कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद(3)
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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)
आंख से खून बहता देख, नफरती खुशी से उछल पड़ा। उसने 'बो काटा' की स्टाइल में 'बो मारा' का जयघोष किया और मौके से भाग निकला। उसे इस बात में कोई इंटरेस्ट नहीं था कि उस लड़के की आंख का क्या होगा। उसे थाना-पुलिस की भी चिंता न थी। चिंता सिर्फ इतनी-सी थी कि बाप बेल्ट से मारेगा अथवा घर में रखी सन सत्तावन की तलवार से।
सो, नफरती बाबू ने वहां से जो दौड़ना शुरू किया तो सीधे कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर ही जाकर रुके। नौ नंबर प्लेटफार्म पर लखनऊ वाली मेमू शायद उन्हीं का इंतजार कर रही थी। वे जैसे ही ट्रेन में बैठे, वह चल दी। करीब ढाई घंटे बाद वे गणेश गंज, लखनऊ में अपने मामा के घर बैठे थे।
कुछ ही देर में मामा ने कानपुर फोन करके सारा किस्सा पता कर लिया। नफरती की मा ने भाई से रिक्वेस्ट की और उन्होंने भांजे को अपनी पनाह में महफूज़ कर लिया: लेकिन गऊ माता की कसम खिलाने के बाद।
गऊ माता की कसम नफरती तोड़ नहीं सकता था। सो, उसके हाथ बंध गए। पर इस अहिंसक जीवन ने उसे बहुत बेचैन कर दिया। सौभाग्य से उसे कुछ ही दिन में सुख का नॉन वेज जरिया टेलीविजन में मिल गया। वह डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक और एनिमल प्लैनेट देखने लगा। जब वह शेरों द्वारा किसी भैंसे को मारा जाना देखता तो उसे ऐसी अनुभूति होती कि मानो वह खुद शेर हो और भैंसे का शरीर फ़ाड़ रहा हो। ध्रुवीय भालू द्वारा सील का शिकार, चीते द्वारा हिरन का शिकार भी उसे बहुत रोमांचित करते थे। लेकिन उसका सबसे प्रिय प्रोग्राम वह था जिसमें मगरों को मिलने वाली विल्डरबीस्टो॑ की सालाना दावत का वीभत्स चित्रण किया जाता है।
दिलचस्प बात यह कि यह सब उस तरुण को अच्छा लगता था जो अंडे भी नहीं खाता था। अंडे भले न खाता था नफरती लेकिन उसे जब भी मौका मिलता, चिकन शॉप के बाहर खड़ा हो जाता और ब्रॉयलर्स को कटता देखता रहता। यही नहीं, गणेश गंज के पीछे लाटूश रोड पर जब एक सड़क दुर्घटना हुई तो रक्तरंजित शरीर को वह बहुत पास जाकर देखता रहा था।
कालांतर में नफरती के सुख बिंदुओं का और विस्तार हुआ। उन्हें रोते हुए बच्चे, भीख मांगते अपाहिज और सड़क से गुजरती अर्थी भी मज़ा देने लगी।
क्या विडंबना है! अर्थी देखकर ही सिद्धार्थ ने दुख को जाना था और वे अंततः बुद्ध बन गए थे। और, यहां अर्थी हमारे नफरती को किक दे रही थी। अर्थी देखने के बाद सिद्धार्थ को चत्वारि आर्य सत्यानि का फॉर्मूला बनाने में बरसों लग गए थे। और, यहां गणेश गंज में नफरती ने अर्थी रूपी दुख को ही सुख की अनुभूति का माध्यम बना लिया था। दुख समुदय, निरोध और मार्ग जैसे चूतियापों की नफरती को जरूरत ही न थी। उसका फॉर्मूला सिंपल था: दुख इज ईक्वल टु सुख। यह शायद बुद्ध के आगे की सोच थी!
समय गुजरता गया। एक दिन नफरती के नाना जी गुजर गए। पूरा ननिहाल शोक में डूब गया। सिवाय नाना के नाती यानी नफरती के। उसे तो जलेबियां खाने का मन हो रहा था। वह तीर की तरह निकला और गली के नुक्कड़ वाले भगत मिष्ठान्न भंडार पर जा पहुंचा।
"हां, बताओ बेटा" मिठाई वाले ने पूछा।
"वो अंकल दो किलो जलेबी दे दीजिए।" नफरती ने कहा,"नाना जी मर गए हैं ना..सो मामा जी ने जलेबी मंगाई है। पैसे वही देंगे।"
हलवाई को बड़ा आश्चर्य हो रहा था। तो भी उसने दो किलो जलेबी नफरती को पकड़ा दीं।
वह जलेबी लेकर चला ही था कि तभी उसके पास आकर एक रिक्शा रुका। रिक्शे में नफरती की अम्मा थीं। रोती और बिलखती। अम्मा कानपुर से चली आ रही थीं। बाप के अंतिम दर्शन करने।
"यहां क्या कर रहा है।" मा ने पूछा।
"अरे कुछ जलेबी लेने आया था। दो किलो हैं। लो मा तुम भी खाओ।"
मा का दिमाग सन्न रह गया। सोचने लगी: कैसा है ये आदमी जो नाना की मौत पर मिठाइयां बांट रहा है! "चंडाल, तू ही जश्न मना नाना के मरने का" इतना कह कर वे रिक्शे वाले से बोलीं,"चलो भइया, बस उस मंदिर के पास ही मेरा घर है।"
बेचारा नफरती समझ ही नही पा रहा था कि अम्मा जलेबियों पर क्यों गुस्सा हो रही थीं।
(नफरती को इलाज़ के लिए मामा ले गए नूर मंजिल: पढ़िए कल)
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