Sunday, April 13, 2025

बेतुकी बातें G

 बेतुकी बातें: 4

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आ अब लौट चलें

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सिरम्मन: आओ जंगल चलें


झम्मन: वाह क्या बात है! कविता लिख रहे हो क्या?


सिरम्मन: हां। गंभीर कविता। 


झम्मन: तो अगली लाइन मेरी


सिरम्मन: बोलो


झम्मन: आओ जंगल चलें...लोटा लेकर चलें


सिरम्मन: तुझसे तो मन की बात करना भी गुनाह है। मैं जंगल को लौट चलने की बात कह रहा था।


झम्मन: कहां से लौट चलें?


सिरम्मन: इस समाज से, इस सिविलाइजेशन से।


झम्मन: वहां क्या होगा?


सिरम्मन: जंगल में मंगल होगा। 


झम्मन: वहां रहोगे कहां? खाओगे क्या?


सिरम्मन: मैं शहद पीऊंगा, फल खाऊंगा


झम्मन: और मैं? 


सिरम्मन: तुम हिरन की शाही रान चबाना।


झम्मन: कच्ची?


सिरम्मन: नहीं। तुम साथ में मानव के सबसे बड़े आविष्कार माचिस को साथ ले जाना ताकि जंगल को आग लगा सको।


झम्मन: जंगल सरकार का होता है। शहद सरकार का। फल सरकार के। हिरन सरकार के। जंगल तुम्हारे बाप का नहीं। 


सिरम्मन: तो क्या सरकार के बाप का है?


झम्मन: और किसका है? उसने ढेर सारे कानून बना रखे हैं।


सिरम्मन: तो हम प्राचीन जंगल में जाएंगे। 20000 BC के अक्षत जंगल में, जहां इन सरकारों का नहीं,  कुदरत का निज़ाम होगा...जहां सिर्फ एक कानून होगा। 


झम्मन: एक कानून! कौन सा?


सिरम्मन: शक्तिरेव जयते।


झम्मन: आंय! 


सिरम्मन: सही सुना। सत्यमेव नहीं, शक्तिरेव जयते। यानी ताकत की ही जीत होती है। यह कुदरत का कानून है। सभी जानवर इसे जानते हैं। इसीलिए चीता और हिरन दोनों दौड़ने की शक्ति बढ़ाने में लगे रहते हैं। 


झम्मन: इस बार चैत में ही जेठ वाली गर्मी आ गई है। तेरी खोपड़ी में चढ़ गई है।


सिरम्मन: गलत। दरअसल, जूते खाते खाते तेरी खोपड़ी का भेजा उड़ गया है। सुन, तुझे जंगल के कानून के गुण बताता हूं।


झम्मन: बता।


सिरम्मन: देख, आज के निज़ाम में कोई चिंदी चोर भी गामा पहलवान की खोपड़ी गोली से उड़ा सकता है। है कि नहीं?


झम्मन: उड़ा सकता है...


सिरम्मन: लेकिन जंगल में कभी कोई हिरन सोते हुए शेर के पेट में सींग नहीं घुसेड़ सकता...


झम्मन: बरोबर। लेकिन जंगल में हत्याएं बहुत होती हैं! गलत कह रहा हूं?


सिरम्मन: बिलकुल। जंगल में वध और हत्या जैसा कोई विचार नहीं। जानवर बस भोजन करते हैं। तुम क्या सोचते हो, शेर किसी रंजिश के तहत हिरन को को मारता है! न भाई न। वह तो उन्हें भूख लगने पर मारता है। न कभी हाथ पांव बांधकर बलि देता है न कुरबानी। 


झम्मन: बात तो सही है लेकिन...


सिरम्मन: लेकिन क्या? जंगल में मंगल है। वहां मॉरल और इममॉरल जैसा कुछ नहीं होता। सब कुछ एमॉरल। सब नंगे रहते हैं। सब चंगे रहते हैं। कोई किसी की छाती नहीं घूरता न रेप करता है।


झम्मन: समझा। सब नंगा सी, सब चंगा सी!


सिरम्मन: और, हां! वहां कोई पॉल्यूशन भी नहीं। न कोई गंदगी।


झम्मन: सुलभ शौचालय बने होते हैं क्या?


सिरम्मन: हां, मदर नेचर वहां सुलभ शौचालय भी चलाती है। उसके वर्कर हर अपशिष्ट पदार्थ को पंच तत्वों में विलीन कर देते हैं। लाशों को भी। 


झम्मन: मतलब यह सारी गंदगी हमारी देन है!


सिरम्मन: ऑफ कोर्स। हमारे विकास की देन। आदमी ने धरती माता को सिवाय गंदगी के और दिया ही क्या है?


झम्मन: और, हम जो मंगल गृह में बसने जा रहे हैं! उसका क्या?


सिरम्मन: उससे धरती को क्या फायदा? क्या चंद्रमा पर चढ़ाई करने से धरती पर चांदनी के फूल खिलने लगते हैं? क्या हवाई जहाज़ के उड़ने से मलयानिल बहने लगती है? क्या फैक्ट्री लगाने से गाय ज्यादा दूध देने लगती है?


झम्मन: तो फिर चला जाए?


सिरम्मन: लेकिन लोटा या जमालगोटा ले कर न चलना। वहां धरती अम्मा ने सारा इंतज़ाम कर रखा है।

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