी हिम्मत और बढ़ गई। मैंने उन्हें फिर डपटा। इस बार वे हंसे नहीं। एक सिपाही बोला, “भाई साहब, ज़रा इस औरत के कपड़े और साज-सिंगार भी तो देखिए…” (हां भई, हां। कपड़ों से पहचानने वाले उस ज़माने में भी पाए जाते थे)


“क्या है इसके कपड़ों में?” मैंने पूछा।


“लो, खुद ही देख लो…” यह कहते हुए एक सिपाही ने औरत के ऊपर टॉर्च जला दी।


औरत ने सुर्ख-लाल साड़ी पहन रखी थी। ओठों पर साड़ी के रंग से मैच करती लिपस्टिक थी। चेहरे पर हवाइयों के साथ मेकप भी था, जिस पर आंसू बहने के कारण काजल के धब्बे आ गए थे।


मर्द मैं भी हूं। सो, मेरे दिमाग़ में लाखों साल से पड़े एल्गोरिदम ने सिपाही का इशारा डीकोड करने में देर नहीं लगाई। लेकिन यह दिमाग़ हज़ारों साल की विकास यात्रा भी तो कर चुका है! तो, उसी विकसित मन ने पल भर में संशय के परिंदे को उड़ा दिया: ‘अगर यह वही है तो भी क्या? क्या तुम उसे बोटी के लिए लार टपकाते कुत्तों के लिए छोड़ दोगे?’


मेरा मन निर्मल हो चुका था। मैंने सिपाहियों का इशारा समझने से इनकार कर दिया, “क्या है इन कपड़ों में? अच्छे तो हैं। बस थोड़े सस्ते वाले हैं।”


“तुम अंधे हो या ताली बजाने वाले” सिपाही इशारे में गाली देकर बोला, “ये रंडी है, साली! रंडी!!”


“तो? रंडी होना गुनाह है क्या” मैं सिपाहियों को क़ानून समझाने पर उतर आया था।


“नहीं जी, रंडी होना तो बड़े पुण्य की बात है!!”


“पाप और पुण्य सन्त-महात्मा जानें पर वेश्यावृत्ति किस धारा के तहत अपराध है?”


“तो, अपराध क्या है?”


“ग्राहक पटाते पकड़ा जाना अपराध है और सार्वजनिक तौर पर अश्लीलता का प्रदर्शन अपराध है” मैं अपने सीमित क़ानूनी ज्ञान के आधार पर समझाता चला जा रहा था।


रात सुबह की तरफ़ तेज़ी से भागती जा रही थी और वर्दीधारियों का सब्र और भलमनसाहत चुकती जा रही थी। सहसा एक सिपाही लाठी उठाकर मेरी ओर दौड़ा। लेकिन वह मुझ पर वार कर पाता उससे पहले मेरे साथी रॉबिन डे के अंदर बजरंगबली जाग गए। खास कनपुरिया शब्दावली उच्चारते हुए उन्होंने सिपाही का डंडा पकड़ लिया, “ख़बरदार, जो मेरे सम्पादक जी की तरफ़ आंख भी उठाई तो वर्दी उतरवा दूंगा।”


रॉबिन के एक वाक्य ने मंत्र की तरह काम किया। डंडा गायब हो गया और वर्दीधारी खड़े होकर बुदबुदाने लगे, “भाई साहब, पहले बताना था कि पत्रकार हो…अभी कुछ ऊंच-नीच हो जाता तो…हम लोग पाप से बच गए…अब ये आपकी हैं, जहां चाहें ले जाएं।”


आखिरी बात मुझे अपनी बिरादरी के प्रति अश्लील टिप्पणी प्रतीत हुई। मैंने तमक कर कहा, “हम क्यों ले जाएंगे? इन्हें घंटाघर जाना है, इसी रिक्शे पर चली जाएंगी– क्यों?” मैंने उस औरत की ओर मुख़ातिब होकर कहा।


औरत ने सहमति में सर हिला दिया।


“लेकिन हम ई मेहरिया का न लइ जइबे।” यह रिक्शेवाला था जो अब किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहता था। मैंने उसे बहुत समझाया पर वह न माना। उसने औरत को उतार दिया और तेज़ी से पेडल मारते हुए बड़े चौराहे की ओर निकल गया।


रिक्शा जा चुका था। सिपाही भी मुंह छिपा कर कहीं चले गए थे। सड़क पर अब मैं था। रॉबिन था। और थी वह। वह औरत। वह मेरी कोई न थी।


“तुम इसे घंटाघर छोड़ आओ” मैंने रॉबिन से कहा, “मैं यहां से पैदल हर्ष नगर (घर) निकल जाऊंगा। घर में वो परेशान हो रही होंगी।”


“न भइया न” रॉबिन ने अकेले जाने से इनकार कर दिया,”आगे मूलगंज में फिर नाका होगा…वहां फिर सिपाही रोक लेंगे।”


हम तीनों साथ चल दिए। नई सड़क पहुंचते-पहुंचते एक रिक्शा मिल गया। हम तीनों बैठ गए। मैं खुद से खुश नहीं था। तनाव और खीझ भी थी। मेरी तरह रॉबिन भी चुप था। चुप्पी उस औरत ने तोड़ी, “आपने मेरे लिए बहुत किया…”


मैं कुछ नहीं बोला और दाहिनी ओर सड़क को देखता रहा। कुछ देर बाद औरत ने अपना बैग खोला। कुछ सरसराहट-खरखराहट सुनाई दी तो देखने लगा। औरत ने पान-पराग की लड़ी निकाल ली थी। “लीजिए खाइए” उसने एक पाउच मेरे हाथ में रख दिया, “खाइए-खाइए, तुलसी भी है।”


मुझे तम्बाकू की तेज़ तलब हो रही थी लेकिन मैंने ऑफर ठुकरा दिया। औरत अब क़तई शांत थी। वह मंद-मंद मुस्करा भी रही थी। मैं खुद को परले दर्ज़े का आवारा महसूस कर रहा था। इस बीच मूलगंज चौराहा पार हो गया। कई सिपाही बैठे थे। इस बार औरत के चरित्र पर किसी को शक़ न हुआ। दो मुस्टंडों के बीच जो बैठी थी।


“भाई साहब” वह औरत फिर बोली, “यह बताइए कि क्या इतनी रात में मेरा जाना ठीक होगा?”


जवाब में मैंने उसे सिर्फ घूरा। ग़ुस्से से। बुरी तरह।


“नाराज़ न हों” वह मुस्कराते हुए बोली, मुझे थाने ही जाना है। सोहरामऊ थाने। वहां भी तो पुलिस वाले होंगे!”


“तो, मैं क्या करूँ? तुम्हारे साथ 65 किमी दूर सोहरामऊ थाने चलूं?


“नहीं सर जी। मैं तो यह कह रही थी कि पास में कोई होटल हो तो मुझे वहीं ठहरा दीजिए। पति हादसे का शिकार हो चुका है। कहीं मैं भी किसी हादसे का शिकार न हो जाऊं।”


“अब तुम चुप रहो। सवा तीन बजा है। सोहरामऊ पहुंचते-पहुंचते उजाला हो जाएगा”


रिक्शा थाना कलक्टरगंज पार करके घंटाघर क्षेत्र में पहुंचा ही था कि मुझे कुछ वुल्फ विसिल्स (सीटियां) सुनाई दीं। सीटियों का टारगेट हमारा रिक्शा ही था। बस अड्डा पास ही था। हम रिक्शे से उतर पड़े। देखा, हमारे दाएं-बाएं 16-18 साल के लफंगे मंडरा रहे हैं। एक ने दूर खड़े किसी लड़के को बुलाया, “अबोय चूतिये, इधर आ जा, वो फिर आई है।”


मैंने अपने साथ खड़ी औरत को कटखनी निगाहों से देखा। उसने आंखें ज़मीन पर गड़ा दीं। फिर बोली, “मेरा मायका यहीं बगल में तिलियाने में है। ये वहीं के लौंडे हैं। मुझे पहचानते हैं।”


लड़कों की संख्या तीन-चार से छह-सात हो गई थी। उन्होंने हम तीनों को घेर रखा था। वे औरत के साथ छीना-झपटी पर आमादा थे। “कित्ते में ग्राहक पटा कर लाई हो…वाह, एक साथ दो-दो ग्राहक..हमको भी ले लो एक से भले दो…दो से भले तीन।”


मैं खुद से ग़ुस्सा था। अपने लल्लूपन को कोस रहा था। खुद पर तरस खा रहा था। पर इसके बावजूद मैं यह भी देख रहा था कि वह औरत अब और ज़्यादा परेशान थी। पुलिस वालों ने तो सिर्फ रोका था। यहां तो मामला नोच-खसोट तक जा पहुंचा था।


तभी एक हूटर की आवाज़ सुनाई दी। शायद कोई अफसर आया था। उसी वजह से कुछ पुलिस वाले उस जगह खड़े रिक्शों व भीड़ को खदेड़ने लगे। और, लफंगे भाग गए। मैंने तुरन्त उस औरत का हाथ पकड़ा और बस अड्डे की तरफ दौड़ पड़ा। बस में कुछ विलम्ब था। औरत को वहीं खड़ा कर रॉबिन के साथ मैं पान खाने के लिए कुछ दूर निकल गया। और, जब हम लौटे तो औरत के बगल में एक ‘केश्टो मुखर्जी’ को खड़ा पाया। केश्टो खड़े क्या थे, उस औरत के कंधे पर लदे हुए थे।


केश्टो भभका मार रहे थे। रॉबिन ने कनपुरिया शैली में उनकी खबर ली, “क्यों xxx के चच्चा, यो का करैं मां लाग हौ माxxxद।”


केश्टो वैसे ही अपनी हिचकीमार स्टाइल में बेशर्मी से हंसे। “मेरी बेटी है” वे बोले, “आयम हर अंकल।”


रॉबिन ने इस गंजे कमीने आदमी की खोपड़ी में क़ायदे का झापड़ लगाया। जवाब में वह अपने ऊंचे कुल और नौकरी का हवाला देने लगा। “आर्मी से रिटायर्ड हूं मैं।” इतना कहके इस दारूबाज़ बुड्ढे ने अदृश्य अधिकारी को ज़ोरदार सैल्युट। इतना ज़ोरदार कि खुद भरभराकर गिर गया।


वह उठा तो मैंने पूछा, “अंकल, कहां जा रही है सवारी?”


“इलाहाबाद।”


“और, आपकी बेटी कहां जा रही है?”


“पता नहीं।” उन्होंने पूरी सच्चाई से जवाब दिया।


इस बीच लखनऊ की बस आ गई। मैंने हाथ देकर रुकवाई और दो घंटे की अपनी साथिन को अपने हाथ से धक्का देकर भीतर ठूंस दिया।


बस रेंग ही रही कि पता नहीं किस तरह उसके सामने केश्टो मुखर्जी आ गए। बस चरचरा कर रुक गई। कंडक्टर ने दरवाज़ा खोला और केश्टो अंकल लपक कर चढ़ गए। बस फिर चल दी। भीतर से केश्टो अंकल की आवाज़ सुनाई दे रही थी…मैं आ गया बेटी, मैं आ गया…।


शहीदे आज़म भगत सिंह

 शहीदे आज़म भगत सिंह

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"क्यों रे भगत, यह क्या हुलिया बना रखा है...पीली पगड़ी और हाथ में कट्टा!? 


"मेरा रंग दे बसंती चोला माए रंग दे बसंती चोला...जिस चोले को पहन शिवाजी..."


"तो बेरोजगारी में बहुरूपिया का पेशा अपना लिया है? पकौड़ा फैक्ट्री का क्या हुआ?"


"अंकल, जैसे उम्र ने आपके बाल चर लिए, लगता है वैसे ही राष्ट्रद्रोह की भावना ने आपकी अकल को चर लिया है। हो तो चाचा लेकिन जी करता है कि आपको रावी के पार भिजवा दूं।"


"क्यों गुस्सा होते हो बालक? मैंने कौन सा पाप कर दिया है?"


"इससे बड़ा और कौन सा पाप होगा कि जिस भगत सिंह ने आपकी आज़ादी के लिए फांसी का फंदा चूमा, उसी शहीदे आज़म का बड्डे आपको याद नहीं!... राष्ट्रद्रोही हो आप। गद्दार। खुशकिस्मत हो कि हम लोग सहिष्णु हैं। अफगानिस्तान में होते तो तालिबान कुफ्र के आरोप में मारकर क्रेन से लटका देते।"


"आयम रियली सॉरी...लेकिन यह पगड़ी और कट्टा!?"


"हमने भगत सिंह बनने का फैसला किया है...भगत सिंह बसंती पागी बांधते थे कि नहीं? वे पिस्तौल रखते थे या नहीं?...हमने देश को गुलामी से मुक्त करने का संकल्प लिया है.."


"गुलामी? किससे आज़ादी? अच्छा वह आज़ादी जो जेएनयू वाले कन्हैया कुमार टाइप लौंडे चाहते हैं? अर्बन नक्सल बनोगे? अल्ट्रा लेफ्टिस्ट? ओके..भगत सिंह भी आखिर थे तो लेफ्टिस्ट ही?"


"चच्चू, क्या बकते हो? भगत सिंह और कम्युनिस्ट? बिलकुल नहीं। वॉट्सएप में नहीं हो क्या? भगत सिंह राष्ट्रवादी थे...बिलकुल हमारी तरह। आप नहीं समझोगे। समझेंगी आपकी संतानें जब सौ या पचास साल में वे अल्पसंख्यक हो जाएंगी।"


"लेकिन क्या केवल कट्टा थाम कर भगत सिंह बना जा सकता है?"


"और क्या था भगत सिंह के पास?"


"बहुत कुछ। अगर वाकई भगत सिंह बनना चाहते हो तो बताऊं..."


"बताओ, मैं सचमुच बनना चाहता हूं।"


"तो सुनो। भगत सिंह मातृभाषा पंजाबी के अलावा अंग्रेज़ी, उर्दू और हिंदी के विद्वान थे। वे नास्तिक होने के बावजूद संस्कृत भी जानते थे। वे बांग्ला भाषा में भी दखल रखते थे। और, अपने जीवन के अंतिम दिनों में फारसी सीखने में लगे थे।"


"बाप रे बाप! मगर उन्होंने अंग्रेज़ी और उर्दू क्यों सीखी? ये तो गुलामी की निशानियां हैं।"


"ऐसा? चलो, यह बताओ कि तुम्हें कितनी भाषाएं आती हैं?"


"केवल हिंदी, दसवीं तक पढ़ी है"


"चलो। आगे सुनो। भगत सिंह  भारत और विश्व इतिहास, दर्शन और राजनीति विज्ञान के उच्च कोटि के स्कॉलर थे।"


"हम तो वॉट्सएप यूनिवर्सिटी के छात्र हैं। हमको ऐसा कुछ नहीं पढ़ाया गया।"


"अब आगे सुनो। भगत सिंह बहुत पढ़ाकू थे। उनके प्रिय लेखकों में चार्ल्स डिकेन्स, गोर्की, ऑस्कर वाइल्ड, अप्टन सिंक्लेयर, लेनॉर्ड एंड्रयू, हॉल केन और विक्टर ह्यूगो जैसे दिग्गज शामिल थे। इनमें किसी का नाम सुना है?"


"एक का भी नहीं।"


"तो, और सुनो। एक अनुमान के मुताबिक अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान, 1913 और 21 के बीच उन्होंने 50 किताबें पढ़ डाली थीं। और, कॉलेज में दाखिले के बाद कोई 300 किताबें वे चट कर गए थे। सबसे अधिक पढ़ाई तो उन्होंने 716 दिन की कैद में की। फांसी के वक्त तक वे जेल के अंदर 300 किताबें खत्म कर डाली थीं। जब उनको फांसी के लिए बुलावा आया, उस समय भी वे लेनिन की एक किताब पढ़ रहे थे। किताब का नाम था स्टेट एंड रिवोल्यूशन।"


"दादा रे दादा! भगत सिंह बनना तो बड़ा कठिन है!!"


"फिर!?"


"चच्चा, माफ करो। मैं न बन पाऊंगा भगत सिंह। इससे तो वही अच्छा है..."


"क्या?"


"राम नाम जपना, पराया माल अपना"


"एक बात और। भगत को मुहब्बत पर भी यकीन था।"


"ये तो सबसे कठिन है। वॉट्सएप यूनिवर्सिटी में तो सिर्फ नफरत की ट्रेनिंग मिली है।"


(सार: पिस्तौल से भगत सिंह बनते तो देश में आज लाखों भगत सिंह घूम रहे होते)





भोर के सपने में जब मिल गए विभीषण

 भोर के सपने में जब मिल गए विभीषण

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पितृपक्ष के दौरान पुरखों को जलम्-तिलोदकम् का एक बार भी तर्पण न करने वाले लंतरान जी गली के नुक्कड़ पर टकरा गए। उनके चेहरे पर विचित्र सा आसमानी भाव था। ऐसा भाव मैं पहचानता हूं। यह तभी उपजता है जब उनके मुखारबिंद से घंटे भर से भरी गुटके की पीक की तरह कुछ गिरने वाला होता है। 

"सुनाइए" मैं उगलदान बनकर प्रस्तुत हो गया।


"का बताई भइया, रात मा एक ठइंयां अइस सपन दीख कि दिमाक खराब हुइ गा। सपन मा पहिले विभीषण जी मिले। फिर हनुमान जी। हनुमान जी ने तो हमका पटक के मारा।"


"अरे! तुम तो उनकी टीम के मेंबर हो...जय श्रीराम का हुंकार भी दिन में सौ बार तो करते ही होगे!! राम जी के दर्शन नहीं मिले?"


"न भइया। हनुमान जी के बहुत हाथ जोड़े। लेकिन वे न माने। जवाब में एक चौपाई जरूर सुना गए। वो क्या थी... निरमल मन जन पावा..अब याद नहीं।"


"निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा। यह रामायण की चौपाई है। इसमें राम जी कह रहे हैं कि मुझे बदमाश लोग नापसंद हैं, मुझे भले लोग ही पा सकते हैं।"


"अब बताओ भइया, हम का करी। का नहीं कीन राम जी के लिए!? अजुध्या जी मा लंका कांड तक कर डाला!! बच्चे की जान ले लेंगे क्या?!!


"परेशान न हो। तुम सपना देख रहे थे। सपने झूठ होते हैं। सपने के देवताओं को तुम फर्जी मानो।"


"लेकिन भइया, हम तौ सबेरे चार बजे सपन दीख रहै। अउर, भोर का सपन झूठ नही होत।"


"चलो ठीक। तुम पहले अपना सपना सुनाओ। फिर मैं स्वप्नफलादेश बताऊंगा।"


"तौ सुनौ। हम सपन देख रहे हन...पितृ विसर्जन के दिन गंगा जी, गोलाघाट में धारा के बीच तर्पण कर रहा हूं। तभी मेरी नज़र घाट पर पड़े तख्त पर पड़ती है। का देखता हूं कि तख्त पर एक नमूना बैठा है: नौटंकी में राजाओं द्वारा पहने जाने वाला लंबा फ्रॉकनुमा नेवी ब्ल्यू कलर का रेशमी लबादा। भगवा रंग की सिल्क धोती। सिर पर हीरा पन्ना नीलम से जड़ा सोने का मुकुट। और, बेहद खूबसूरत म्यान में समाई तलवार, जिसे इस शख्स ने तख्त पर रखा हुआ था।


"देखते ही मेरे अंदर कनपुरिया हरामीपन जाग उठता है। मैं नंगे बदन, गीली चड्डी में ही तख्तनाशीन नमूने को पूरे मुरहेपन के साथ सिर झुका के प्रणाम करता हूं: महाराज की जय हो।


नमूना: यशस्वी भव। आयुष्मान भव। पुत्रवान भव।


मैं: ये भो भो भो का भौंक रहे हौ भो...मैं पूरी चिकाई के मूड में आकर भव को कनपुरिया ट्विस्ट दे देता हूं।


नमूना: खबरदार! भो के आगे स भी बोला न तो मेरी चंद्रहास तलवार तेरी गर्दन उड़ा देगी। कल शाम से कानपुर घूम रहा हूं। जानता हूं कि भो के आगे क्या होता है।


मैं: चंद्रहास! आंय!?


नमूना: गंगा नहाते हो, रामायण नहीं पढ़ते क्या? फर्जी हिंदू हो क्या? अरे चंद्रहास माने लंकेश की तलवार।


मैं: अच्छा, तो महाराज लंकाधिपति रावण हैं। रामलीला वाले। गत्ते वाली चंद्रहास लेकर परिहास करते घूम रहे हैं!


नमूना: लंकाधिपति हूं। लेकिन रावण नहीं। विभीषण। असली विभीषण। रामलीला वाला नहीं। और, यह चंद्रहास भी गत्ते की नहीं। असली है। जो शंकर जी ने बड़े भइया को दी थी। उनके मरने के बाद मैंने उनके पार्थिव शरीर से उतार ली थी।


मैं: अबे, गप्पू गप्प गपंगप खां, तू तो हमारे गुरु गप्प शिरोमणि का भी उस्ताद है। काम करेगा? आइटी सेल से बात करूं? फी पोस्ट पांच रुपए...


नमूना: बालक, तू मूर्ख है।


मैं: देखो, अंडबंड न बकना। समझ लेव। रामभक्त हूं। हेंइं पटक के मरिबे। अउर गंगै मा बहा देबे...जय श्रीराम।


नमूना: हा हा हा...नहीं मार पाओगे। मैं तो अमर हूं।


मैं: अमरौती खाए हौ का? राम जी तो सरजू में समा गए और तुम गद्दार, भाई के हत्यारे लाखों साल बादौ जिंदा हौ?


नमूना: कहा न, तुम रामभक्त जरूर हो लेकिन फर्जी। रामकथा की तुम्हे कोई जानकारी नहीं। अन्यथा, पता होता कि प्रभु राम जिन लोगों को अमरता प्रदान कर गए थे, उनमें एक मैं, यानी विभीषण भी था।


मैं: चलो, थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं। अब यह बताओ कि लंका के राजा तो तुम हो। फिर ये राजपक्षा वहां क्या कर रहा है? गद्दी पर तो तुम्हें होना चाहिए था, विभीषण!"


नमूना: राम जी ने अमरता प्रदान की थी। यह नहीं कहा था कि लंका में हमेशा तुम्हारा ही राज्य रहेगा।


मैं: गद्दी खो दी? तुम्हें धिक्कार है। अमरता पाने के बाद भी जो सिंहासन खो दे वह महामूर्ख है। क्या जनता को बरगला नहीं पाए? कुछ नहीं तो सिंहलियों और तमिलों को आपस में लड़वाते!


नमूना: मैं रामभक्त हूं। सत्ता के लिए नीचता नहीं कर सकता था। वैसे भी त्रेता काल में लंका में यक्ष और राक्षस जातियां रहती थी। ये सिंहली और तमिल तो बाद में गए हैं। तुम्हारे बंगाल, ओडिशा और तमिलनाडु से।


मैं: तो तुमको सिंहलियों ने परास्त किया कि तमिलों ने?


नमूना: दोनों ने नहीं। मुझे परास्त किया महाराज विजय ने। वे भी तुम्हारे भारत से गए थे।


मैं: कहां से? यूपी से? नाम तो अपनै लग रहा है!


मैं: न यूपी से। न दिल्ली से। गुजरात से। बाबर की तरह उनका भी राजपाट छिन गया था। बाबर ने इंडिया फतेह किया था। विजय ने लंका को जीत लिया था। तभी तो उनका दिया लंका का प्रतीक चिह्न सिंह है। गिर वाला सिंह। लंका में तो सिंह कभी हुआ ही नहीं।"


मैं: वाह वाह वाह! क्या खबर सुनाई है। लंका को हम लोगों ने दो बार जीता!जय श्रीराम!! अभी प्रेस जाकर रिपोर्ट फाइल करता हूं। जानते हो न, मैं पत्रकार भी हूं। राष्ट्रवादी नाबीना टाइम्स में।


नमूना: पत्रकार हो? लेकिन बातें तो बड़ी बेहूदगी से करते हो।


मैं: अब ज्यादा बमकौ न। मिल गै हौ तो इंटरव्यू दइ देव। फिर अपन रस्ता लेव।"


नमूना: हमको फिलहाल कहीं नहीं जाना। परेड वाली रामलीला का भरत मिलाप देखकर ही जाऊंगा।


मैं: कहां? कहां जाओगे?


नमूना: हिमालय में कहीं बैठकर प्रभु राम का भजन करूंगा। एक साल बाद फिर दशहरे में रामलीला देखने निकलूंगा। अच्छा लगता है। पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। अब पूछो क्या पूछना है?


मैं: यह बताइए कि आपने सगे भाई के साथ विश्वासघात किया। नाभि में अमृत है, यह बात राम जी को बताई। पूरी दुनिया तुम्हे धिक्कारती है। मुहावरे तक हैं तुम पर कि घर का भेदी लंका ढाए। इतने सब के बाद तुम्हे भगवान ने अमरता क्यों दे दी?"


नमूना: यह तो बहुत कठिन प्रश्न है। इसका जवाब मैं खुद त्रेता से खोज रहा हूं। लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। आप, बहरहाल परेशान न हों। मैं पवनपुत्र को बुलाता हूं। हम दोनो हर साल साथ साथ रामलीला देखने निकलते हैं। उनको भी अमरत्व प्राप्त है। वे ज्ञानी भी हैं।




"भइया, अब हमार चोक लेने लगी। डर लगा कि अगर बजरंगबली सच्चीमुच्ची आ गए तो क्या होगा। सारा हरामीपन घुसेड़ देंगे। उधर वह नमूना या विभीषण जो भी था, आंख बंद कर मंत्र पढ़ते हुए हनुमान का आह्वान कर रहा था और इधर मैं घिग्घीबंद गले से हनुमान चालीसा पढ़ने की कोशिश कर रहा था। 


"तभी मेरे पीछे से एक गंभीर लेकिन विनम्र आवाज गूंजी: जय सियाराम, विभीषण। कहो, कैसे याद किया! 


"मैं पीछे मुड़ा तो देखता हूं एक लंबा तगड़ा ब्राह्मण खड़ा है और नमूना उसके चरणों में पड़ा है । ब्राह्मण को देख मेरी धुकधुकी रुकी। मुझे विश्वास हो गया कि वह ब्राह्मण हनुमान नहीं हो सकता। इतना विनम्र और संत जैसा चेहरा बजरंगी का हो ही नहीं सकता। कारों के पीछे चिपकने वाले क्रुद्ध अवतार बजरंगी के पोस्टर से यह चेहरा कतई मेल नहीं खा रहा था। तिस पर इसके पूंछ भी नहीं थी। मेरा भय जाता रहा। मुझे वे दोनों टप्पेबाज लगने लगे। मेरा डबलपना फिर जागने लगा। 

मैं विभीषण से बोला, "क्यों बे लंकापति। तूने ने तो चलो मेकप भी कर रखा है लेकिन इस हनुमान ने तो वह भी नहीं किया। ब्राह्मण के पूंछ तो लगवा देते!"


"यह ध्रष्ट पुरुष कौन है, विभीषण?" ब्राह्मण की गुरु गंभीर आवाज गूंज उठी।


"महाराज, यही वह आदमी है जिसकी वजह से मुझे आपको बुलाना पड़ा" विभीषण ने कहा, "यह खुद को रामभक्त कहता है। मगर गंदी ज़बान बोलता है। पहले मुझसे विभीषण होने का सबूत मांग रहा था। अब आपकी पूंछ देखना चाह रहा है। बहरहाल, इसी के पूछे सवाल से हारकर मैंने आपको बुलाया है।


"अच्छा! इतना दुस्साहस!!" ब्राह्मण ने गुस्से में भरकर मेरी तरफ देखा और विभीषण से बोला, "लंकापति मेरे साथ आइए।"


इसी के साथ भइया, ब्राह्मण देवता ने मुझे चढ्ढी पकड़ कर टांग लिया और एक छलांग में गंगा जी को पारकर मुझे रेत में बद्द से जा पटका। मैं कुत्ते की तरह कोंयकोंय करते हुए ब्राह्मण रूपी हनुमान जी के चरणों में लोटने लगा।


हनुमान जी ने मुझे बालों से पकड़ कर खड़ा कर दिया और बोले, "हां तो तुझे पता करना है कि अमरता का अवॉर्ड क्यों मिला? मेरे बारे में तो तू जानता ही है। मैंने सीता की खोज की। लंका फूंकी। युद्ध लड़ा और लक्ष्मण को बचाया। राम की भक्ति की। कुछ लोग कह सकते हैं कि राम के मन में मेरे लिए सॉफ्ट कॉर्नर था। हालांकि मर्यादा पुरुषोत्तम ने ऐसा नहीं सोचा होगा पर यह एक तथ्य है कि मैं उनका बालसखा भी था।"


"जी, पवनपुत्र। आपके बारे में जगत में कौन नहीं जानता मेरा सवाल विभीषण जी के लिए था। एक राष्ट्रद्रोही, भाई  पर घात करने वाले इस व्यक्ति को अमरता क्यों दी प्रभु ने। प्लीज़, बताएं।"


"मूर्ख लंतरान, बताता हूं, बताता हूं। सुन। प्रभु राम की नजर में विभीषण से बड़ा सत्य साधक दूसरा नहीं हुआ। विभीषण के जीवन में सत्य सीता के रूप में आया। सीता का अपहरण उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ। दिलचस्प यह कि रावण से उनकी कोई रंजिश नहीं थी। रावण भी छोटे भाई का सम्मान करते थे। तुम्हें याद होगा विभीषण की सलाह पर ही रावण ने मुझे मृत्यु न देते हुए पूंछ में आग लगवाई थी।"


"जी याद है... हर मंगल सुंदरकांड पढ़ता हूं। सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना.. बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना।"


"बहुत सुंदर" हनुमान जी मेरे सर पर हाथ फेरते हुए खुश होकर बोले, "समझे? विभीषण सीता नाम के सत्य के लिए उस महापराक्रमी से भिड़ गया था, जिसके आगे सारा संसार नतमस्तक था। वह आदमी उसका सगा भाई भी था और दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे। उसने पहले उसे समझाया। लेकिन हार गया। तब इस सत्य साधक को राम के पास जाना पड़ा ताकि सीता मुक्त हो और सत्य जीते। विभीषण जानते थे कि राष्ट्रद्रोह के लिए पूरी दुनिया उस पर थूकेगी। लेकिन सीता के लिए। सत्य की जीत के लिए, उन्होंने वह भी स्वीकार किया। उनके लिए सत्य की कीमत राष्ट्र से ज्यादा थी। तो समझ गए नादान लंतरान विभीषण का सत्य और उनकी अमरता?


"जी, महाराज" उनकी बातें सुनकर मेरा दिमाग सन्नसन्न कर रहा था। तो भी मैने खुद को संभालते हुए पूछा, हनुमान जी, हमने तो सुना है कि विभीषण राम भक्त थे। लेकिन आप उन्हें सत्य और सीता का भक्त बता रहे हैं।"


मेरा सवाल सुनकर हनुमान जी बड़े जोर से हंसे और बोले, "राम और सत्य अलग अलग थोड़े ही हैं। सुना नहीं..राम नाम सत्य है।"


लंतरान ने लंबी सांस भरकर कहा, "इसके बाद, भइया में मेरी नींद खुल गई। न गंगा थी, न हनुमान और न ही विभीषण। अब बताओ कि भोर के सपने का क्या मतलब। क्या मुझको हनुमान जी का आशीष मिल गया?


"इतना पक्का है कि कुछ अच्छा होने वाला है तेरे साथ। यह बता आज कल तू कोई विशेष काम कर रहा है?"


"न तो।"


"दिमाग पर जोर दे..ऐसा काम जो तूने पहले कभी न किया हो?"


"हां भइया, याद आया। एक किताब पढ़ रहा हूं, जिससे पहले मैं नफरत करता था। एक साथी आए थे। दे गए थे। बोले थे...इस कमीने की किताब पढ़ और इस आदमी के ऐब निकाल। अब भइया क्या बताऊं। ऐब तो निकले नहीं उलटे किताब इतनी अच्छी लगी कि चौथी बार पढ़ रहा हूं।"


"अरे किताब का नाम भी बताएगा?"


"गांधी जी की आत्मकथा है: सत्य के साथ मेरे प्रयोग।"


"बस बस बस। समझ गया। वो फिल्म देखी है..लगे रहो मुन्ना भाई? यह किताब और रामायण तेरे दिमाग में गड्डमड्ड होकर केमिकल लोचा पैदा कर रही हैं। लेकिन तू परेशान न हो। तेरे सपने से मैं साफ देख रहा हूं कि तेरे अच्छे दिन जल्द आने वाले हैं।"


 










जब कोहली ने बाबर को गले लगाया

 जब कोहली ने बाबर को गले लगाया

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जब कोहली ने बाबर को गले लगाया

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नफरती उधर का: हेलो, भइया! 


नफरती इधर का: भाईजान, बात मत कीजिए...आपसे यह उम्मीद नहीं थी...अरे हमने तो पहले ही रोका था कि वह उनकी पुण्य भूमि है। वहां मैच नहीं खेलने मत जाओ लेकिन ये तिजारती न माने। कर दिया न तुम्हारे जिन्नात ने खेल!


नफरती उधर का: हार से इतना दुखी हो?


नफरती इधर का: आप हैं बेवकूफ! भला लौडों के खेल में हारजीत से कोई फर्क पड़ता है?


नफरती उधर का: घंटा फर्क नहीं पड़ता। जानता हूं। आपका सगा भाई जो ठहरा। हम भी तो मैच जीतने के बाद दुखी हैं।


नफरती इधर का: भला क्यों? आपके बाबर को हमारे कोहली ने गले लगाया। दुलाराया। बस चुम्मी लेना ही रह गया था..



नफरती उधर का: यही तो सत्यानाश हो गया। आज़ादी के बाद से हम पाकिस्तानियों को यही सिखाने में लगे थे कि हिंदुस्तानी कमीना होता है। अपने ढंग का नफरती इतिहास बचपन से पढ़ाते रहे। लेकिन सब गुड़ गोबर हो गया।


नफरती इधर का: ऐसा क्या?


नफरती उधर का: भइया, आप नहीं समझ पा रहे। आज पूरा पाकिस्तान बाबर की नहीं, कोहली की जय बोल रहा है। उसका नाम रख दिया है-विराट दिल कोहली। अब बताइए अगर पाकिस्तानी ऐसे मुहब्बत करेंगे तो हमको दहशतगर्द कैसे मिलेंगे। स्साला धंधा ही चौपट!


नफरती इधर का: वही समस्या तो हमारी है। आज कोहली मुहब्बत कर रहा है पाकिस्तान से। कल पूरी टीम करने लगेगी। फिर हॉकी टीम भी। फिर कल को मेरा लौंडा भी। तब हम किससे कह पाएंगे कि जा भारत नहीं अच्छा लगता तो पाकिस्तान चला जा। मैं तो उस दिन से डर रहा हूं जब हमारे यहां कोई अदनान सामी न पैदा हो जाए। भगवान वह दिन न दिखाए जब हम कहें कि भाग जा तो कोई सचमुच न रावी पार चला जाए।


नफरती उधर का:परेशान न हो भइया। हम कोई तजवीज करेंगे। गले मिलने के लिए बाबर की तो ऐसी खबर लेंगे कि वह बहादुर शाह जफर बन जाएगा।


नफरती इधर का: वादा निभाना भाईजान। हम भी कुछ टोटका करेंगे। आखिर मामला हमारे वजूद का है। हम मुहब्बत नहीं करने देंगे। क्यों भाई जान?


नफरती उधर का: प्रॉमिस भइया, प्रॉमिस।

Near Death Experience

 


Near Death Experience 

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वह सुलतानगंज, भागलपुर में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बालू में सना पड़ा था। सांस, धड़कन, नब्ज़–सब गायब। कपड़े गीले थे। शायद दोपहर की गर्मी से तड़प कर वह कपड़ों के साथ पानी में उतर गया था।

 गंगा जी में नहाते कुछ माइग्रेंट मज़दूरों की नज़र उस पर पड़ी। वे उसकी ओर भागे। "ई त अपन झम्मन छिके, नाथ नगर वाला।" मज़दूर उसे कंधे पर लाद कर साए में ले गए। कोई पानी के छींटे मारने लगा तो कोई बन्द बत्तीसी के भीतर गंगाजल घुसेड़ने लगा। तभी कोई अनुभवी मज़दूर चिल्लाया, "इसकी नाक बंद कर दो, बचना होगा तो ज़रा देर में फड़फड़ा कर आंख खोल देगा।"


और सचमुच, वही हुआ! उस आदमी ने आंख खोल दी!!


"ये मैं कहां आ गया...यहां तो बड़ी गर्मी है.." वह बुदबुदाया, "वहां कितना अच्छा था...ठंडे पहाड़...बर्फीली चोटियां.."


"नहीं," किसी ने उसको हक़ीक़त बताने की कोशिश की, "तुम बेहोश थे और गंगा के किनारे पड़े थे।"


"हां-हां-हां, याद आ गया," उसने कहा, "लेकिन किनारे वो खड़े थे, मैं तो गंगा मइया की गोद में था।"

इस बीच वह आदमी काफी स्वस्थ हो गया था। मज़दूर उसके लिए जलपान ले आए थे। दो समोसों, एक लस्सी और चुटकी भर खैनी ने उसे ज़िंदा कर दिया था। उसने दो दिन बाद कुछ खाया था। अमृतसर से भागलपुर। लम्बा सफर। वह खुद आश्चर्यचकित था कि वह चल कैसे पाया। जंडियाला गुरु, ब्यास, लुधियाना... इलाहाबाद, बनारस, पटना, मोकामा, जमालपुर...। उसे सारी जगहें याद आ रही थीं।

नाश्ता खत्म हुआ। बातचीत का सिलसिला फिर शुरू हो गया। "हां, तो मैं नहा रहा था," उस आदमी ने कहा, "तभी, क्या देखता हूं कि किनारे एक जटाजूटधारी बाबा खड़े हैं...मैंने ग़ौर से नज़र डाली तो देखा कि बाबा उंगली के इशारे से मुझे बुला रहे हैं..पता नहीं क्या ताकत थी उनके इशारे में कि मैं खिंचता चला गया।"


"चलो, मैं तुम्हें लेने आया हूं.." बाबा ने कहा। वह कुछ समझ नहीं पा रहा था। अचानक उसके मुंह से फूटा, "बाबा आपको पहचाना नहीं।"


"मैं बाबाधाम, देवघर से आया हूं। अपने भक्तों को मैं अपने धाम यानी शिवधाम ले जाने मैं खुद आता हूं।"


"मगर, बाबा मैं झम्मन हूं। यानी जुम्मन हूं–जुम्मन कुरेशी..आपके साथ नहीं जा सकता। मैं पांच वक़्त का नमाज़ी...अपने धरम भरस्ट नहीं करूंगा...हज़रत इज़राइल  आएंगे तभी कुछ सोचूंगा।"


"देख जुम्मन, कभी-कभी गलती हो जाती है। आखिर, मैं पैंट खोलकर तो चेक नहीं कर सकता...फिर यह मेरा नहीं, बेसिकली यमराज का काम है। पता होता कि तू कौन है तो मैं इज़राइल के रूप में आता। फिर, तू भी तो कमाल करता है, उत्तरवाहिनी गंगा में नहाता है, जिसके बाद आदमी बाबा धाम जाता है। और, तेरा नाम तो नन्दी ने रिकमेंड किया था...बोला–यह आदमी बैल की तरह काम करता है..इसको बुला लो तो मेरा काम हल्का हो जाएगा।"


"अब मैं चिंता में पड़ गया" जुम्मन ने कहा, "बात यह थी कि जन्नत में हूर होती हैं, शानदार शराब होती है। ये सब छोड़कर बाबा के शिवधाम कैसे चला जाता। मैं यह सोच ही रहा था कि बाबा हंसने लगे।"


बाबा बोले, "मैं तेरे मन की बात समझ रहा हूं। अब जरा सुन, शिवधाम का एक गेट स्वर्ग को खुलता है। घूम आया करना। वहां भी हूर हैं...रम्भा, उर्वशी, मेनका आदि और दारू तो जो चाहो, स्कॉच, शैम्पेन, तकीला... सब कुछ।"


"ऑफर सॉलिड था। मैं मान गया और चल दिया" जुम्मन ने बताया,  "शिवधाम यानी कैलाश का रास्ता बड़ा अच्छा था...मैंने एक जगह चीनी फौजियों को भी देखा। आखिरकार, बाबा ने मुझे स्वर्ग का गेट दिखा दिया। बोले– अब जाओ। कोई दिक्कत आए तो मुझे पुकार लेना"

जुम्मन स्वर्ग के गेट पर पहुंचा। दरवाज़ा बन्द था और जय-विजय नाम के दो सिक्योरिटी गार्ड दरबानी कर रहे थे। 

"कौन," विजय ने पूछा।


"मैं जुम्मन, निवासी नाथनगर, भागलपुर।"


"मुसलमानों की एंट्री पर रोक है।"


"कब से?"


"5-6 साल हो गए।"


"किसने हुकुम दिया"


"साहब ने"


"कौन साहब? "


"मेरा मुंह न खुलवाओ, लाखों साल पुरानी नौकरी चली जएगी।"


"लेकिन, मुझको तो देवघर वाले बाबा खुद लाए हैं.."


जुम्मन की बात सुनकर विजय ने जय को भीतर भेजा, "चित्रगुप्त जी से कह देना कि बाबा जी का केस है। फिर जैसा वो कहें उनसे लिखवाकर ले लेना। "

जय थोड़ी देर में लौटा। वह बोला:

चित्रगुप्त जी ने कहा है कि जुम्मन के दिन अभी पूरे नहीं हुए हैं। वह अभी कई बार पंजाब जाएगा। अंतिम पंजाब यात्रा में वह नकोदर के खेत में बिजाई के दौरान थकान से चूर होकर मरेगा।

जुम्मन ने कहा,"इसके बाद विजय ने मुझे ज़बरदस्त ताकत से लात मारी और मेरी घर वापसी हो गई। आंख खोली तो देखा तुम लोग मुझे घेरे खड़े हो।''

भीड़ ने जयकारा लगाया–बाबा बैजनाथ की जय..बोल बम।




बेब

 बेब

.....


वह 11 घंटे तड़पा। उसके शरीर ने तीन घण्टे अंत्येष्टि की प्रतीक्षा की। अंत में एक बड़ी गाड़ी उसे समेट ले गई। यूं तो उसके पास पारिजात एनक्लेव की पूरी बस्ती मौजूद थी, पर उसका सगा-अपना कोई न था। माता-पिता, भाई-बहन, संगी-साथी उसके दम तोड़ने के पहले ही वहां से जा चुके थे। 

ना-ना-ना। ग़लत सोच रहे हैं आप। वह कोरोना से नहीं, सड़क हादसे से मरा था। कुल 10-15 दिन की उम्र रही होगी उसकी। गोरा था। अंग्रेज़ों जितना गोरा।

बेला, हरसिंगार और रजनीगन्धा से गमकती और गुलमोहर के दरख़्तों तले बसी यह कॉलोनी पहले कभी ऐसे हादसे से गुज़री ही न थी। लोगों की प्रतिक्रया उत्तर भरतीय मानक पर सामान्य थी। बानगी: एक रिटायर्ड पुलिस अफसर ने कहा–माxxxx को यहीं मरना था..सूअर का बच्चा!!

हां, मरने वाला सुअर का बच्चा ही था। 

सोमवार की रात वह अपने संगी-साथियों के साथ पारिजात कॉलोनी की सड़कों-गलियों में उछलकूद कर रहा था कि एक तेज़ रफ़्तार दुकाटी से टकरा गया। उसका सर फट गया। बेहोश हो गया।

पास ही खेल रहे कुछ बच्चे भाग कर वहां गए। सर से खून बह रहा था और वह करवट पर पड़ा तड़प रहा था। जैसे साइकिल चलाते हैं न, उसके चारो पैर वैसे ही चल रहे थे। "इट्ज़ द बेब, वो मूवी देखी है न, इंग्लिश वाली ...बिलकुल उसी के हीरो जैसा है ये" एक लड़के ने कहा।

दूसरा बोला, "अरे-अरे-अरे!!देखो तो यह मर रहा है। कित्ता खून बह गया बेचारे का...मैं जाता हूं, पापा को लेकर आता हूं.. मेरे पापा डॉक्टर हैं, यू नो।"

बालक घर पहुंचते ही पिता को बाहर चलने के लिए खींचने लगा। "क्या है!?" डॉक्टर ने सख्ती से डपटा तो बच्चा बोला, "पापा, सड़क पर बेब घायल पड़ा है। चलिए उसे बचा लीजिए।"

डॉक्टर बच्चे के साथ बाहर मौके पर गया तो वहां भीड़ लगी थी और एक नन्हा-सा सुअर पड़ा तड़प रहा था। डॉक्टर साहब को माजरा समझ में आ गया था। लेकिन वे अपने बच्चे की आंख में आंसू भी देख रहे थे। उन्होंने बच्चे को गोद में उठा लिया और पुचकार कर बोले, "लेकिन बेटा मैं तो आदमियों का डॉक्टर हूं, जानवरों के डॉक्टर दूसरे होते हैं।"

डॉक्टर अपने बच्चे के साथ वापस चल दिए। इस बीच बाकी लोग भी बच्चों को डांट-डपट कर घर की ओर भगाने लगे। बच्चों का बेब अब भी साइकिल की तरह  पांव चला रहा था।

डॉक्टर के बच्चे ने अभी हार न मानी थी। घर जाकर उसने पाप से डॉगी के डॉक्टर खन्ना जी को फोन कराया। डॉक्टर खन्ना ने भी बच्चे को समझा दिया, "मैं डॉगी और गौमाता का डॉक्टर हूं। बेब के डॉक्टर को कसाई कहते हैं।"

उनींदा बच्चा थोड़ी देर तक बेब-बेब रटता रहा। फिर सो गया। उधर, सुअर जनित खून-खच्चर और गन्दगी से परेशान बस्ती वाले रात में ही विचार विमर्श के लिए बैठ गए। सबसे पहले बॉडी के डिस्पोजल की बात उठी तो सबने माना कि थोड़ी देर में कुत्ते नाले की तरफ जंगल में खींच ले जाएंगे। सुबह कुछ खून के धब्बे होंगे वे पानी की धार से मिट जाएंगे।

"आपकी सोच गलत है" मनसुख भाई ओझा ने कहा, "यहां रहते 50 साल हो गए हैं मुझे, कभी भी किसी ने अपने या पराए कुत्ते को, गोश्त तो दूर अंडा भी खिलाया है किसी ने?...देखना बस्ती के कुत्ते कुछ न करेंगे।"

"तो, सफाई करने वाले से कहेंगे" जैन साहब ने कहा।

"वो, सफाई वाला सुरेंद्र? वो न उठाएगा। उसकी बिरादरी ने एक साल पहले घोषणा की थी कि वो लोग अब मुर्दा जानवरों को नहीं उठाएंगे"  पटवर्धन शास्त्री ने बताया।

"समझाएँगे उसे, मान जाएगा" जैन ने उम्मीद जताई।

"नहीं भाई। वो नहीं मानेगा। एक साल पहले उसने एक मुर्दा बछिया उठाई थी। जंगल ले जाकर वह खाल निकाल रहा था तो भीड़ ने हमला कर दिया था। लिंच होते बचा था।" शास्त्री जी ने समझाया।

"ठीक है, सुबह की सुबह देखी जाएगी"विदेश सेवा से रिटायर्ड शान्तनु गांगुली बोले,"लेकिन, हमे इन आवारा सुअरों और गायों का बंदोबस्त करना होगा...अरे, मैं इस्लामाबाद में रहा हूं। इस लिहाज से पाकिस्तान हमसे बेहतर है कि वहां एक भी सुअर नहीं है..एक बार मरगल्ला हिल्स के जंगल से एक बनैला शूकर इस्लामाबाद आ गया था, तब उसे पकड़ने के लिए पूरी फौज लगा दी गई थी।"

रात 12 बज़े मीटिंग खत्म हो गई। सुबह 6 बज़े  लोगों ने देखा, सुअर मरा नहीं था। उसके आसपास तीन कुत्ते बैठे थे और उनसे थोड़ी दूर पर कुछ चीलों और कौओं का झुंड। कौए जैसे ही सुअर की ओर बढ़ते, कुत्ते उनको खदेड़ देते। करीब नौ बजे सुअर ने दम तोड़ दिया। कुत्तों ने तब भी कौओं को लाश छूने न दी।

क्या किया जाए? इस पर चर्चा चल ही रही थी कि बड़ा ट्रक गुज़रा और उसके पिछले टायरों पर वह नन्हा शरीर कुछ इस तरह आया कि सड़क पर एक लाल धब्बे के सिवा कुछ न बचा।

कुछ बाल्टी पानी के साथ पारिजात कॉलोनी पहले जैसी हो गई। रात में डॉक्टर के बच्चे ने बाप से कहा, "पापा, बेब सुबह तक मेरा नहीं था।"

"कैसे मालूम, बेटू को?"

"पापा, मैं सुबह जब आप सो रहे थे तो बेब को पानी पिलाने गया था। मैंने पानी डाला तो उसने जीभ से चाटा था। उसने आंखें खोल कर मुझे देख भी था।"

"अच्छा। अब खूब रगड़ के नहाना। ओके?"

"और पापा, एक और बात बताऊं?"

"हां, बेटू"

"पापा, बेब ने मुझे थैंक यू भी कहा था। सच्ची। मैंने सुना था।"

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(बेब एक प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म का नाम है। उसका हीरो एक सुअर का बच्चा बेब ही था)



चुटहिल जी का काव्य संसार

 चुटहिल जी का काव्य संसार


*अजय शुक्ल*



घर का नाम मुन्नू। ऑफिशियल नाम राम भरोसे। पुराना पेशा रोडवेज़ में कंडक्टरी। नया पेशा काव्य रचना। तखल्लुस चुटहिल। चलने में थोड़ा मचकते थे। जवानी में एक लड़की के बाप ने उनकी बाईं टांग पर लाठी का प्रयोग किया था। चुटहिल नाम उसी लाठी, सॉरी, लड़की की स्मृति में था। 


ठीकठाक आदमी थे, रिटायरमेंट से पहले। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने जीवन के अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प ले लिया। इन सपनों में से एक था कविता लिखना। बस उसी दिन से मुहल्ले वाले उनको देखकर भागने लगे हैं क्योंकि वे जब भी घर से बाहर निकलते हैं, एक नई कविता उनकी जेब में फड़फड़ा रही होती है।


मेरे लिए उनके काव्य से बचना मुश्किल होता है। मुहल्ले के हैं। और, म्युनिसिपैलिटी के स्कूल में साथसाथ पढ़े भी हैं। सो, जब चाहता हैं, इस बेरोजगार पत्रकार के पास आ धमकते हैं। अभी दो दिन पहले ही वह अपनी सद्य प्रसूता रचना के साथ सवेरे सवेरे नमूदार हो गए थे।


"बिलकुल लेटेस्ट है" सोफे पर पसरते हुए  बोले, "फ्रेश फ्रॉम द अवन।"


"अरे भाई, चाय तो..." मैंने कहा।


"पहले कविता" उसने बात काटते हुए कहा और शुरू हो गए...


एक था कुत्ता

एक था कुकुरमुत्ता

कुकुरमुत्ते ने कहा आदाब

कुत्ते ने कर दिया पेशाब

कुकुरमुत्ता रात भर रोता रहा

कुत्ता रात भर सोता रहा

छप्पर टपकता रहा, और 

बिलौटा मलाई गटकता रहा


मैंने कविता सुनकर माथा पीट लिया। "इसका क्या अर्थ है?" मैंने पूछा।


"येल्लेव!वह ठहाका मारकर हंसे, "कैसे संपादक हो जी? कविता भी नहीं समझते!"


"तुमहीं बता देव।" मैंने खीझ कर कहा।


वह फिर हंसा, "जब मैंने कविता लिखी, उस क्षण इसका अर्थ बस दो लोग जानते थे। एक मैं। और दूसरा ईश्वर। और, इस वक्त इसका मतलब सिर्फ एक व्यक्ति जानता है। और, वह है ईश्वर। मेरा दिमाग तो अब दूसरी कविता पर विचर रहा है। मुझे फुर्सत कहां। मीनिंग खोजना तो अब समीक्षकों का काम है।"


"अबे गधे" मैंने दोस्ती का नाजायज फायदा उठाते हुए कहा, "समीक्षा तो कोई तब करेगा, जब यह कथित कविता किसी पत्र पत्रिका में छपेगी!"


मेरी बात पर वह विद्वानों की तरह मुस्करा कर बोले, " यह 21वीं सदी है, संपादक जी। आज का रचनाकार अखबारों और पत्रिकाओं का मोहताज नहीं। अभी प्रकाशित करता हूं फेसबुक पर और देखना क्या रिएक्शन मिलता है समीक्षकों का।"


इतना कहकर वे अपना फोन निकाल कर कविता टाइप करने में लग गए। मुझे हाज़त महसूस हो रही थी।  मैं मौका पाकर बाथरूम में जा घुसा। 


पंद्रह मिनट बाद फ्रेश होकर निकला तो चुटहिल जी मेज़ पर पांव धरे बीड़ी पीने में मस्त थे। मुझे देखते ही प्रफुल्लित हो उठे। बोले, "जितनी देर में तू निपटा, उतनी देर में मैंने एक और कविता निषेचित कर दी। अब तू चाय पिला तो प्रसव भी कर दूं। मेरे पास नौ महीने का झंझट नहीं। यहां तो चट मंगनी, पट बच्चा।"


मेरे में अब दाई बनने की हिम्मत न थी। "घर में चीनी नहीं है" मैंने बचने की कोशिश की।


"कोई बात नहीं। गुड़ की बना ले। वह भी न हो तो कश्मीरी चाय बना ले। नून टी।" चुटहिल जी कविता के मुख प्रसव पर आमादा थे। मुझे चाय का इंतजाम करना पड़ा। कविता भी सुननी पड़ी। इस बार उन्होंने आधुनिक रोमांटिक कविता सुनाई। आप भी सुने:


तुम किसी काठ की कुर्सी पे तो बैठा न करो

हॉट हो बेहद कहीं काठ सुलगने न लगे

आग कोठी में जो लग जाए तो फिर क्या होगा


"चुप बे कवि की दुम!" कविता सुन कर मेरे तनबदन में आग लग चुकी थी। "अब आगे एक भी लाइन नहीं सुनूंगा। चाय पी और कट ले।"


मेरे गुस्से पर वह मंदमंद मुस्कराने लगे। बोले, "अगर दुत्कार से फर्क पड़ता तो मैं कविता लिखना जाने कब का छोड़ चुका होता। तुम अनपढ़ क्या जानो, कवियों को कितना सहना पड़ता है। इलियट को भी कोई समझ नहीं पाता था!? लेकिन बाद में उनको नोबेल मिला। एमिली डिकिंसन को तो तब कवि के रूप में जाना गया जब वे मर चुकी थीं। देखना एक दिन जब मुझे ज्ञानपीठ मिलेगा! तब यही मोहल्ला फख्र के साथ कहेगा कि चुटाहिल यहीं रहते हैं। हो सकता है कि बाद में जब कोई सरकार नाम बदलने की ठाने तो इस भन्नाना पुरवा का नाम चुटहिल नगर रख दिया जाए।"


इतना कहकर चुटहिल जी चल दिए। मैंने राहत की सांस ली और आंख मूंद कर सोफे पर पसर गया। सहसा कुछ आहट हुई। मैंने आंख खोली तो चुटहिल जी वापस खड़े थे। बोले, "जा ही रहा था कि सोचा तुझे फेसबुक दिखा दूं। कुत्ता और कुकुरमुत्ता को एक घंटे में 100 लाइक्स मिले हैं। और, पचास लोगों ने सकारात्मक समीक्षा की है।"

 

अगले पल मैं फेसबुक पर प्रकाशित चुटहिल जी की कुकुरमुत्ता देख रहा था। लाइक्स की संख्या दो मिनट में 100 से बढ़कर 115 हो चुकी थी। कमेंट भी 60 जा पहुंचे थे। एक समीक्षक ने लिखा था गजब। दूसरे ने सुपर। तीसरे ने सुपर से भी ऊपर। चौथे ने लिखा था लाल सलाम। पांचवें ने जयश्रीराम। आदि आदि इत्यादि। एक ने कुत्ते में आततायी तानाशाह और कुकुरमुत्ते में गरीब आम आदमी देख लिया था।

मैंने चुटहिल जी को नमन किया और बदजबानी के लिए माफी मांगते हुए कहा, "आपके नोबेल और ज्ञानपीठ का इंतजार कर रहा हूं।













दुःस्वप्न

 दुःस्वप्न

.........

*अजय शुक्ल*



......गमक रहा है 

विभिन्न सुगंधों से भरे

रंग बिरंगे फूलों का एक बगीचा


तोड़ रहा है एक वानर 

फूलों की पंखुड़ियां

एक एक कर


जमा कर रहा है 

कोमल पुष्प दलों को

चक्षुहीन ऐनक के चित्र से सजे

कचरे के डिब्बे में


हर पंखुड़ी को तोड़कर

चीखता है वह ज़ोर से...

"...सब पंखुड़ियों को 

गोंद से चिपकाऊंगा, और

एक विराट

दुनिया का सबसे बड़ा

फूल मैं बनाऊंगा, फिर

लेकर पेंट ब्रश

उस पर पोतूंगा

अपने मन का रंग, और

अंत में फूल पर बना दूंगा 

अपना चित्र".....


अभी अभी, मुंह अंधेरे 

टूटा है यह दुःस्वप्न, और

एक गिलास पानी पीकर

मैंने रजाई तान ली है












अंतिम परीक्षा

 



व्यंग्य

......


(जब कन्नौज में एक इत्र कारोबारी के घर से 284 करोड़ निकले थे)



नव गुरुकुल। सत्र का अंतिम दिन। आज परीक्षा है। फाइनल। इसके बाद छात्र अपने घर लौट जाएंगे। शिष्यगण वट वृक्ष के नीचे एकत्र हो रहे हैं।  गहमा गहमी का माहौल। गुरु जी अभी दिख नहीं रहे। सबकी नज़र उन्हीं की कुटिया पर लगी है। लो, देखो देखो! वे बाहर निकल रहे हैं। उनके हाथ में गुलाब का एक फूल है। लड़के दौड़कर साष्टांग दंडवत करते हुए चरणरज ले रहे हैं।


"शुभमस्तु" गुरु जी आशीर्वाद देते हैं, "बैठो बैठो.....कल्याणमस्तु सर्वेषाम्।"


छात्र बैठ जाते हैं। गुरु जी की गंभीर वाणी गूंजती है:


"बच्चो, मैंने तुमको अपना सर्वस्व ज्ञान दे दिया है। आज दीक्षांत है। जैसा कि तुम जानते हो, मैं किसी को उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण नहीं करता। बस, आशीर्वाद और सलाह देकर विदा कर देता हूं।.... तो, परीक्षा शुरू की जाए?"


"जी गुरु जी" लड़कों ने समवेत स्वर में कहते हैं। 


"ठीक। अब तुम लोग एक-एक करके मेरे पास आओ और परीक्षा दो।"


पहला लड़का।


"मेरे हाथ में क्या है?" गुरु जी पूछते हैं।


"एक फूल।"


"सही जवाब" गुरु जी कहते हैं, "तुम अच्छे मजदूर बनोगे।"


"यह क्या गुरु जी!?" लड़का आहत स्वर में कहता है, "मैने भी बारह साल अध्ययन किया है!!"


"दुखी मत हो स्नातक" गुरु जी समझाते हैं, "मजदूर होना गर्व की बात है। इस धरती की सारी चमक श्रमिकों की ही देन है। भाखड़ा नंगल हो या बुर्ज खलीफा या काशी विश्वनाथ का आधुनिक विस्तीर्ण प्रांगण। यह तमाम सब श्रमिकों की मेहनत का परिणाम है। जाओ, नए भारत के निर्माण में जुट जाओ। बोलो, भारत माता की जय।"


छात्र देशप्रेम में विह्वल होकर जवाबी नारा लगाता है, "भारत माता की जय!"


"नेक्स्ट" गुरु जी मंद मंद मुस्करा रहे हैं।


"हां, अब तुम बताओ कि मेरे हाथ में क्या है।" गुरु जी अगले लड़के से पूछते हैं।


"जी, यह गुलाब का फूल है।"


"बिलकुल सही जवाब" गुरु जी कहते हैं, "तुम पादपों के नाम जानते हो। जाओ किसानी करो। खूब नाम कमाओ।"


"गुरु जी, इतना पढ़ लिख कर किसानी?" छात्र मायूस होकर कहता है, "सब मेरा मज़ाक उड़ाएंगे! आपके गुरुकुल की प्रतिष्ठा भी घटेगी।"


"लगता है, मेरे अध्यापन में ही कसर रह गई जो तुम सबसे सम्मानित व्यवसाय को घटिया समझ रहे हो" गुरु जी नाज़िर हुसैन की तरह भर्राए हुए गले से कहते हैं, "तुम्हें क्या पता, पीएल 480 वाले सड़े गेहूं से मुक्ति दिलाकर हरित क्रांति किसान ही लाया था और शास्त्री जी को जय जवान, जय किसान का नारा देना पड़ा था। आज भी सरकार जो गल्ला बांट कर लहालोट है, वह भी किसान के बदौलत है। और, यह फ्रेश फ्रूट और सब्ज़ी का करोड़ों का ऑनलाइन कारोबार भी तुम्हारे दम पर है। बीसियों भंबानी, रंबानी, दंडपानी तुम्हारे दम पर जी रहे हैं...। और बताऊं? अभी कुछ दिन पहले ही किसानों ने सरकार को झुका दिया। मंत्री लोग तबसे अन्नदाता और अन्नपूर्णा के नाम का जाप करते रहते हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि कोई किसान यूपी में मुख्यमंत्री बन जाए..."


"बस गुरु जी बस!" छात्र गुरु के पैरों पर गिर पड़ता है, "यहां से सीधे गांव जा रहा हूं।" 


छात्र प्रसन्न होकर गाता है... अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है क्यों न इसे सब का मन चाहे.. अहा।


"नेक्स्ट" गुरु जी मुंह दबा कर हंस रहे हैं।


तीसरा छात्र।


"हां, तो तुम्हे क्या दिख रहा है? गुरु जी खुद को संयत करते हुए पूछते हैं।


"मुझे हरे रंग की कांटे युक्त शाख से लगा गुलाब दिख रहा है। गुलाब स्वस्थ है और उसके सेमल, पेटल्स, कैलिक्स, एपिकेलिक्स, गाइनोशियम और पिस्टिल्स भी दिख रहे हैं।"


"बहुत बढ़िया। तुम तो बॉटनिस्ट हो। जाओ, जीएम फूड पर काम करो" गुरु जी ने प्रसन्न होकर कहते हैं।


अगला छात्र को गुलाब के फूल में प्रेमिका के ओंठ दिखाई पड़ते हैं। गुरु जी धिक्कारते हैं, "ब्रह्मचारी के लिए  यह दृष्टि सही नहीं।" 


"लेकिन, गुरुदेव!" युवक ने पलटकर जवाब देता है, "कुमार संभव, अभिज्ञान शकुंतलम आदि ग्रंथ तो आपने ही तो रस ले लेकर समझाए थे। मुझे तो यह भी याद है कि केले का तना किसकी उपमा है। बताऊं?


"नहीं मेरे बाप" गुरु जी ने खीझ उठते हैं, "जा तू कविता लिख। बॉलीवुड ट्राइ कर। सफल न होना तो कवि सम्मेलन के मंच पर गलेबाज़ी करना। बस तार सप्तक टाइप हाई क्लास मत लिखना, नहीं तो भूखे मर जाओगे।"


दीक्षांत समारोह समाप्त प्राय है। बस दो छात्र बचे हैं। 


अंतिम से पहला छात्र सामने है। गुरु जी उसको भी गुलाब का फूल दिखाते हैं, "बोल, बालक..."


"गुरुदेव, मुझे जवाहर लाल नेहरू दिख रहे हैं....और मुझे वैलेंटाइन डे दिख रहा है...और..और मुझे मॉल्स और होटलों में तोड़फोड़ करते वीर युवक दिख रहे हैं।"


"वाह वाह, वाह वाह, वाह!" गुरु जी खुशी से नाच उठते हैं, "तू मेरा नाम रोशन करेगा। जा तू नेता बन।"


अंतिम छात्र सामने है। गुरु जी घिसापिटा सवाल एक बार फिर बोलते हैं। छात्र के चेहरे पर एक मुस्कान खेल रही है। "हंस मत, जवाब दे" गुरु जी डपटते हैं, "बोल क्या देख रहा है?"


"मुझे गुलाब नहीं, रुपए दिख रहे हैं, गुरु जी" लड़के ने कहा, "जी, रुपए। एक दो नहीं 284 करोड़। मैं कन्नौज देख रहा हूं। इत्र का कारखाना देख रहा हूं। भभके भभक रहे हैं। इत्र टप्प टप्प टपक रहा है। अवशिष्ट, कचरे की नाली में 2000 के नोटों की धारा बह रही है।"


"तूने कब पाया यह ज्ञान? मैं तो यह सब्जेक्ट पढ़ाता ही नहीं" हतप्रभ होकर गुरु जी पूछ रहे हैं।


"यह ज्ञान तो मैंने आचार्य बंटाधार की कोचिंग में पाया है।शाम को उल्लू बाड़ी में पढ़ाते हैं" छात्र अब भी मुस्करा रहा है।


गुरु जी का दिल टूट गया है। मरियल सुर में कहते हैं,"जा बालक जा, जी ले अपनी जिंदगी। मैं तुझे ज्ञान देने के लायक नही रहा।"


गुरु जी धीमे धीमे कुटिया की ओर जा रहे हैं। उनका सिर झुका हुआ है। लड़का कुलांचें मारता महानगर की ओर जा रहा है।














 





 












कोरोना कर्फ्यू

 

व्यंग्य

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भीषण सर्दी की कठिन रात। शहर में कोरोना कर्फ्यू लागू है। आदमी तो दूर, भूत प्रेत  तक रजाई ताने धुंधुआ रहे हैं!! कूकुर भौंकना-भागना भूल कर हलवइये की भट्ठी के बगल में घोड़े बेच कर सो रहे हैं। डीएम, सीएम, पीएम सो रहे हैं...... मेढक सो रहे हैं... सांप सो रहे हैं...चीटियां सो रही हैं। मच्छर सो रहे हैं। परमात्मा सो रहा है। शायद कोरोना भी सो रहा है।


.....लेकिन, महात्मा गांधी मार्ग के पुलिस नाके पर ड्यूटी पर तैनात सिपाही जग रहे हैं। और, पूरी सृष्टि को गालियां दे रहे हैं।


"का हो यादव जी" एक सिपाही दूसरे से कहता है, "मान लो यहीं बैठे बैठे हम सब अचानक हार्ट अटैक से मर जाएं!? तब का हुई?"


"हुई का, पूरी धरती मा कोविड फइल जई...सारा सिस्टम फेल हुइ जई...दुनिया खत्म हो जाएगी" दूसरा ठहाका मारकर हंसता है।"


"मल्लब, जिस कोरोना को महारानी एलिजाबेथ न रोक पाईं, जिंग पिंग न रोक पाए, ट्रंप न रोक पाए, शक्तिमान न रोक पाए...उसे अब हम रोकेंगे! क्यों सचान?" तीसरा सिपाही माथे पर हाथ मारकर अपनी किस्मत पर तंज करता है, "वा भई वाह!" 


"स्साली चवन्नी की भी वसूली न हो पाएगी रात भर में। कोई बिना हेल्मेट वाला भी न मिलेगा" सचान अपने श्रम की निरर्थकता पर मायूसी जताता है।


"बाकी सब तो ठीक है लेकिन.." एक सिपाही अपना डर जताता है, "..मान लो, कोई कर्फ्यू तोड़ने वाला मिल जाए और खुदा न ख्वास्ता वह कोरोना पॉजिटिव हो तो हम क्या करेंगे? उसको पकड़ेंगे कैसे? और, पकड़ भी लें तो उसे थाने ले जाएं या अस्पताल?"


"मिसिर जी" एक सिपाही कहता है, "तुम तो वाकई बुद्धिमान हो, यह बात तो हमने सोची ही नहीं! अब क्या किया जाए? क्यों सचान जी?"


"करना क्या है!" सचान जी कहते हैं, "सवेरे ही एसएचओ साहब से सबके लिए पीपीई किट की मांग करेंगे ताकि हम दोषियों को बेखौफ दबोच सकें।"


"और हां, नाके पर एक छोटे से क्वारनटाइन सेल फिट करने के लिए भी कहना" मिसिर जी ने फिर दिमाग़ दौड़ाया, "क्वारनटाइन व्यवस्था होगी तो हम अपराधी को रात भर उसमें रख सकेंगे। सुबह एंबुलेस बुलाकर उसको अस्पताल भिजवा देंगे।"


तभी सुनसान सड़क पर खटपट-खटपट-खटपट गूंजती है। सिपाही चौकन्ने। लाठी पटकते हैं। एक सिपाही गाली देकर जोर से बोलता है, "आओ, कोरोना के पट्ठो...सालो, करफू तोड़ते हो। आओ देखो मैं तुम्हारी कौन कौन सी चीज़ तोड़ता हूं।"


थोड़ी देर में, कदमों की आहट सिपाहियों के सामने छह युवकों के रूप में नमूदार होती है।


"कहां से सवारी आ रही है, ससुर के नाती। चल थाने चल। जमकर खातिर करते हैं। हां, अस्पताल आदि की इमरजेंसी हो तो हम छूट दे सकते हैं।" एक सिपाही बोलता है।


युवक ठहाका मार कर हंसते हैं। "अरे, हम अस्पताल नहीं जाते।" एक बोलता है, "हम तो अस्पताल पहुंचाते हैं... हा हा हा।"  


"क्या मतलब? गुंडई दिखाता है, स्साला"


"जरा, ज़बान संभाल के। हम अस्पताल ही नहीं पहुंचाते, वरन् हमसे जो टकराता है, उसे वहां भी पहुंचाते हैं।"


"कहां?"


"शमशान या कब्रस्तान... धरम के मुताबिक।"


"मार स्सालों को!" पुलिस वाले भड़क उठते हैं। एक सिपाही सबसे आगे खड़े आदमी का गिरेबान पकड़ लेता है। 


"तू तो गया.." युवक ज़ोर ज़ोर से हंसता है, "अच्छा है, पहला शिकार तो मिला।"


"आओ, हमें भी पकड़ो" बाकी युवक भी हंस कर उकसाते हैं, "हम तो निकले ही हैं शिकार पर.. हा हा हा।"


"अभी तुम सबकी गुंडई निकलते हैं" पुलिस वाला गुस्सा कर पूछता है, "कहां रहते हो? चल नाम बता..."


"कोरोना वायरस" पहला युवक बोलता है।


"तू तो आदमी है। साढ़े पांच फीट का।" पुलिस वाला खीझता है।


"मैं इच्छाधारी हूं।"


"इच्छाधारी तो सांप होते हैं!"


"हम सांप के भी बाप हैं। हमारा काटा भी पानी नहीं मांगता।"


(सिपाही आपस में खुसुर-पुसुर करने लगते हैं...


....क्या किया जाए...इच्छाधारी बता रहे हैं खुद को...तुम मानते हो ये बातें...भाई का बताई, भूत तो होते हैं...तो इच्छाधारी कोरोना भी हो सकता है…नहीं नहीं...यह सब पोंगापंथी की बातें हैं...ऐसा करते है, डंडा दिखाकर इनसे सख्ती से पूछतांछ करते हैं...फर्जी होंगे तो फंस जाएंगे...तो ठीक है... तो परमार जी आप जरा कर्रा करो इनको... ओके...)


परमार डंडा पटक कर कड़क लहजे में सबसे पास खड़े युवक से पूछता है, "हां तो कहां की पैदाइश हो?"


"वुहान, चाइना।"


"वल्दियत?"


"पता नहीं। हरामज़ादे हैं हम।"


"निवास?"


"पूरी धरती।"


"नाम?"


"कोरोना वायरस, अल्फा"


"हां, अब बाकी लोग एक एक कर आगे आओ.." सिपाही दूसरे युवकों से कहता है।


"हम सब एक ही कुनबे के हैं। सबका पता एक ही है। नाम थोड़ा अलग अलग हैं।" पहले वाला युवक कहता है।


"बोलो नाम।"


"कोरोना वायरस बीटा, कोरोना वायरस गामा, कोरोना वायरस डेल्टा, कोरोना वायरस ओमीक्रोन, कोरोना वायरस डेलमीक्रोन, कोरोना वायरस आईएचयू और फ्लोरोना।"


(सिपाही फिर आपस में मशविरा करते है................

....क्या किया जाए... सब बड़ा बेहिचक बोल रहे हैं...नाम तो ऐसे बोल रहे हैं की मानो डब्ल्यूओएच के हेड साइंटिस्ट हों...ऐसा करते हैं जाने देते हैं हो सकता है कि वाकई में इच्छाधारी हों...कल से पीपीई पहन कर बैठेंगे...तो ठीक इनको विदा करते हैं)


"ठीक है, जाओ। लेकिन कल मत दिखाई देना" एक सिपाही कड़क आवाज में हुक्म देता है।


युवक बड़े जोर से हंसते हैं और दौड़ कर कोहरे में गुम हो जाते हैं।


इधर सिपाहियों की पंचायत जारी है....


"काहे मिसिर जी, ठीक किया न?"


"पता नहीं भइया, मुझको तो लगता है कि नई सड़क के पढ़े लिखे लौंडे थे। साले दारू पीकर मस्ती करने निकले होंगे और उल्लू बना गए।"


"हो सकता है" एक सिपाही कहता है, "कुछ महक तो मुझको भी आ रही थी।"

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(जागरण Inext में प्रकाशित))


 









कुछ कविताएं

 



ज़िंदगी का गीत 

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जीवन है तो दोलन है

आन्दोलन है

वातानुकूल गर्भ से 

बाहर

अटपटी धरती पर

आते ही रोता है

बच्चा


वह 

उसका 

पहला आंदोलन है


यह जीवन का दोलन है


नहीं रोता तो

रोती है माता


मुर्दा शरीर में 

कभी भी 

होता नहीं आंदोलन है


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ग़ज़ल

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आंख मीचो मत अंधेरा और गहरा हो चलेगा

एक शोले से घना जंगल सुनहरा हो चलेगा


सीख लो गूंगे की मानिंद अब इशारों की ज़बां

ढाई आखर बोलने पर कल से पहरा हो चलेगा


नहर लाओ काटकर बरबाद न हो फसल ये

अश्क से सींचोगे तो ये खेत सहरा हो चलेगा


भूल कर बन्दर के हाथों जो थमाया उस्तरा

वो हजामत होगी तेरी लाल चेहरा हो चलेगा

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   बसंत

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खेतों में पसरा है केसर 

अमराई भी बौराई,

पके बेर-सी हुई दोपहर 

मशक बजाते शहनाई।।


घटघट, पोरपोर रस-विह्वल 

हिरदय में बाजे मिरदंग,

नील गगन भी मगन-मगन है 

देख-देख धरती के रंग।


देखो तो पलाश ने कैसे बन-बन

 मन-मन अगन लगाई।।


खेतों में पसरा है केसर 

अमराई भी बौराई...


नींद खुली औ सपना टूटा

बूढ़ा तन फिर अंगड़ाया,

दादा जी ने सुबहसुबह

'जब दिल ही टूट गया गाया'।


मोतियाबिन्दी आंखों में भी

वापस आई बीनाई।।


खेतों में पसरा है केसर 

अमराई भी बौराई....

                       

+++++++++++++++


कैसी मां हो तुम

..................



तो तुम बच्चे को रोने भी न दोगी?


कैसी मा हो तुम!!


क्या कहा?


लोग तुम्हें ताना मारते हैं?


...कि कैसी मा है


...कि बच्चा रोता ही रहता है


...कि मैं सारा समय बनाव-सिंगार में खपा देती हूं


–तुम ही बताओ मैं क्या करूँ


मैं बताऊँ?


चलो, बताता हूं


पहले देखो कि बच्चा भूखा तो नहीं


फिर देखो कि बच्चा किसी शै से डर तो नहीं गया


कहीं हंसली तो नहीं उखड़ गई उसकी


कल तुमने गुस्से में बड़े झटके से उठाया था


कक्क् क्या कहा!


न माना तो बत्तो चटा दोगी?


घुट्टी में एक लकीर अफ़ीम पिला दोगी?


हे भगवान!


क्या होगा इस नौनिहाल का


अरे कोई है!


बचा लो


मा और पुत्र को बचा लो



         

  +++++++++++++++



 

गीत


न आना है न जाना है

न कोई पता ठिकाना है

फिर भी क़ासिद का इंतज़ार

यह दिल कितना दीवाना है

न आना है न जाना है....


ऐसा भी नहीं तुम्हारे बिन

रातें काटीं तारे गिन गिन

निंदिया को लेकिन मालुम है

कि सपना कौन दिखाना है

न आना है न जाना है....


जो एक प्यार का घूंट पिया

काबा, काशी बन गया हिया

मन के वृंदावन में अब तक

राधा का आना जाना है

न आना है न जाना है....





कर्नल साहब की दाढ़ी

 कर्नल साहब की दाढ़ी

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                 *अजय शुक्ल*


थोड़ी-सी लंबी पर करीने से छंटी सफेद दाढ़ी। वैसे ही धवल, रेशमी बाल। छरहरी काया और छह फुट को छूता क़द। कर्नल कालरा जब शाम के वक़्त अद्धी का कुर्ता और अलीगढ़-कट पाजामा पहन कर टहलने निकलते तो वे रिटायर फ़ौज़ी कम मक़बूल फिदा हुसैन ज़्यादा लगते थे। फ़ौज़ीपन का ज़रा-सा स्वैग ज़रूर था जो 70 साल की उम्र के बावजूद चाल में बरकरार था।


सुबह-शाम रोज़ घूमने निकलते थे। हाथ मे एक बड़ी-सी पुड़िया लेकर। पुड़िया में  आटे और चीनी का मिक्स्चर होता था। जहां कहीं चीटियों की कतार दिखती, वे थोड़ा-सा मिक्स्चर बुरक देते।


उस शाम भी वे चीटियों को चीनी-आटा खिलाकर ही लौट रहे थे। थोड़ा धुंधलका था, जो स्ट्रीटलाइट के खराब होने के कारण ने गहरा गया था। अचानक पीछे से उन्हें किसी ने ज़ोर का धक्का दिया। वे मुंह के बल गिरे। उठने की कोशिश कर ही रहे थे कि पसलियों पर एक किक पड़ी। किक के साथ ही किसी ने मां की गाली बकीxxxx...बाबर की औलाद। तभी एक मजबूत हाथ ने उन्हें गिरेबान से खींचा और झटके के साथ उठाकर बिठा दिया। उन्होंने देखा, चार-पांच लड़के उन्हें घेरे खड़े हैं।


"कहो, चच्चा...तबीयत कैसी है?" एक लफंगे ने उनकी दाढ़ी खींचकर सवाल किया, "चमनगंज छोड़कर यहां कहां टहल रहे हो?


कर्नल साहब का उत्तर देने का मन नहीं हो रहा था। पर वे फ़ौज़ी भी थे। हालात की नज़ाक़त भांपते हुए वे बोले, " मैं तो यहीं पास में रहता हूं। सिविल लाइन में। मेथडिस्ट चर्च के पास।"


"अच्छा! तो तुम लोग यहां तक आ बसे? ओके...अब जरा बोलो तो 'जय श्रीराम'..और ज़रा ज़ोर से बोलना।"


कर्नल साहब राम का नाम क्या, रामायण की कई चौपाइयां और दोहे सुना सकते थे। सुंदरकांड सुना सकते थे। लेकिन यह थोपी हुई धार्मिकता उनसे बर्दाश्त न हुई। दहाड़कर बोले, "नहीं कहता जी...जाओ जो करते बने कर लो..."


"ये ऐसे न मानेगा...ज़रा गांधी जी की लाठी तो देना पप्पू..."


मगर इसके पहले कि लाठी चल पाती, सामने से कुछ लोग आते दिखाई दिए। तिलंगे भाग खड़े हुए। कर्नल साहब उठे और लंगड़ाते हुए घर को चल दिए। मुंह पर कुछ गीला-सा महसूस हो रहा था। उन्होंने हाथ से पोछा।हाथ में खून आ गया। वे मुस्कराए और दाढ़ी पर हाथ फिराकर खुद से बोले...देखा बापू मैंने अहिंसा नहीं छोड़ी!


कर्नल साहब का सन् 2000 में फौज़ से 54 साला रिटायरमेन्ट  हुआ था। तब तक उनकी बेटी बर्कले में प्रोफेसर हो चुकी थी और बेटा बेंगलुरु की एक एमएनसी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। वे कानपुर ही बसना चाहते थे लेकिन रिटायरमेन्ट से एक महीने बाद जब उनकी पत्नी कैंसर से चल बसीं तो उन्होंने प्लान बदल दिया।

पहले थोड़ी घुमक्कड़ी कर लेते हैं–उन्होंने खुद से कहा। अमेज़न और अफ्रीका के जंगल देखने की इच्छा उनकी बचपन से थी। वे बच्चों के लाख समझाने पर भी न माने।सो, कई साल तक ब्राज़ील, पेरू, कोलंबिया और इक्वाडोर में वर्षावनों में एनाकोंडा से आंखें लड़ाते रहे।फिर, उन्होंने अफ्रीका का रुख किया और लेक विक्टोरिया के किनारे डेरा डाल दिया। बरसों तक केन्या, युगांडा, रवांडा और बुरुंडी में जंगली जानवरों से इश्क फरमाते रहे।

लेकिन, अफ्रीका से उन्हें लौटना पड़ा। एक रात मसाई मारा में एक शेरनी उनके टेन्ट में घुस आई। दोनों के बीच भीषण मल्ल युद्ध हुआ। जीत कर्नल साहब की ही हुई। उन्होंने अपनी खुखरी शेरनी के दिल मे पैबस्त कर दी। लेकिन, दम तोड़ने से पहले शेरनी ने भी उन्हें मरणासन्न कर दिया। नैरोबी में डॉक्टर उन्हें बड़ी मुश्किल से बच पाए। उनका घुटना बदलना पड़ा। 

इस हालत में उन्हें बेटी के पास बर्कले में जाकर रहना पड़ा। पर बिना स्थायी वीज़ा के कोई कब तक अमेरिका में रह सकता था? उन्हें बेटे के पास बेंगलुरु एना पड़ा। लेकिन तीन साल बाद बेटे की बदली सिलिकॉन वैली को हो गई। अब उन्होंने मातृभूमि में रहने का फैसला कर लिया। बेटे को दिल्ली हवाई अड्डे पर उन्होंने अमेरिका के लिए विदा किया और खुद नई दिल्ली स्टेशन पहुंचकर कानपुर शताब्दी में जा बैठे।

 वे कानपुर में ही पैदा हुए थे।  सिविल लाइन में पले-बढ़े। पास ही जीएनके कॉलेज से इंटर किया। वहीं से वे एनडीए के लिए सेलेक्ट होकर खड़कवासला, पुणे चले गए थे। फिर वे कभी कानपुर नही बस पाए पर कानपुर उनके भीतर हमेशा बसा रहा।


घर बीस साल से बन्द पड़ा था। पिता की डेथ के बाद वहां कोई रहा ही न था। सो, साफ-सफाई में, रंगाई-पुताई और फर्निशिंग में चार-पांच दिन लग गए। फिर एक दिन अपनी नेमप्लेट लगवा कर कर्नल साहब आकर बस गए। मगर अब पड़ोस में रहने वाला ऐसा कोई न था जो उन्हें जानता हो। उनके बचपन के परिचितों में कुछ लोग ऊपर उठ चुके थे और कुछ समाज में ऊपर उठकर 


लोगों ने कर्नल साहब को उनकी नेमप्लेट से ही जाना:


Col (rtd) Jaswant Kalra


कुछ ही दिनों में आर्मी का रोमांस मोहल्ले के किशोरों को कर्नल साहब की तरफ खींचने लगा। इनमें कुछ लड़के एनडीए की तैयारी कर रहे थे। कुछ राष्ट्रभक्ति के जुनून के वशीभूत होकर फौज़ के प्रति कृतज्ञता महसूस करते थे। ये लड़के उनके पास जंग के किस्से सुनने को आने लगे। फिर दो-तीन रिटायर्ड बुजुर्ग भी आकर्षित हुए।  इनको वे रामायण, महाभारत और दूसरे पुराणों का ज्ञान पिलाते और विदा करने से पहले आर्मी कैंटीन की दो पेग दारू। दारू पीते वक़्त वे मेज़ पर रखे गांधी जी के बस्ट का चेहरा दीवार की तरफ कर देते। "बापू सॉरी" कहकर कान पकड़ते और मुस्कराकर सिप करने लगते।

कर्नल साहब का बैठका गुलज़ार रहने लगा। कभी वे 1971 की जंग के किस्से सुनाते तो कभी कारगिल के।  या कभी कश्मीर के आतंकियों के साथ किसी मुठभेड़ का ज़िक्र छेड़ देते। इन महफिलों में एक सवाल बार-बार उठता: 


"सर, आपने यह मुसलमानों वाली दाढ़ी क्यों रखी है?रखनी ही है तो हिंदुओ के गर्व का ख्याल रखते हुए राजपूती मानमनोहर दाढ़ी रखिए...क्या यह शाहजहां-कट दाढ़ी रख ली–पाकिस्तानी। 


इन बातों को कर्नल साहब हंस के टाल देते। कहते, "हां भाई। पाकिस्तानी तो मैं हूं ही। माता-पिता तो मुल्तान से ही जान बचाकर कानपुर आए थे। असली घर तो वहीं है:

गांव बस्ती शेर मियानी, तहसील जलालपुर पीर वाला, ज़िला मुल्तान, पाकिस्तान।" फिर वे उस मुल्तान की ढेरों बातें बताते जो उन्होंने कभी देखा नहीं था। "काशी से भी पुराना है मेरा मुल्तान...कश्यप ऋषि ने बसाया था" वे बताया करते थे, "कभी मुल्तान का सोहन हलवा खाकर देखना, बाँदा वाले बोडेराम को भूल जाओगे।" अलबत्ता उन्होंने खुद कभी उसे नहीं खाया था। खेल-खेल में वे दो-एक वाक्य सरायकी के बोल देते, "के हाल हें, साईं?" फिर बताते, "यह सरायकी ज़बान है। मेरी मातृभाषा। सिर्फ पाकिस्तान में बोली जाती है। अब बताओ कि मैं पाकिस्तानी हूं या हिंदुस्तानी?"


उस शाम लफंगे लड़कों के हाथों पिटने के बाद कर्नल साहब देर तक विचार करते रहे। वे लड़के दशकों से बोए जा रहे नफ़रत के बीजों की फ़सल थे। उन्हें लगता था कि ज़ाम्बियों को सामान्य बनाया जा सकता है। वे दुर्दम्य आशावादी थे। गांधी पर उनकी अटूट आस्था थी। लोग गांधी दर्शन पर लिखते हैं, भाषण देते हैं। कर्नल साहब गांधी दर्शन जीते थे। मांसाहार छोड़ चुके थे। दूध वे बकरी का भी नहीं पीते थे। न मक्खन, न घी और न ही मिठाई या आइसक्रीम। 


पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। यह उनके जीवन का ध्येय वाक्य था। नफ़रत उन्हें किसी से न थी। यह अवगुण तो उन्होंने जंग के मैदान में ही छोड़ दिया था। सन् 1971 की लड़ाई में उनके हाथों कई पाकिस्तानी मरे थे। पर गोली चलाते हुए भी वे यह बात कभी न भूले थे कि शत्रु भी किसी के घर का चिराग़ है। वे यह भी महसूस करते रहते थे कि उनके ऊपर गोली चलाने वाले की उनके साथ किसी किस्म की रंजिश नहीं है। कभी-कभी हंसते हुए कहते–मेरा बस चलता तो 'आर्म्स एंड द मैन' के कैप्टन ब्लुनशिली की तरह बुलेट की जगह ज़ेब में चॉकलेट लेकर चलता।


एक दिन जब महफ़िल में उनकी दाढ़ी पर फिर सवाल उठा तो उन्होंने दाढ़ी की कहानी बता दी:

"यह दाढ़ी मैंने रिटायरमेंट के बाद रखी थी। यह श्रद्धांजलि है उस पाकिस्तानी फ़ौज़ी अफसर के लिए जो बहुत बहादुर था...बहुत सुंदर था और जिसे मैंने अपने हाथों मारा था। उसकी दाढ़ी हू-ब-हू ऐसी ही थी। अलबत्ता काली।


"1971 की वॉर जब शुरू हुई तो मैं वेस्टर्न सेक्टर में तैनात था। नया-नया लेफ्टिनेंट बना था। जंग का पहला मौका था। बहुत जोश था। हमें लाहौर पहुंचने का हुक्म था। हम पाकिस्तानियों को खदेड़ते गए और बर्की तक जा पहुंचे। वहां से लाहौर बस 19 किलोमीटर था। मगर अभी बर्की पर तिरंगा फहराना बाक़ी था। कांटे की टक्कर के बाद पाकिस्तानियों का दम उखड़ने लगा। वे मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए।


"सामने बर्की थाना था, जिस पर पाकिस्तानी झंडा फहरा रहा था। तिरंगा गाड़ने के लिए हमें यह जगह मुफीद लगी। हम थाने की ओर बढ़ चले। अचानक थाने के पास की झाड़ियों से एक फ़ौज़ी नमूदार हुआ। उसके हाथ मशीन गन थी। गोलियों की बौछार हुई और मेरे चार जवान ज़मीन पर तड़पने लगे। हमारी तरफ से जवाबी फायरिंग हुई पर तब तक वह झाड़ियों के पीछे छिप गया।


"एक अकेला फ़ौज़ी मोर्चा ले रहा था। वह यह भी जनता था कि आखिरकार वह मारा जाएगा। पर होते हैं कुछ विलक्षण वीर जो मौत से नहीं कायरता से डरते हैं। लेकिन, उस वक़्त यह सब सोचने का वक़्त नहीं था। मैं अपने दाहिने बिजली की रफ्तार से भगा और गोलाई में दौड़ते हुए हमलावर के पीछे आ गया। कोई सौ मीटर की दूरी रही होगी। मैं अपनी कार्बाइन से उसे निशाने ले ही रहा था कि वह पलट गया। मैंने खुद को तत्काल ज़मीन पर गिरा लिया। गोलियों की बौछार मेरे ऊपर से गुज़र गई। 

"वह मुझे देख रहा था और मैं उसे। हम दोनों ने एक दूसरे पर निशाना साधा। मेरी गोली उसके कान के पास से निकली। उसकी गोली चली ही नहीं। वह मशीनगन को ठोकने-पीटने लगा। 

"यह डायरेक्ट एक्शन का वक़्त था। मैं 'हरहर महादेव' का उदघोष करते हुए संगीन तानकर उसकी ओर दौड़ पड़ा। जवाब में उसने 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा लगाया और हंटर्स नाइफ लेकर मेरी तरफ भाग। हम दोनों टकराए। कार्बाइन के आगे लगी संगीन भारी पड़ी। उसकी चाकू मेरे कंधे को छील भर पाई जबकि मेरी संगीन उसके पेट में पैबस्त हो गई। वह गिरा लेकिन दर्द में कराहने की जगह 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा लगाते हुए। मैंने अगले वार में उसकी छाती दाहिनी छेद दी। उसने मुट्ठी बांधकर  'पाकिस्तान ज़िंदाबाद' का नारा लगाया। अगला वार मैंने बाईं तरफ दिल पर किया। वह फिर मुट्ठी बांधकर बुदबुदाया 'पाकिस्तान ज़िंदाबाद'। उसके मुंह से झागदार खून बहने लगा था।


"मैं बुरी तरह थक गया था। मुंह सूख रहा था। मैंने पानी की बोतल निकाली। पीने जा ही रह था कि नज़र पाकिस्तानी पर चली गई। उसकी आंखें पानी की बोतल पर गाड़ी थीं। उसका दम उखड़ चुका था। मैंने बोतल से कुछ घूंट पानी उसके मुंह पर टपका दिए। उसने ओठों पर जीभ फिराकर और पानी मांगा। मैंने कुछ बूंदें और टपका दीं। उसने पलकें बन्द कर लीं और निश्चल हो गया। 

कर्नल साहब की आंखें गीली हो गईं। रूमाल से आंखें पोछते हुए उनके मुंह से निकल गया 'इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलाही राजिऊन'। फिर श्रोताओं से मुखातिब होते हुए बोले, "ये क़ुरआन की लाइनें हैं। इनका मतलब है कि हम सब का सम्बंध अल्लाह से है और हम एक दिन उसी के पास चले जाते हैं।"


लफंगों के हाथ पिटने की कर्नल साहब ने भले ही थाने में रिपोर्ट न लिखाई हो मगर वे उस घटना को भूल नहीं पा रहे थे। किसी को उसकी दाढ़ी या धर्म के कारण कैसे पीटा जा सकता है? उनकी फ़ौज़ी ट्रेनिंग और अनुभव से इस सवाल का जवाब नहीं मिल पा रहा था। पर वे यह भी देख रहे थे कि उनकी दाढ़ी को वे भी नहीं पचा पाते थे जो शाम को उनके साथ दो पेग झाड़ते थे। 


पीटने वालों को कुछ तो गलती का अहसास होना ही चाहिए। एक दिन यही सोचते हुए कर्नल साहब थाने जा पहुंचे। संयोग से थानेदार अपने कार्यालय में मिल गए। उन्होंने उस दिन की पूरी बात बताई और कहा, "मैं बच्चों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं चाहता पर इतना अवश्य चाहता हूं कि आप एक दिन बुला कर उन्हें समझा दें। मुझे भी बुला लीजिएगा। में भी कोशिश करूंगा। शायद हृदय परिवर्तन हो जाए।"


थानेदार ने पूरी बात सुनी। फिर बोला, "ख़ान साहब, आपकी समस्या का समाधान बड़ा सरल है। आप दाढ़ी मुड़ा लीजिए। समस्या की जड़ वही है। आप कोई सिक्ख तो हैं नहीं कि केश कटाने पर कोई धार्मिक रोक हो। आप तो जानते ही हैं कि देश सैकड़ों साल की गुलामी से मुक्त हुआ है। लोग उत्साह में हैं। आज़ादी का जश्न है। ठीक है, दाढ़ी सुन्नत है। लेकिन आप ही बताइए: सुन्नत बड़ी कि जान?"


"लेकिन मैं..." कर्नल साहब ने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन थानेदार ने मौका न दिया।


"अरे, छोड़िए ख़ान साहब...पहले मेरी बात सुन लीजिए...यह देखिए..." थानेदार ने मेज़ की दराज़ से एक नन्ही-सी किताब निकाली और बोले, "यह सुखमनी साहिब है। सुबह, दोपहर, शाम या रात। जब भी वक़्त मिलता है, एक बार जरूर इसका पाठ करता हूं। 


"हां, मैं सिक्ख हूं। 1984 में मेरे बाप को दाढ़ी और बाल के कारण इसी गोविंद नगर में ज़िंदा जला दिया गया था। उसी रात मेरी मां ने कैंची लेकर मेरे केश अपने हाथ से काट डाले थे। दाढ़ी-मूछ तब आई नहीं थी।"


कर्नल साहब घर लौट आए हैं। उन्होंने लड़ने का फैसला किया। उन्होंने खुद से कभी भी दाढ़ी न कटाने की प्रतिज्ञा कर डाली है। उन्हें कभी कभी कानों में 'पाकिस्तानी है' कमेंट भी सुनाई देता है। उनका बैठका अब भी गुलज़ार रहता है। वे किस्से सुनाते रहते हैं। उनको यकीन है कि उनके किस्सों से बदलाव आएगा। इन दिनों वे टैगोर का एक गीत बड़े मन से गाया करते हैं: 

चित्त जेथा भोय शून्नो, उच्चो जेथा शीर

ज्ञान जेथा मुक्तो जेथा गृहेर प्राचीर।

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कटिहार-अमृतसर एक्सप्रेस

 


कटिहार-अमृतसर एक्सप्रेस 

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सवाल है कि बिहार के गरीब आदमी के कष्ट कब मिटेंगे?सरल सा जवाब है, जब वह चाहेगा। मगर उसने तो मान लिया है कि उसके अंदर दुख, अपमान और गलाज़त सहने की अंतहीन क्षमता है। सबसे बड़े बिहारी बाबू अशोक ने बुद्ध को अपना लिया और अपने सद्कर्मों के प्रचार के लिए शिलालेखों के काम में मस्त हो गए। दूसरी ओर उनकी प्रजा चत्वारि आर्य सत्यानि के पहले सत्य यानी दुख के आगे यह जान ही नहीं पाई कि कष्ट से निजात पाने का मार्ग भी है। 

उसी अशोक के बनवाई जीटी रोड पर हांफते-भागते बिहारी को ज़रा ध्यान से देखना। लगेगा, चेहरे पर मुस्कान रह-रह कर सिसक रही है। 

मैं जो दास्तान सुनाने जा रहा हूं वह बीस साल पुरानी है। इसके दुखभोक्ता पात्र शायद आज के सड़क नापते माइग्रेंट्स के माता-पिता रहे होंगे। तो, सुने: 

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किस्सा अप्रैल, 2001 का है। तब कटिहार-अमृतसर एक्सप्रेस का नम्बर 5707/5708 हुआ करता था। उन दिनों मैं जालंधर के एक अखबार में काम करता था। प्राइवेट नौकरी, नाईट ड्यूटी। और, तिस पर अंडर स्टाफिंग। घर यानी नौ सौ किमी दूर कानपुर जाने का मौका कब मिलेगा पता नहीं होता था। यह समझिए कि छुट्टी की स्थायी अर्ज़ी लगी रहती थी। बॉस को जब खुशी होती तो रात एक-दो बज़े चंद दिनों की छुट्टी दे देता।

इस हालत में मैं एक भी दिन नष्ट किए बिना तड़के जालंधर रेलवे स्टेशन को भागता। बिना आरक्षण। मेरी ट्रेन होती थी वही कटिहार-अमृतसर। छूटती थी आठ बजे।


जनरल बोगी में यात्रा के लिए मैंने खूब तैयारी की। खूब अच्छे कपड़े पहने। अलग दिखने के लिए। कपड़ों पर खशबू भी उड़ेली और ट्रेन आने के एक घण्टा पहले स्टेशन पहुंच गया। वहां सबसे पहले मैंने सिडनी शेल्डन का नॉवेल खरीदा ताकि10-11 घंटे कट जाएं।

ट्रेन के आते ही सरदारों के बीच कनपुरिया स्टाइल अपनाते हुए मैंने सिंगल सीट विंडो पर कब्ज़ा कर लिया।

डिब्बा भर गया पर कोई रेलमपेल न थी। ज़्यादातर लोग नौकरीपेशा डेली पैसेंजर थे। जालंधर और लुधियाना के बीच यात्रा करने वाले।

लुधियाना में खूब जगह हो जाएगी! मैंने खुश होकर किताब खोल ली। धर्मेंद्र के गांव साहनेवाल होते हुए गड्डी कब लुधियाना लग गई मैं जान ही नहीं पाया। होश तब आया जब मेरे घुटनों पर सामने वाले मुसाफिर के घुटने गड़ने लगे। मैंने नज़र उठाई। सामने तीन 'भइया' बैठे थे। दाहिनी ओर गैलरी आदमियों और गठरियों से अंटी पड़ी थी। एक आदमी सिर पर बोरा लिए इशारा कर रहा था कि मैं पांव उठा लूं तकि वह दो सीटों के बीच की जगह में अपना बोझ रख सके। मेरी पीढ़ियों से वातानुकूलित कुलीनता उबलने लगी। तभी मेरी नज़र उस आदमी के पांव पर पड़ी। वेरिकोज़ वेन्स से ग्रस्त उसकी टांगें भार के कारण थरथर कांप रही थीं। मेरा मन पिघला। मेरा बरसों सद्साहित्य पढ़ना उस गरीब के काम आया। मैंने घुटने मोड़ कर पांव सीट पर रख लिए। तब तक बोरे पर सात या आठ साल का बच्चा बैठ चुका था।

अभी ट्रेन चली नहीं थी। गरमी शबाब पर थी और ओवरपैक डिब्बे में हवा आने की कोई गुंजाइश नहीं। मुसाफिरों के शरीर के छोटे बड़े रंध्रो से निकल रही द्रवीभूत और गैसीभूत बदबू  वातावरण में घुल रही थी। तभी साममे वाले लड़कों ने झालमूड़ी निकाल ली। मैं बुरी तरह प्यासा था। उबकाई आने लगी। मैंने देखा कि मुसाफिर सामान सेट करने के बाद सामान्य हो चुके थे। गप्पें होने लगी थीं। कहीं बज्जिका सुनाई द रही थी तो कहीं छपरा वाली भोजपुरी। मैथिल, अंगिका भी सुनाई दे रही थी और पुरैनिया की बांगला मिश्रित बोली।

बाप रे बाप!! इत्ता बड़ा बिहार। सिर्फ उत्तर बिहार। नन्हे से डिब्बे में समा गया था। और बास मार रहा था।

ट्रेन चल दी थी और हवा किसी तरह अंदर आने का रास्ता बना पा रही थी। उपन्यास पढ़ने की कोई गुंजाइश न बची थी। हां उसका और अच्छे कपड़ों का एक असर था कि मेरी सीट पर मैं अकेला था, हालांकि उकडूं।

ट्रेन खन्ना और राजपुरा क्रॉस कर हरियाणा की सीमा में प्रवेश कर रही थी। तभी डिब्बे के भीतर से मरणांतक पीड़ा से भरा चीत्कार सुनाई दिया। एक मर्दानी मगर बूढ़ी आवाज़ में कोई चीख रहा था, मुआ देलस रे..मुआ देलस रे (मार डाला, मार डाला)। इसी के साथ लाठी चलने की आवाज़ भी सुनाई देने लगी। मैं उठकर देखने की स्थिति में नहीं था। मैंने सामने मूढ़ी खाते लड़कों से उठकर देखने को कहा। वे नहीं हिले। मूढ़ी खाते रहे। 

आर्तनाद और लाठी की चटकार बढ़ती जा रही थी। मेरे अंदर का भला मानस, बुरा कानपुर और सहाफी एक साथ उबल पड़ा: कउन है बे माxxx!! में पूरी ताकत लगा कर हुमक के उठा। भीड़ ने मुझे स्पॉट पर जाने का रास्ता दे दिया। मैं उस तरफ बढ़ चला। तड़ाक-तड़ाक। लाठी की आवाज़ फिर सुनाई दी और उसी के साथ रोता-कलपता स्वर...साहिब सब कुछ ले लो बस मारो नहीं।..

मैं अब घटनास्थल पर था। एक 50 साल का काला-सा आदमी गर्भस्थ शिशु की पोजीशन में पड़ा बिलबिला रहा था। वह मैली सी बंडी और ग्रीज़-तेल में सनी लुंगी पहने था। उसने एक हाथ से कमर पर लुंगी की टेंट को दबोच रखा था। उसके सिर से खून बह रहा था और वह फ़टी-फ़टी आंखों से यमराज की मानिंद खड़े हरियाणा पुलिस के कॉन्स्टेबल को देख रहा था। मुझको आता देख सिपाही थम सा गया था। थोड़ा चकित था क्योंकि उसे उस डिब्बे में मेरे जैसे आदमी के मिलने की कोई उम्मीद न थी। मैंने आवाज़ में गुरुता भरकर सवाल किया, "क्या कर रहे हैं, दिवान साहब।"

"आपसे मतलब!!" इतना कहके सिपाही बैठ गया और उस आदमी के हाथ को लुंगी की टेंट से हटाने लगा। गरीब आदमी ने टेंट को मजबूती से दबोच रखा था।

"इस आदमी की टेंट से पैसे छीन रहे हो" मेरा क्रोध बढ़ रहा था। बोला, "तुम्हारे एसपी से शिकायत कर दूंगा..सब बहादुरी निकल जाएगी!!"

"कौन हैं आप?" उसकी आवाज़ से पुलिसिया हनक गायब हो गई थी। वह गरीब आदमी को छोड़ कर उठ खड़ा हुआ। 

मैंने उसकी आँखों के सामने अपना कार्ड चमका दिया। जवाब में वह मिठास भरकर शिकायती लहज़े में बोला, "यह चरस-गांजे का धंधेबाज़ है। मुझे पक्का विश्वास है कि इसकी टेंट में चरस की बड़ी गोट है।"

मैं उस बदहाल बिहारी को देख रहा था। पिचका हुआ पेट और बमुश्किल तमाम 40 किलो वजन। मैंने हंसकर कहा, "दिवान साहब, इसने शायद कई दिन से रोटी भी न खाई हो..चरस के तस्कर ऐसे होते हैं क्या?"

इस बीच ट्रेन धीमी होकर रुक सी रही थी। सिपाही यह कहते हुए दरवाज़े की तरफ चला गया कि सहाफी और सिपाही भाई-भाई होते हैं। दोनों समाज के भले के लिए काम करते हैं। ट्रेन रुक गई थी। सिपाही ने मेरी तरफ़ देखा। जयहिंद का सलाम उछाला और उतर गया।

सफलता से झूमता मैं अपनी सीट पर आ गया। ट्रेन फिर चल दी थी और सारे मुसाफिर मुझे श्रद्धा से निहार रहे थे। मेरी छाती गर्व से फूल रही थी। फटेहालों का नायक!! 

मैं सहसा वोकल हो उठा...तुम लोग लड़ते क्यों नहीं..पूरे डिब्बे में तुम डेढ़ सौ लोग हो..उस सिपाही की क्या औकात..अगर दारा सिंह भी यहां आ जाएं तो तुम उसकी तिक्का-बोटी कर डालो..।

मेरा लेक्चर रुकने का नाम नहीं ले रहा था। विराम तब लगा जब गाड़ी अम्बाला स्टेशन पर रुकी। चाय, पूड़ी, छोले आदि का शोर मचने लगा। मैं बाहर का मंज़र देखने लगा। तभी देखा कि खिड़की के बाहर वही दिवान जी एक झोला लिए खड़े हैं। मेरी खिड़की इमरजेंसी एग्जिट वाली थी, जिसकी ग्रिल को पूरा उठाया जा सकता है। दिवान जी ने एक मुसाफिर से ग्रिल उठाने को कहा। ग्रिल उठा और दिवान जी ने झोला मेरी गोद मे रख दिया और जल्दी-जल्दी चले गए।

मैंने झोले का सामान बाहर निकाला। खानेपीने का सामान था। छोले, कुलचे, दही, रबड़ी, एक रेलनीर और एक कोल्ड्रिंक। इसके अलावा कागज़ के एक पाउच और था। मैंने खोला तो उसमें एक डेबोनेयर और एक हिंदी की अश्लीलतम स्तर की किताब थी।

मैंने सिपाही से पिटने वाले आदमी को बुलाया और खानेपीने का सारा सामान दे दिया। जाने लगा तो मैंने रोककर पूछा कि क्या छिपा रहा था। उसने जवाब में टेंट उलट कर दिखा दी। सौ का एक गुड़मुड़ाया नोट था बस। उसने बताया कि तीन सौ रुपए बण्डी की जेब में थे। उन्हें पुलिस वाले ने पहले ही निकाल लिया था। मारपीट लुंगी की टेंट में रखे सौ के नोट के लिए थी। उस गरीब ने जान की बाज़ी लगाकर सौ रुपए बचा लिए थे। वह मुस्कुरा रहा था।

ट्रेन भागती रही। स्टेशन गुज़रते रहे। मैं थोड़ा उनींदा हो गया था। सोनीपत में एक बार नींद टूटी लेकिन फिर से ऊंघने लगा। कुछ देर  बाद नींद टूटी तो देखा ट्रेन मंडी से गुज़र रही है। इसी के साथ डिब्बे के एक छोर से आने लगी सुबकने की आवाज़, जो तेज़ होती गई। आखिरकार मुझे इंटरेस्ट लेना पड़ा। वह आदमी मेरे सामने लाया गया। उसने अपनी बक्सा मेरे सामने खोल दी और बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगा।

"साहब, सारा पोइशा ले गया।"

"कौन?"

"एक सिपाही"

"कब, कहां.. किस स्टेशन पर?"

" वह तभी आ गया था जब गाड़ी लुधियाना से खुली थी"

"फिर क्या हुआ?"

"वह सबका बक्सा खुलवा कर देख रहा था, उसने पहले एक बक्सा खुलवाया। फिर दूसरा नम्बर मेरा था''

"तो?''

"मैंने इनकार कर दिया। इस पर वह मुझे बक्से समेत टॉयलेट में खींच ले गया। दरवाज़ा बन्द कर उसने मेरी छाती पर बंदूक अड़ा दी। बोला-अब खोल। मैंने ताला खोला। भीतर 5000 रुपए रखे थे। उसने रकम जेब में डाल ली और संडास का दरवाजा खोल कर चला गया।"

"तुमने बाहर निकल कर शोर क्यों नहीं मचाया तुरन्त" मैंने पूछा, " और, अब इतनी दूर बाद क्यों रो रहे हो?

लईक नाम का किशनगंज निवासी यह भोला आदमी अपनी बांग्ला मिश्रित बोली में बोला, " शिपाही हाथे बोन्दूक था। बोला, दिल्ली के पहले शोर मचाया तो मैं वापस आकर बोन्दूक से भून दूंगा।"

ट्रेन दिल्ली स्टेशन के अंदर प्रवेश कर रही थी। लईक बेसाख्ता रोए जा रहा था।


पुरानी दिल्ली

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 ट्रेन बस रुकी ही थी कि कोच के दोनों छोरों में कोलाहल मच गया। मारपीट और गाली-गलौज। मेरी सीट कोच के मध्य में थी। इस बार मुझे उत्सुकता व्यक्त करने की ज़रूरत ही न पड़ी। क्योंकि दोनों छोरों से भीड़ का रेला और मारपीट करने वाले 10-12 सेकंड में मेरी ही तरफ आ गए थे।

"सीट खाली कर..." पीटने वाले पश्चिमी यूपी की सीधी, खुरदरी एवं खड़ी बोली का इस्तेमाल कर रहे थे। निवेदन को असरदार बनाने के लिए मा, बहन, नानी जैसे शब्दों का खुल कर इस्तेमाल हो रहा था। इनके बेअसर रहने पर। थप्पड़, घूंसा और दोफिटे रूलर भी चल रहा था। ऊपर की सीट पर बैठे किसी लड़के ने हिम्मत दिखाई तो उसे सर के बाल पकड़ कर नीचे फेंका जा रहा था।

आततायी 12-14 से अधिक नहीं थे लेकिन कमर्शियल सामान के पैकेट बहुत ज़्यादा थे। ट्रेन खुलने से पहले ही सीटों पर पहले से बैठे पचासों लोग सिर झुका कर खड़े हो गए थे। उनकी सीटों पर या तो गुंडे बैठे थे या उनका समान रखा था। मेरी अपनी सीट सुरक्षित थी। मेरा लिबास, बोलने का लहज़ा और गोद में पड़ा अंग्रेजी की किताब मुझे बचा रही थी। एक बार एक गुंडे की आंखों से मेरी नज़र टकराई भी। मैंने इशारे में पूछा भी कि क्या मैं भी सीट खाली कर दूं तो उसने सज्जनता से हाथ जोड़ कर मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "नहीं सर, आप तो अपने साथ के हो, बड़े भाई हो।" गुंडे की इस भलमनसाहत के चलते मैंने सामने बैठे छपरा के तीन मज़दूरों की सीट बचा ली थी। जालन्धर से साथ-साथ आ रहे थे ये तीनों। दोस्ती सी हो गई थी।

ट्रेन चल पड़ी थी। गुंडे भाई सेटल हो चुके थे। भइया बिरादरी को कोई परेशानी नहीं थी। जिनकी सीट बची थी वे बैठे थे और जो खड़े थे, वे भी गपियाने में मशगूल हो चुके थे। इसी को तो कहते हैं स्थतिप्रज्ञता!! 

मैं खिड़की से बाहर झांकने लगा। शाहदरा..साहिबाबाद, ग़ाज़ियाबाद.. दादरी गुज़रते जा रहे थे। मैं ढलती शाम का लुत्फ ले रहा था। इधर, गुंडे भाई ताश की गड्डी निकाल चुके थे। मैं उन्हें देखने लगा। कटपत्ता खेल रहे थे। तभी एक गुंडे ने आवाज़ लगाई, "अरे चच्चा, दो पैसा तू भी कमा ले...आ जाओ, इधर..हम संभाल लेंगे।"

थोड़ी देर में चच्चा नमूदार हो गए। 60 पार की उम्र। बकरा दाढ़ी। लम्बी मटमैली क़मीज़ और उतना ही गंदला अलीगढ़ी पाजामा.. पांयचे एड़ी से छह इंच ऊपर। उनके हाथ में एक झोला था, जिसमें से उन्होंने लिफाफा निकाला और मज़मेबाज़ों की स्टाइल में बोलने लगे, "भाइयो-बहनो, सिर्फ बीस रुपए.. सिर्फ बीस रुपए है कीमत इसकी और इसके अंदर रखा है खज़ाना: एक आईना, एक कंघी, एक डॉटपेन और हाज़मे वाली हींग की गोली।" 

यह सारा सामान बीस साल पहले 4 या 6 रुपए में खरीदा जा सकता था। आईना वही था दो इंच व्यास वाला जिसे मदारी का बन्दर रखता है। कंघी, पांच इंची। डॉटपेन अठन्नी वाला और हींग गोली भी चवन्नी वाली।

इस बीच चच्चा खामोश हो चुके थे और  झोला एक 16 साल के किशोर को थमाया जा चुका था। यह लड़का कागज़ के ये पाउच एक-एक कर हर मुसाफिर को थमाए जा रहा था। कोई आनाकानी करे, उससे पहले लड़का आगे बढ़ जा रहा था। वैसे आनाकानी करने की हिम्मत किसी में बची भी नहीं थी। शायद इसी मकसद के साथ ही वे पीटे गए थे!

झोले वाला लड़का शनैःशनैः मेरी सीट के निकट आ रहा था। मैं कनखियों से देख रहा था और डर रहा था। जान चुका था कि कनपुरियों द्वारा ईजाद की गई लूट की पद्धति टप्पेबाज़ी का यह अलीगढ़ी संस्करण है। मुझे विश्वास था कि अगर मैंने विरोध किया तो कुटाई पक्की है। आखिर, टप्पेबाजों की रोज़ी का सवाल था। मुझे हथेलियों में नमी महसूस हो रही थी। मेरे मन के महासागर में गांधी और भगत सिंह की बहादुरी तथा आदमी के अंदर आत्मरक्षा के लिए ईश्वरप्रदत्त, इनबिल्ट कायरता एक साथ हिलोरें मार रही थी।

सहसा मैं चौंक पड़ा। किसी ने मेरे घुटने पर ठकठक की थी। देखा तो सामने छपरा वाला मज़दूर मुखातिब था।"ज़रा सुनीं... " वह बड़ी धीमी आवाज़ में बोला कि कोई और न सुन पाए।

"का बा?" मैंने पूछा। 

"हमरा का ई पुड़िया न चाही।"

इसके बाद तो मैं उस स्थिति में आ गया था, जिसमे हीरो को कहना पड़ता है कि एक बार कमिटमेंट कर लिया तो फिर मैं अपनी भी नहीं सुनता। मैं क्या करता? गोस्वामी जी मेरे कान में लगातार गा रहे थे

...शरणागत का जे तजहिं निज अनहित अनुमान...ते नर पांवर पापमय तिनहि बिलोकति हानि..।

मैंने एक लंबी सांस खींची..गोस्वामी जी फिर गुनगुनाए..

सौरज धीरज तेहि रथ चाका/सत्यशील दृढ़ ध्वजापताका

"परेशान न हो।" मैंने छपरा वाले को अभयदान दे दिया। इस बीच वह लड़का उसकी गोद में पाउच डाल कर आगे बढ़ गया था। बहरहाल, मुझे बख्श दिया गया था। मुझे इससे बड़ा बल मिला।

अब तक पाउच बंट चुके थे। टप्पेबाज़ी का बस अंतिम चरण बाकी था। इसके लिए बलिष्ठ शरीर के दो बदमाश निकले और पाउच की कीमत वसूलने में जुट गए। 

"बीस रुपए...बीस रुपए..बीस रुपए।" एक गुंडा बोलता जा रहा था। लोग बिना हीलहुज्जत के रकम निकलते जा रहे थे। सिर्फ दो ने नानुकुर की तो एक घूंसे, दो लप्पड़ में ढीले हो गए।

वसूली टीम अब मेरे पास आ रही थी। मेरी धुकधुकी बढ़ रही थी। शरणागत की और अपने सम्मान की रक्षा करनी थी। मैंने पूरी तैयारी कर रखी थी।

वसूली टीम छपरा वाले मज़दूर के सामने आ चुकी थी। वह गुंडों को बिसूरने लगा। "अबे, मा के xxx टुकुर-टुकुर क्या देख रहा है..चल निकाल बीस रुपए।"

"साहब की तरफ क्यों देखता है रे, वो क्या करेंगे तेरा।" गुंडों ने उसे हड़काते हुए एक नज़र मेरे चेहरे पर भी डाली।

यह आंखों के ज़रिए ताल ठोकने जैसा था। अब रुक पाना सम्भव नहीं था। मैं बोला, "यह लड़का आपका सामान नहीं खरीदना चाहता।"

"तू कैसे जानता है?"  गुंडे अब मेरी तरफ मुड़ चुके थे। "मुझको मालूम है"

"कर साबित...नहीं तो तेरी साहबी अभी घुसेड़ दूंगा।"

मैंने वह पाउच उस मज़दूर से ले लिया। फिर मज़दूर से बोला,"बताओ, तुम्हे यह चाहिए कि नहीं।"

"नहीं चाही, नहीं चाही, नही" मज़दूर हिम्मत दिखा रहा था।

मैंने गुंडों से कहा, अब बोलो?


तू इस लफड़े में न पड़, गुंडे मुझे समझाने लगे। पर मैं नहीं माना। वे भी नहीं माने। उनकी ज़िद थी कि पाउच वापस मज़दूर को दे दूं। 

"पाउच बीस रुपए का ही है न?" मैंने यह सवाल गुंडों की तरफ उछाला और साथ ही उस पाउच को चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया।

गुंडे हक्का बक्का थे। पर मैंने उन्हें रीएक्शन का मौका ही नहीं दिया। मैंने एक हाथ में 20 का नोट पहले से थाम रखा था। मैंने वह नोट गुंडों को थमा दिया। गुंडों के चेहरे पर विचित्र से भाव थे। शायद वे तय नहीं कर पा रहे थे कि वे जीते हैं या हारे। दरअसल, जानता तो मैं भी नहीं था कि ये हार है या जीत।

इस बीच ट्रेन अलीगढ़ के आउटर पर खड़ी हो गई थी। गुंडे भाई वहीं उतर रहे थे। और मज़दूर भाई उन सीटों पर दोबारा काबिज हो रहे थे, दिल्ली में छीन ली गई थीं। सामने वाला छपरैया मज़दूर मुझे कृतज्ञ भाव से देख रहा था। कुछ मज़दूर आपस में बात कर रहे थे..अब बस एक ही बैरियर है कानपुर का। उसके बाद गुंडे नहीं मिलेंगे। 

कानपुर में मैं उतर गया। नहीं जान पाया कि मेरे शहर के गुंडों ने इन भोलेभाले लोगों को कैसे लूटा।

चलते चलते इतना और बता दूं कि एक माह बाद मैंने इसी ट्रेन की जनरल बोगी से फिर यात्रा की थी। मैं इन श्रमिकों को लड़ने के लिए प्रेरित करता रहा। वे नहीं लड़े और लुटते पिटते रहे। काश ऐसा नहीं होता।