कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद (5)
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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)
डॉक्टर ने कहा, "इस बीमारी का नाम शॉडेनफ्रायडा है। इस नाम का ताल्लुक जर्मनी से है। वहां की जबान में शॉडेन का अर्थ होता है चोट करना, नुकसान करना या दुख पहुंचाना। और फ्रायडा का मतलब होता है आनंदित होना। सो, इस शब्द का अर्थ हुआ किसी दुखी प्राणी को देखकर या किसी आदमी को दुख देकर सुख की अनुभूति करना। वैसे यह भावना कुछ मात्रा में शायद हर व्यक्ति में पाई जाती है। जब पड़ोसी की फॉरच्यूनर चोरी हो जाती है तो डिजायर कार वाले को जो आनंद मिलता है उसका कारण यह शॉडेनफ्रायडा ही होता है। यह रोग की स्थिति नहीं है। लेकिन यही भावना रोग की श्रेणी में उस वक्त आ जाती है जब डिजायर मालिक पड़ोसी की फॉरच्यूनर की चोरी करा देता है।
"आपका भांजा इस रोग के ऊंचे पायदान में है। बालक के दांतों में दर्द इसलिए है कि वह अपनी इच्छाओं पर अमल नहीं कर पा रहा। आपने उसे गऊ माता की सौगंध दे रखी है। वह तो बहुत कुछ करना चाहता है मगर वह गऊ माता की सौगंध नहीं तोड़ सकता। उसकी यही छटपटाहट दांत के दर्द का रूप लेकर बह रही है...अतएव आपसे प्रार्थना है कि बच्चे को सौगंध से मुक्त कर दीजिए।"
"ठीक है डॉक्टर साहब, मैं बालक को कसम से मुक्त कर दूंगा लेकिन ऐसा न हो कि मुक्त होते ही मेरे सर पर पत्थर दे मारे!?" मामा जी ने अपनी चिंता बताई।
"चिंता न करिए। कंस मामा" डॉक्टर हंस पड़ा,"मैं दवाएं दे दूंगा और उम्मीद है कि यह ऐसा कुछ नही करेगा। लेकिन यह रोग पूरी तरह कभी भी नहीं ठीक होगा।शॉडेनफ्रायडा कमोबेश हर आदमी के अंदर होता है। संतों और महात्माओं के अंदर भी। सुना नहीं मठों और डेरों के अंदर संपत्ति के लिए मर्डर हो जाते हैं।"
(नफरती को पार्क में मिला एक आदमी: पढ़ें कल)
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