कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद (6)
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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)
नूर मंजिल की दवाओं ने नफरती को स्वस्थ कर दिया। वह स्कूल जाने लगा। स्कूल में उसने कोई बड़ा कांड नहीं किया। बस कभी कभार मारपीट कर लिया करता था। इसी से उसका मन भर जाता।
समय बीतता गया। नफरती हाईस्कूल में पहुंच गया। बस पहुंच गया। उसे लांघ नहीं पाया। सो, जब दूसरे साल भी वह फेल हो गया तो मामा जी ने उसे वापस अपनी बहन के पास वापस कानपुर भेजने का फैसला कर लिया। वहां अब कोई खतरा भी नहीं थी। तीर से काने हुए लड़के की फैमिली किसी पराए शहर जा बसी थी। पुलिस ने भी केस फाइल बंद कर एफआर यानी फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी।
सो, मामा जी ने एक दिन अपने भांजे को चारबाग में कानपुर जाती बस में बिठा दिया। इस तरह अक्टूबर 1984 की एक शाम नफरती कई साल बाद फिर अपनी जन्मभूमि, कानपुर आ पहुंचा। डी ब्लॉक गोविंद नगर। कानपुर का मिनी पंजाब।
अक्टूबर अपने अंतिम सप्ताह में चल रहा था। जाड़े की तरफ बढ़ते रातों की हवा में एक खुनक थी। भूरी से काली होती मूछों वाले नफरती को कानपुर का यह खुशगवार मौसम बड़ा अच्छा लग रहा था। अच्छा लगने का एक और कारण भी था। उनको एक लड़की से लड़की से मुहब्बत हो गई थी। लड़की का नाम था कमरुन्निसा। घर से थोड़ी दूर रेल लाइन के किनारे उसका परिवार झोपड़ी में रहता था। नफरती अकसर गुजरती ट्रेनों को देखने पटरी के किनारे खड़ा हो जाता था। वहीं झोपड़पट्टी की इस लड़की से उसकी आंखें चार हो गईं।
लेकिन भाग्य का लिखा कौन टाले। जिसकी क़िस्मत में नफरतानंद बनना बदा है वह कमरुन्निसा से मुहब्बत करे या मुमताज़ महल से, शाहजहां कैसे बन सकता है?
तो विधि के विधान से हुआ यह कि 31 अक्टूबर की सुबह इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और उसी शाम नफरती का पुराना मर्ज शॉडेनफ्रायडा फिर उभर आया। वह भी शहर में बहती खून की गंगा में हाथ धोने में जी जान से जुट गया। ऐसा नहीं कि उसे इंदिरा से कोई प्रेम था या कि वह खालिस्तान समर्थक आतंकियों से गुस्सा था। उसे तो बस मजा आता था।
(आज भी तकनीकी दिक्कत के कारण दो हिस्सों में पोस्ट करना पड़ रहा है। बाकी हिस्से को सातवें एपिसोड के नाम से तुरंत पोस्ट कर रहा हूं )
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