Sunday, April 13, 2025

नफ़रतानंद 2

 कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद(2)

++++++++++++++++++++++++++


(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)


नफरतानंद को अपनी माता से अधिक गऊ माता से प्रेम था क्योंकि उन्होंने चतुष्पदी मा का ही दूध  पिया था। सगी मा से तो उनको नफ़रत-सी थी क्योंकि उसने छठे महीने से ही उनको दूध पिलाना बंद कर दिया था। वह करती भी क्या? छठे महीने में जब उनके मुंह में दंत पंक्ति उभरनी शुरू हुई तो उन्होंने उसका सर्वप्रथम उपयोग मा की छाती पर ही किया। बहुतेरी कोशिश के बाद मा जब उनकी कुटेव छुड़वा नही पाई तो उसने नन्हे शैतान को गऊ माता के सुपुर्द कर दिया।


जैसे जैसे वे बड़े होते गए, वे सुख के नए साधन खोजते गए। घुटनों पर चलने तक वे शिकार में सुख तलाशने लगे। वे चीटों का शिकार करते। जहां कहीं चीटों की कतार मिलती वे एंबुश की मुद्रा में पालथी मारकर बैठ जाते और चपत मारमार कर चीटों को यमलोक पहुंचाते जाते। वे यहीं पर न रुकते। अपने गेम को वे खा भी डालते थे। खट्टे फॉर्मिक एसिड की उनको लत पड़ गई। लत तब छूटी जब एक दिन एक चीटे ने टांगों के बीच घुसकर ऐसा काटा कि तीन दिन तक सूसू करना मुहाल हो गया। उस दिन से आज तक उन पर चीटों का खौफ इस कदर तारी है कि वे एक भी चीटे को देख लेते हैं तो उनका हाथ क्रॉच को ढक लेता है।


नफरतानंद अगर अपनी मा से चिढ़ते थे तो बाप से बाकायदा घृणा करते थे। घृणा रेसीप्रोकल थी, जो समय के साथ बढ़ती चली गई। छह-सात साल की उम्र तक बाप उनको लगभग हर दिन पीटने लगे थे क्योंकि उलाहने भी तो रोज़ आने लगे थे। नफरती कभी किसी बच्चे का सर फोड़ देता तो किसी के गाल में पेंसिल घुसेड़ देता। 


एक दिन उसने छत पर बिल्ली को खदेड़ा तो वह तीन मंजिल से कूद गई। नफरती को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि इतनी दूर से कूदने के बाद बिल्ली मरी नहीं थी और दौड़कर सड़क के उस पार वाली बिल्डिंग में घुस गई थी। अगले ही दिन नफरती ने एक एक्सपेरिमेंट कर डाला। उसने पड़ोसी के पोमेरियन को छत से फेंक दिया।


उस शाम बाप ने उसे चमड़े की बेल्ट से पीटा। उसी शाम नफरती ने स्कूल में सीखी मा की गाली का पहला प्रयोग किया। बेल्ट की हर सटाक के साथ वह ज़ोर से चीखता ... माxxxद।


नफरती जब 12-13 साल का हुआ तो एक बार उसे दशहरा में रामलीला देखने का अवसर प्राप्त हुआ। राम और रावण का युद्ध देखने का असर यह हुआ कि कई दिन तक वह कभी क्रिकेट बैट को गदा की तरह भांजता मिलता तो कभी दफ्ती की तलवार बनाकर स्वांग करता दिखता। एक दिन उसे कहीं से बांस की खपच्चियां मिल गईं। फिर क्या था। बन गया रामचंद्र जी का धनुष। खपच्ची का ही तीर भी बन गया, जिसकी नोक उसने एक चाकू से पैनी कर ली। धनुर्धारी ने कई दिन तक चिड़ियों पर निशाना साधा। हर बार चिड़िया बच गई। हार कर नफरती ने एक पड़ोसी बच्चे को टारगेट प्रैक्टिस के लिए बुला लिया। पहले बीस फुट से तीर चलाया गया। तीर लड़के से दो फूट दूर से गुजरा। अगली बार 15 फुट से कोशिश की मगर निशाना नाकाम। फिर 10 फुट...निशाना नाकाम। अंत में पांच फुट से तीर चलाया गया। इस बार तीर लगा मगर निशाने से डेढ़ बालिश्त ऊपर। उसकी नोक बाईं आंख में घप्प से घुस गया। खून की धार बह निकली।


(जारी)

No comments:

Post a Comment