कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद
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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है. इसके किसी भी पात्र का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं. संयोग की बात दीगर है)
पिता ने तो नाम रखा था प्रेमानंद लेकिन वॉट्सएप यूनिवर्सिटी से इतिहास में आचार्य की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने केसरिया बाना धारण कर लिया और अपना नया नाम रख लिया: श्री श्री 108 श्री स्वामी नफरतानंद।
उनका सबसे बड़ा गुण यही था कि वे किसी से भी नफरत कर सकते थे। स्वयं से भी। यह उनका चरम सुख था। इस स्थिति को वे मोक्षदायनी परम गति कहते थे। खुद से नफरत करने की स्थिति रोज़ रात शयन के वक्त आती थी, जब उन्हें अपनी गर्लफ्रेंड याद आती थी। "कुतिया!" उनके मुंह से यह गाली बरबस फूट पड़ती। उस लड़की का कुसूर बस इतना था कि उसने एक दिन नफरतानंद को किस कर लिया था। स्वामी जी को मुंह जूठा होने की अनुभूति से उबकाई आ गई और वे वहीं बगीचे में खिले गुलाबों पर थूक की पिचकारी मारकर बोले, "छी! अब तुझसे प्रेम नहीं कर सकता। यह पाश्चात्य वासना और तुम्हारे थूक से सना फ्रेंच किस मुझे बर्दाश्त नहीं। मैं तो राधा और कृष्ण के पवित्र आध्यात्मिक प्रेम में विश्वास करता हूं। मैं तो चला। तू यहीं पार्क में कोई ग्राहक तलाश ले।"
लड़की का चेहरा अपमान, नारी सुलभ लज्जा और क्रोध से लाल हो गया और वह तमतमा कर बोली, "कभी सूरदास को और संस्कृत आती हो तो जयदेव को पढ़ लेना। तब तुम्हे राधा और कृष्ण के प्रेम का ज्ञान होगा।"
नफरतानंद ने 'मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहौं' और 'मैं नहि माखन खायो' से आगे सूरदास को नहीं पढ़ा था। संस्कृत में स्कूल में चंद श्लोक पढ़े थे। जयदेव का तो नाम ही नहीं सुना था। वॉट्सएप यूनिवर्सिटी में तो इस तरह के अश्लील ज्ञान का कोई सिलेबस ही नहीं था।
बिस्तर पर लेटे नफरतानंद की बंद आंखें प्रेमिका से विछोह का यह मंजर हर रात विडियो क्लिप की तरह देखतीं। नफरतानंद कुत्ते की तरह हांफने लगता। टेस्टोस्टेरॉन एक तरफ उबाल मारता और उच्च संस्कार विचार दूसरी तरफ। यही वह क्षण होता जब उसे खुद से नफ़रत हो जाती। वह उठता और एक गिलास पानी के साथ विजया मिश्रित लवणभास्कर चूर्ण फांक कर सो जाता।
(जारी)
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