Sunday, April 13, 2025

नफ़रतानंद 7

 कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद (7)

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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)


कुछ दिन बाद 'खून का बदला खून से लेंगे' जैसे नारे बंद हो गए। एक दिन नफरती पार्क में अन्यमनस्क भाव से बैठा था। तभी एक बूढ़ा उसके बगल में आ बैठा। स्वभाव के मुताबिक नफरती ने आंखे तरेरीं। बुड्ढा मुस्कराया, "तुम्हारा यही अंदाज़ तो मुझे तुम्हारे पास खींच लाया है।"

"कैसा अंदाज़, बुड्ढे...क्या बक रहा है तू..फटाफट इड़ीदुड़ीतिड़ी हो जा..पंगा मत लेना.. तू मुझे जानता नहीं..काट डालता हूं काट।" 


"तुम्हें जानने के बाद ही तो तुम्हारे पास आया हूं। मैंने पिछले दिनों तुम्हारा हस्तकौशल देखा है। पुलिस में भी तुम्हारी चर्चा है" बूढ़े ने एक बार फिर मुस्करा कर कहा, "तुम्हारे पास बड़ी ऊर्जा है। मैं चाहता हूं तुम इसे राष्ट्रहित में लगाओ। भारत माता की सेवा में लगाओ।"

"मैं तो गऊ माता की सेवा में लगा रहता हूं" नफरती ने कहा, "दो दो माताओं की सेवा कैसे करूंगा?"

"वाह!" बुड्ढा खुशी से उछल पड़ा, "गऊ माता की सेवा करते हो..फिर तो सोने में सुहागा। गऊ माता और भारत माता की सेवा में कोई फर्क नहीं है। बस तुम हमारे साथ आ जाओ।"


"बुढ़ऊ" नफरती उकता कर बोला, "अब हिन ते तुम कटि लेव, नहीं तौ हेइँ फोड डरिबे।" ठेठ कनपुरिया स्लैंग में हड़का कर नफरती रेल पटरी की तरफ चल दिया। उसे कमरुन्निसा की याद आ रही थी।


(कमरुन्निसा ने भगा दिया नफरती को: पढ़ें कल)

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