Wednesday, April 23, 2025

गाओ गाना

 न क़द है न काठी लिए हाथ लाठी

उठाए अलम हैं बहकते क़दम हैं

नहीं कुछ भी पल्ले हैं पूरे निठल्ले

गला फाड़कर पर दिखाते हैं कल्ले 

कभी अल्ला बोलें कभी सिया रामा 

वो धोती पहनते वो ऊंचा पजामा 

ये जॉम्बी नहीं हैं ये आदम के बच्चे

कोशिश करो तो बनेंगे ये अच्छे

इन्हें दे दो पोथी इन्हें दे दो रोटी 

बनाओ नहीं इनको चौसर की गोटी

न इनसे ख़ुदाया खुदाई कराओ

नहीं इनको नफ़रत का काढ़ा पिलाओ

चलो फिर से हम एक गांधी को जगाएं

लड़ें सच की खातिर अंधेरा भगाएं

Sunday, April 20, 2025

पटरीआकी मटरीमाकी: 4

   


पटरीआकी मटरीमाकी: 4

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उर्वशी, रंभा, तिलोत्तमा, हूरें

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बलभद्दर ने फिर दौड़कर युवती को रोक लिया। "क्या है?" वह झल्लाते हुए बोली, "तुम्हारा ठेका लिया है क्या कि तुम्हें कांधे पर बिठाकर जन्नत की सैर कराऊं!"


"देवी जी!" बलभद्दर कातर भाव से बोला, "समझिए  न! मैं बिलकुल नया हूं...वापसी का रास्ता भी नहीं मालूम।"


युवती पसीज गई। उसने अपने बैग से एक  लिपस्टिक निकालकर उसे थमा दी। बोली, "जब लौटना हो तो अपने ओंठों पर इसे लगा लेना। मैं आ जाऊंगी... कोई मुसीबत पड़े तो भी लिपस्टिक का उपयोग कर लेना।"


इतना कहकर वह चली गई। थका माँदा बलभद्दर भी एक घने पेड़ के साए तले जाकर लेट गया। लेटते ही उसे नींद आ गई। नींद तब टूटी जब उसको खटाक खटाक की आवाज़ सुनाई दी। उसने आंख खोली तो चेहरे पर झुकी तीन सुंदर स्त्रियां दिखाई दीं। उनके गुलाबी वस्त्रों से भीनी भीनी सुगंध आ रही थी। 


अपने ऊपर झुके परीचेहरों को देख उसका मर्दाना दिमाग सक्रिय हो उठा। मन घोड़े की तरह दौड़ने लगा।  भय जाता रहा। उसे लगा वह युवती झूठ बोल रही थी... स्साली...यहां तो अप्सराएं हैं...मुख चूमने को आतुर...वाह रामकली वाह! थैंक यू... तुमने बैट से ज़रूर मारा लेकिन जीते जी स्वर्ग तो दिखा दिया...थैंक यू वेरी मच...


इसी पौरुषेय चिंतन के साथ वह उठ बैठा और बोला, "देवियो!" आप कौन हैं? उर्वशी, मेनका या रंभा?"


"इनमें से कोई नहीं।" एक स्त्री बोली। उसकी आवाज़ कड़क थी, जो उसके सुंदर चेहरे से बिलकुल मेल नहीं खा रही थी।


"तो फिर आप तिलोत्तमा, घृताची, कुंडा, अलम्बुषा, मिश्रकेशी, विद्युत्पर्णा, रक्षिता में से कोई होंगी!" उसने अन्य अप्सराओं के नाम भी गिना डाले।


"नहीं। हम वो भी नहीं।" दूसरी स्त्री भी उसी रूखे टोन में बोली।


"तो क्या यह स्वर्ग नहीं?"


"नो, यह स्वर्ग भी नहीं।"


"तो क्या यह जन्नत है? मुसलमानों वाला स्वर्ग।"


इस बात तीनों ने एक साथ ठहाका लगाया और अब तक खामोश रही तीसरी स्त्री मधुर स्वर में बोली, "मान लो कि यह जन्नत है। तो?"


"मुझे कोई दिक्कत नहीं कि यह जन्नत है।"


"फिर किसे है दिक्कत?"


"आपको होगी।" बलभद्दर ने सकुचाते हुए कहा।


"हमें? हमें क्या दिक्कत होगी?"


"चलो, मैं समझाता हूं। अगर यह जन्नत है तो आप सब हूरें होंगी। अब हूर तो मुसलमान होती हैं। अब मैं ठहरा बनिया। ओमर बनिया। हिन्दू। आप लोग एक हिन्दू की सोहबत कर पाओगी?" इतना कहकर वह रुका और परीचेहरों को कामनाओं से भरी नज़रों से देखने लगा।


तीनों स्त्रियों के चेहरे में विस्मय था।


"तो आप सोचिए कि क्या एक हिन्दू की सोहबत मंज़ूर है?" उसने बोलना जारी रखा, "मुझे तो कोई दिक्कत नहीं। स्त्री की कोई जाति नहीं होती। मैं बनिया हूं। मेरे लिए क्षत्राणी और ब्राह्मणी वर्जित है। लेकिन नीचे गिरने की कोई सख्त मनाही नहीं।" बलभद्दर ने स्त्रियों को फिर निहारा। वे गुस्से में दिखीं। वह क्षण भर ठिठका और शुरू हो गया, "गुस्सा न हों। मैं इस्लाम कुबूल कर लूंगा। दिलदार या दिलावर बन जाऊंगा। आखिर दिल दा मामला है..."


वह पूरा गाना गाने के मूड में आ गया था लेकिन उससे पहले वह मीठे स्वर वाली स्त्री कड़ककर चीखी, " लगाओ तो ज़रा इस गदहे के चूतड़ों पर दो लातें।"


आदेश के अनुपालन में विलंब नहीं हुआ। उसी के साथ दूसरी स्त्री को दो डंडे जमाने का हुक्म मिला। उसने भी हुक्म पर अमल करने में देर नहीं की।


बलभद्दर दर्द से तड़पकर उठ गया। अब उसने गौर से देखा कि स्त्रियों की गुलाबी ड्रेस तो पुलिस की वर्दी है! एक की वर्दी की आस्तीन में तीन फ़ीते लगे थे और मृदुभाषिणी के कांधे पर लगे थे तीन स्टार। यानी इंस्पेक्टर। तीसरी स्त्री एक स्टार वाली एएसआइ थी।


 इंस्पेक्टर ने फटाफट हथकड़ियां निकालीं और बलभद्दर की कांपती कलाइयों में पहना दीं। पीछे से दीवान ने एक बार पुनः चरण प्रहार किया और धक्का देते हुए बोली, "चल स्साले, भैन के जिज्जा! थाने में तेरी और उर्वशी की सुहागरात मनवाती हूं।"


बलभद्दर की बुद्धि काम नहीं कर रही थी। उसे युवती द्वारा दी गई लिपस्टिक की याद आ रही। मगर वह तो जेब में पड़ी थी और हाथ बंधे थे। वह चुपचाप चलता रहा और तीनों पुलिस वालियों की बातें सुनता रहा...


"यह साला है कौन?" दीवान बोली


"मुझे तो यह स्टड फार्म से भागा हुआ साँड़ लगता है.." एएसआइ ने बुद्धि दौड़ाई।


"मगर यह तो पागल है...बहकी बहकी बातें करता है। स्टड फार्म में तो सर्वोत्तम मर्दों को ही रखा जाता है। गर्भ में ही भ्रूण की जांच कर ली जाती है कि बच्चे की लंबाई चौड़ाई और आइक्यू कैसा होगा। आइंस्टाइन से नीचे तो चलता ही नहीं। ब्रेन की भी जांच होती है कि बच्चा बड़ा होकर पागल तो नहीं हो जाएगा..."


"बात तो सही है। हम लोग तो कमज़ोर पुरुष-भ्रूण को पेट में ही नष्ट कर देते हैं ताकि मुल्क में एक भी घटिया मर्द दिखाई ही न दे।"


"है तो यह स्टड फार्म का भगोड़ा ही...लेकिन एक मिनट...ज़रा सोचने दो...मुझे अभी अभी लगा कि शायद यह कई दिन का भूखा हो....इसीलिए पागलपन की बातें कर रहा हो!"


वार्तालाप में सुन रहे बलभद्दर की पीठ पर सहसा ज़ोर की धौल पड़ी। दीवान ने पूछा, "क्यों बे अपनी अम्मा के दूल्हे, तूने खाना कब से नहीं खाया?"


बलभद्दर सचमुच भूखा था। उसकी आंखों में आंसू आ गए। भर्राए गले से बोला, "बहन जी, 36 घंटे हो गए। पब में थोड़ा सा चखना खाया था बस। कल सुबह घर से खाली पेट चला था। रामकली ने कुछ बनाया ही नहीं था।" रामकली का नाम लेते ही वह सुबकने लगा। 


यह सुनकर तीनों पुलिस वालियों ने राहत की सांस ली। वे हंसने लगीं।  "वाउ, वी हैव सॉल्व्ड द पज़ल, येSS।" इंस्पेक्टर खुशी से चहक पड़ी, "चलो, पहले इसे खाना खिलाते हैं। मेरा टिफिन जीप में ही रखा है।"


कुछ देर चलने के बाद वे पार्क से बाहर सड़क पर आ गए। जीप वहीं खड़ी थी। टिफिन निकला और उसे बलभद्दर के आगे रख दिया गया। मगर उसके हाथ बंधे थे। वह पुलिस वालियों को बिसूरने लगा। एएसआइ ने हथकड़ी खोलने का प्रयास किया। मगर इंस्पेक्टर ने रोक दिया, "यह भाग सकता है।"


"तो?" 


"इसे मैं खिला दूंगी।" इतना कहकर वह हाथ से कौर बनाकर कैदी को खिलाने भी लगी।


इस सुर दुर्लभ दृश्य को देख दोनों पुलिस वालियां ताली बजाकर नाचने लगीं। देवताओं ने पुष्पवर्षा भी की होगी लेकिन बलभद्दर देख नहीं पाया। उसकी आंख से भल्ल भल्ल आंसू गिर रहे थे। एक परीचेहरा उसे अपने हाथ से लुकमे तोड़कर खिला रहा था। जन्नत भी कैसी कैसी होती हैं..वह सोच रहा था।


खिला पिला कर बलभद्दर को जीप में डाल दिया गया। स्टीयरिंग व्हील पर  दीवान जा बैठी। गियर डालते हुए उसने इंस्पेक्टर से पूछा, "तो मैडम स्टड फार्म चलें? इस साँड़ को जमा भी तो करना है।"


"नो, इसे थाने ले चल। स्टड फार्म में सुबह जमा करेंगे। रात में थाने में इसका कैबरे देखेंगे।" इंस्पेक्टर की बात सुनते ही कांस्टेबल और सब इंस्पेक्टर ने किलकारी भरी। जीप रात की सूनी सड़क पर सरपट दौड़ चली। बलभद्दर के बंधे हाथों ने सहसा दोनों पावों के संधिस्थल को ढक लिया।

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अगली किस्त: मर्द का चीरहरण

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Saturday, April 19, 2025

पटरीआकी मटरीमाकी: 3

 पटरीआकी मटरीमाकी: 3

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बलभद्दर इन वंडरलैंड

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सुरंग अंततः एक विशाल बगीचे में जाकर खुली। वहां सुबह हो रही थी। बड़े बड़े दरख़्त हवा के मद्धम झोंकों में झूम रहे थे। हवा में इत्र सा घुला हुआ था। 

कुछ बूढ़ी और अधेड़ औरतें शरीर को तंदुरुस्त बनाए रखने के उपक्रम में जुटी थीं। कोई जॉग कर रही थी तो कोई ब्रिस्क वॉक तो कोई योगा। लेकिन मर्द एक भी नहीं । बलभद्दर को आश्चर्य हुआ।


वह अब थका हुआ महसूस कर रहा था। नींद भी आ रही थी। एक बोतल दारू और रात भर का जागरण अब भारी हो रहा था। वह बहुत धीमे धीमे चल प रहा था। लेकिन पब से उसके साथ आई युवती आगे निकल गई थी। उसने आवाज़ लगाई, "ज़रा सुनो, देवी जी..मैं चल नहीं पा रहा...ज़रा रुको तो"


आवाज़ सुनकर युवती ने पीछे मुड़कर देखा। मुस्कराई। फिर खिलखिलाई। मगर रुकी नहीं। उलटे रफ़्तार बढ़ा दी। 


बलभद्दर को उसे दौड़ कर रोकना पड़ा। हांफ़ते हांफ़ते बोला, "देवी जी, यहां तक लाई हो.... साथ तो न छोड़ो।"


"न बाबू न। हमारा साथ यहीं तक था। मुझसे तो रामकली ने कहा था सो मैं यहां तक ले आई।"


"रामकली ने?" वह कांप उठा। 


"हंजी, तुम्हारी अपनी रामकली ने।" वह रहस्यमय ढंग से मुस्कुराई।


"क्या कहा था?"


"कहा था कि मेरे बल्लू को जन्नत में छोड़ देना। बस छोड़ने को कहा था। न कि सैर कराने को।" इतना कहकर वह आगे चल दी।


बलभद्दर ने हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया। "यह जन्नत है?....क्या मैं मर चुका हूं!" उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। 


"नहीं, तुम अभी मरे नहीं हो।" वह मुस्कुराई, "मर्द अभी मरे नहीं हैं। मर ज़रूर रहे हैं। तिल तिल कर। जब तुम्हारी बच्ची गर्भ में मार दी जाती है, तुम थोड़ा सा मर जाते हो। जब तुम अपनी बहू को जलाते हो तब भी थोड़ा सा मर जाते हो। जब तुम किसी का बलात्कार करते हो, तब भी मर जाते हो।" 


"मगर मैंने तो ऐसा कभी नहीं किया..." वह बिसूरते हुए बोला।


"क्षुद्र बुद्धि बलभद्दर! तूने न किया होगा, मगर है तो मर्द ही। सब तेरी जानकारी में तो होता है। अब भुगतना तो पड़ेगा ही।"


"ठीक है, भुगत लूंगा..." शीतल, सुगंधित पवन झकोरों ने उसे कुछ चैतन्य कर दिया था। उसे अच्छा महसूस हो रहा था। कामनाएं जागने लगी थीं। उसने चारों ओर नज़र दौड़ाईं और बोला, "इस जन्नत में लैवेंडर, हिना, संदल, बेला आदि तो खूब ग़मक रहा है लेकिन इन खुशबुओं को लगाने वाली कहां हैं?"


"क्यों, हैं तो ये जॉगिंग, वॉकिंग करती महिलाएं। इन्हीं का पसीना ही तो महक रहा है।"


"तुम औरतें मर्द का मन नहीं समझतीं। बताओ तुम कहती हो यह जन्नत है। जन्नत ऐसी होती है?"


"फिर कैसी होती है?"


"जन्नत बूढ़ी औरतों से नहीं बनती।"


"फिर किससे बनती है? तुम लोग तो बूढ़ी मां के कदमों में जन्नत पा लेते हो!"


"देखो देवी जी, बात को घुमाओ नहीं। जन्नत यानी स्वर्ग में हूरें होती हैं। कुंवारी। अप्सराएं होती हैं। वो क्या नाम हैं रंभा, उर्वशी, मेनका...भले ही मैं बुद्धू लगता होऊं लेकिन दीनधर्म के प्रवचन खूब सुने हैं।"


बलभद्दर की बात सुन युवती ठहाका मार कर हंस पड़ी। देर तक हंसती रही। फिर बोली, "इस जन्नत में  कुंवारी हूरें नहीं, छोरे मिलते हैं। वह भी घंटों के रेट से। सरकार देती है किराए पर।" वह फिर हंसने लगी।


"हद है! कितना पापमय है यह स्वर्ग!! आदमी को कोठे पर बिठा दिया!!!"


"कोठे पर नहीं, स्टड फार्म में।"


"यह क्या होता है?" बलभद्दर ने यह शब्द ही नहीं सुना था


"हॉर्स ब्रीडिंग सुना है?"


"गुड। इस स्टड फार्म में उन्नत नस्ल की स्त्रियां और पुरुष ब्रीड किए जाते हैं। थॉरो ब्रेड।"


"यह कैसी जन्नत है?...जहां आदमी को पेशा करना पड़ता हो।"


"यह वो जन्नत नहीं, जो मरने के बाद मिलती है। यह 500 साल बाद वाली भविष्य की दुनिया है जहां मैं तुमको ले आई हूं। उस दुनिया में आज की तारीख है 19 अप्रैल 2025 और आज यहां की तारीख है 19 अप्रैल 2525...इसी भविष्य की दुनिया को हम औरतें जन्नत कहती हैं।"


इतना कह कर युवती फिर भाग पड़ी। बलभद्दर पीछे दौड़ पड़ा।

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अगली किस्त में हम वर्ष 2525 की दुनिया को एक्सप्लोर करेंगे। तब तक आप स्टड फार्म के जीवन की कल्पना करें। न कर पाएं तो गूगल करें 😊 


Diane translation

 

I loved your Allegiance poem. I translated it into English in my free way, taking liberties. Then I translated it back into English via AI tool GROK. Have a look and tell me if I can post it under your name.



Today, I declare
to my husband,
my 80-year-old husband,
my complete devotion, my fidelity.

He is the gardener of the orchard,
whose words
make tulip flowers bloom,
whose touch
sprouts seeds into life,
and makes buds blossom.

Clusters of vibrant tomatoes
adorn the branches,
hyacinths begin to bloom and spread fragrance,
and when the cool breeze flows,
alyssum and zinnia flowers
scatter color and scent through the air.

My heart brims with joy,
swells with respect,
seeing this gardener’s stubborn love
for the earth.

Today, I proclaim,
I love you,
my gardener,
I love you 100 percent.

आज मैं अपने पति के प्रति
अपने 80 साल के पति के प्रति
संपूर्ण निष्ठा की, वफ़ा की
घोषणा करती हूं
जो बगिया का माली है
जिसके शब्दों से
झरते हैं ट्यूलिप के फूल
जिसकी छुअन से बीज
अंकुरित हो उठते हैं
और खिल जाती हैं कलियां
सज उठते हैं डालियों पर
सुर्ख टमाटरों के गुच्छे
गुल खिलाने महकाने लगते हैं
हायसिंथ
जब शीतल पवन को पीकर
ऐलिसन और ज़िनिया के फूल
वातावरण में बिखरा देते हैं
रंग और खुशबू
मेरा मन पुलक से भर उठता है
सम्मान से भर उठता है
धरती के साथ
इस माली का प्यार देखकर
आज मैं घोषणा करती हु
आय लव यू
मेरे माली
लव यू 100 पर सेंट

Wednesday, April 16, 2025

पटरीआकी पटरीमाकी:2

 पटरीआकी पटरीमाकी:2

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बलभद्दर को दारू में मिला सुकून

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शक्तिस्वरूपा रामकली का हाथों प्रसाद पाने के बाद बलभद्दर का जीवन बदल गया। रूखासूखा जो कुछ मिलता, उसे ठंडा पानी पीकर पचा लेता। चुपड़ी रोटी वह सपने में खाता। 


उधर रामकली अब मातृशक्ति संस्थान के ऑफिस में अब और ज़्यादा जाने लगी। लौटती तो उसके हाथ में पुस्तकें होतीं। एक दिन बलभद्दर ने किताबों की गड्डी का जायज़ा लिया। उसने किसी किताब या लेखक का नाम नहीं सुना था। एक किताब थी मित्रो मरजानी। पहला पन्ना खोलकर वह उसे घूरता रहा। फिर दूसरी किताब थी अल्मा कबूतरी। उसने उसे भी रख दिया। चित्तकोबारा भी उसने देख कर बंद कर दी। कुछ विदेशी लेखकों के अनुवाद भी रखे थे। जैसे जर्मेन ग्रीअर और सिमोन द बुव्वार। अगली किताब थी इस्मत चुग़ताई की कहानियों की। खोलते ही उसे लिहाफ़ दिखी। दो लाइन पढ़ी तो वह पढ़ता ही चला गया। 


कहानी में मज़ा तो आया लेकिन खत्म होते होते उसका माथा ठनक गया...तो मेरी रमकलिया अब बरबाद हो गई है! जो पढ़ती है वही करती होगी वहां मातृशक्ति वालों के यहां !! राम राम राम...साली छिना...!!! 


बलभद्दर बनिए के अंदर सहसा जन्म से सोया पड़ा क्षत्रियत्व जाग उठा। उसने माचिस उठा ली। तीली भी जला ली लेकिन इसके पहले कि वह किताबों में लौ छुआ पाता, उसे हाथ में बैट लिए खड़ी देवी रामकली का स्मरण हो आया। और उसका क्षत्रियत्व दलित की तरह कांपने लगा। 

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क्षत्रियत्व और दलितत्व की अनुभूतियों के बीच फंसे बलभद्दर को कुछ सूझ नहीं रहा था। वह रोने लगा। नौ बज चुके थे और उसकी प्राणप्यासी मातृशक्ति क्लब से लौटी नहीं थीं। बच्चे सो रहे थे। कुछ देर रोने के बाद वह घर से बाहर निकल गया। 


निरुद्देश्य चलता रहा देर तक। मॉल रोड आ गया। सहसा कोई किसी दुकान से बाहर निकला और लड़खड़ाकर उससे टकरा गया। दोनों फुटपाथ पर गिरे। टकराने वाले के मुंह से शराब की महक आ रही थी। बलभद्दर उठा तो टकराने वाला सॉरी सॉरी बोलकर गले से लिपट गया। "सॉरी ब्रो, आयम वेरी हैपी। आज बहुत खुश हूं। जाओ तुम भी हैपी हो जाओ।" 


इतना कहकर उसने पर्स से पांच पांच सौ के पांच नोट निकाले और बलभद्दर की जेब में ठूंस कर अपनी कार में बैठकर फुर्र हो गया। 


उदास बलभद्दर भी हैपी ही होना चाहता था। उसने दुकान देखी। बड़े बड़े हरूफ़ में PUB लिखा था। वह अंदर घुस गया। दो पेग उतारने के बाद वह भी हैपी महसूस करने लगा और घर चल दिया। घर के अंदर भी उसे हैपीनेस मिली। थाली में कढ़ाई पनीर और लच्छा पराठे मिले। पत्नी मुस्कुराती रही। भोजन के बाद वह गले से भी लिपटी। फिर मुंह सूंघते हुए बोली, "तो पीकर आ रहे हैं मेरे बल्लू बालम!...थोड़ी मेरे लिए भी ले आते।"


"तो तुम भी पीती हो?" बलभद्दर परेशान हो उठा।


"एक आध बार पी है। वो जैस्मीन कॉन्ट्रैक्टर है न मातृशक्ति की सेकेट्री। वही ले आती है कभी कभी। तब एक पेग मैं भी ले लेती हूं।" 


"क्यों पीती हो तुम लोग...पता नहीं दारू हराम होती है!" बलभद्दर ने कहा।


"कुछ हराम नहीं होती। मेरी प्रेसिडेंट तो कहती है कि मर्द को रास्ते पर लाना है तो वह सब करना पड़ेगा जो मर्द करता है।"


"और क्या क्या खाती पीती हो?" पति पतनोन्मुख पत्नी के लिए परेशान हो उठा।


"दो तीन जन सिगरेट पीती हैं। और हां, एक ज़रीन खान है। वह ख़ास सिगरेट पीती है।  ज्वाइंट है उसका नाम। उसके अंदर कुछ भरा रहता है जिसे वह माल कहती है..लेकिन मैं वो सब नहीं लेती। बस दारू। कभी कभी। एक या दो। बस।"


बलभद्दर हक्का बक्का सा उसे देख रहा था। दूसरी ओर रामकली को उस पर पता नहीं क्यों प्यार आ रहा था। गाल सहलाते हुए बोली, "अरे मेरे बल्लू, अभी तूने कुछ नहीं देखा। अभी तो औरतों का राज आएगा। आदमी कुत्ते की तरह दुम हिलाएगा। मैं जो चाहूंगी करूंगी। चाहूंगी तो प्यार करूंगी और जब चाहूंगी 

सर पर बैट चलाऊंगी। चल आज तुझे प्यार करती हूं।"


इतना कहकर वह बल्लू मियां को हाथ से खींचते धकियाते बेडरूम ले गई। बलभद्दर का नशा काफ़ूर हो चुका था। वह चुपचाप मुंह फेरकर लेट गया। रामकली ने कुछ देर इंतजार किया फिर कान में ख़ुसफुसाई, "बैट निकालूं क्या।"

बलभद्दर ने मुंह उसकी ओर कर दिया। बैट के आगे वह बेबस था। उसके शरीर का अतिक्रमण होता रहा। रात भर। वह रोता रहा। रात भर। 

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इसके बाद तो बलभद्दर रोज़ पब जाने लगा। दो पेग से चार और चार से अद्धी बोतल हुई और फिर पूरी बोतल पीने लगा। एक रात जब वह पूरी बोतल गटक कर ग़ाफ़िल हो चुका था तो उसने एक अजब सा मंज़र देखा। एक सुंदर सी युवती उसके बगल से निकली और दूसरे छोर पर लगे एक आदमकद शीशे के आगे जा खड़ी हुई। उसने पलट कर बलभद्दर की ओर देखा और उंगली के इशारे से पास बुलाने लगी। 


नशे के बावजूद वह उसके पास जाने की हिम्मत न जुटा सका। उसे हर स्त्री के हाथ में बैट नज़र आने लगा था। तिस पर उसे छठी क्लास में रटा श्लोक भी याद आ गया: मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्। 


युवती ने एक बार फिर उसे घूरा और पैर पटकते हुए वह उस आदमकद मिरर में घुस गई! समा गई!!


बलभद्दर को काटो तो खून नहीं। यह कैसे संभव है? कोई शीशे के अंदर कैसे घुस सकता है। वह थोड़ी देर सोचता रहा। फिर उसे एलिस इन वंडरलैंड फिल्म याद आ गई। उसमें एक खरगोश ऐसे ही एक शीशे को पार कर विचित्र दुनिया में पहुंच जाता है।


कुछ सोचते हुए वह डगमगाते कदमों से मिरर के पास चला गया। कुछ देर अपना चेहरा देखता रहा। फिर अचानक वह भी मिरर में घुस गया। बड़े ज़ोर का धमाका हुआ और अगले ही पल वह एक अंधेरी सुरंग में था।


वह डर गया और ज़ोर से चिल्लाया, "अरे कोई है!"


"डरो नहीं" एक नारी स्वर गूंजा। "मैं हूं। पहले मेरे बुलाने पर क्यों नहीं आए थे... ख़ैर तुम आगे बढ़ते आओ। मैं इंतज़ार कर रही हूं।"


थोड़ी ही देर में बलभद्दर उस युवती से जा टकराया। वह बड़े ज़ोर से हंसी और बोली, डरो मत। कुछ ही कदमों में उजाला मिल जाएगा और मैं पहुंच जाऊंगी जन्नत में। मैं तो अक्सर यहां आती हूं। मर्दों के बनाए नरक से जब ऊब जाती हूं। मैं यहां जन्नत में चली आती हूं।"


"कैसी जन्नत?" बल्लू ने खुद को युवती से दूर करते हुए पूछा।


"औरतों की जन्नत। जहां रंभा, मेनका आदि हूरें नहीं, सुंदर सुंदर फरिश्ते नाचते हैं।" इतना कहकर उसने बलभद्दर का हाथ पकड़ा और उसे खींचते हुए आगे बढ़ चली। बलभद्दर को सुरंग के पार उजाला दिखने लगा था।

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अगली किस्त: बलभद्दर इन वंडरलैंड

Tuesday, April 15, 2025

पटरीआकी-पटरीमाकी

 पटरीआकी-पटरीमाकी 

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बलभद्दर कई दिनों से अपनी रामकली से नाराज़ चल रहे थे। नयागंज में अपनी किराने की दुकान बढ़ा कर रात नौ बजे जब घर पहुंचते तो उनका स्वागत बड़ी बेरुखी से होता। 15 साल पुरानी पत्नी न तो मुस्कुराती, न ही यह पूछती कि दिन कैसा रहा। वे हाथ पांव धोकर आते तो चौके में पाटा पड़ा मिलता। सामने थाली रखी होती। कभी कद्दू की सब्जी मिलती तो कभी तोरी या टिंडे की। रोटियां भी चूल्हे से नहीं, कटोरदान से निकलतीं। तीन घंटे पहले बनी हुई।


खाने के बाद हाथ पोछने के लिए गमछा भी नहीं मिलता। वे अपनी धोती के सिरे से ही हाथ मुंह पोछते और बिस्तर पर जाकर लेट जाते। बच्चे पहले ही सो चुके होते। रामकली भी हाथ में कोई किताब लेकर आती। मुंह घुमाकर लेटती और बेडलाइट जलाकर किताब पढ़ने लगती। 


उधर, बलभद्दर को किताबों से नफरत थी। वे मानते थे कि किताबें पढ़ने से औरत आवारा हो जाती है। उनके लिए रामचरित मानस औरत के लिए अंतिम किताब थी। हालांकि उन्होंने खुद कभी मानस का पाठ नहीं किया था। उनकी भावनाओं को रामकली जानती थी। इसीलिए 14 साल तक उसने भावनाओं का सम्मान किया। फिर उसने सम्मान बंद कर दिया। इन दिनों शाम के वक्त वह पड़ोस में खुले मातृशक्ति नामके एक संस्थान से भी जुड़ गई थी, जहां औरत को पितृसत्ता के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी जाती थी। कभी कभी संस्थान में भाषण देने के लिए ऐसी नेत्रियां भी आती थीं जो अंग्रेजी में भाषण देती थीं। उनके भाषणों में पैट्रीआर्की और मैट्रीआर्की शब्दों का बार बार इस्तेमाल होता था। 


दोनों शब्द सुनकर रामकली को गुदगुदी सी होने लगती थी। वे उसको रट गए थे। घर में बर्तन मांजते या आटा गूंथते हुए वह उन्हें गाने की तरह गुनगुनाया करती: पटरीआकी मटरीआकी। गुनगुनाते गुनगुनाते यह मटरीआकी कब मटरीमाकी बन गया, वह जान ही नहीं पाई। जब जान पाई तो उसे बड़े जोर की हंसी आई। उसे इसमें मर्दाना गाली ध्वनित होती प्रतीत हुई: पटरीआकी मटरीमाकी। इसकी मां...उसकी मां...। अब तो यह हो गया था कि जब कभी उसके अंदर क्रोध उमड़ता, वह पटरीआकी मटरीमाकी गाकर खुद को शांत कर लेती।

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उस रात जब बलभद्दर धनिया मिर्चा बेचकर घर लौटे तो उन्हें बहुत देर तक कॉल बेल दबानी पड़ी। आखिर में दरवाज़ा खुला तो रामकली के हाथ में वनिता थी और वह मुस्कुरा रही थी। बलभद्दर अरसे बाद उसका मुस्कुराता चेहरा देख रहा था। उसको बड़ा भला लगा। खुश होकर बोला, "बहुत खुश हो आज। कोई खास बात?" 


"अरे कुछ नहीं" वह बोली, "बस इस कहानी को पढ़कर हंसी आ गई।"


"क्या है कहानी में...ज़रा हम भी हंस लें"


"यह तुम्हारे हंसने लायक नहीं" रामकली हंसने लगी।


"बता भी दो अब.."


"तो सुनो, इस कहानी में एक आदिवासी औरत अपने पति का सर काट डालती है और कटे सर को लेकर थाने पहुंच जाती है।"


"तो इसमें हंसने वाली क्या बात है?"


"हंसी इस बात पर आई कि महिला जब सर लेकर अपना जुर्म कबूल करने थाने पहुंची तो दारोगा जी थर थर कांपने लगे।" रामकली फिर हंसने लगी।


बलभद्दर को कुछ समझ में नहीं आया क्योंकि नीला ड्रम तब तक अस्तित्व में नहीं आया था। वह हाथपैर धोकर पाटे पर बैठ गया। 


"अरे, तुम पाटे पर बैठ गए! सोरी सोरी" रामकली मैगज़ीन को किनारे रख कर खेद जताते हुए बोली, " आज तो अभी तक खाना ही नहीं बना। बच्चे एक बर्थडे पार्टी से खा आए थे। मैंने भी सामने चाट वाले से टिकिया ले ली थी.."


"तो मैं क्या खाऊं?"


"अभी लाती हूं। ब्रेड खाओगे?"


"सूखी ब्रेड?"


"कहो तो मक्खन लगा दूं?" रामकली ने स्निग्ध स्वर में कहा,  " सूखी ब्रेड न खाना चाहो तो चोखा देती हूं। आलू का। उबले रखे हैं। खूब जीरा, हींग, चाटमसाला डाल दूंगी। खूब मिर्ची वाला। जैसा तुमको पसंद है।"


बलभद्दर ने चोखा का चुनाव किया और दो मिनट में उसके सामने प्लेट सज गई। उसने ब्रेड में ढेर सारा चोखा समेट कर एक बड़ा सा कौर बनाया और मुंह के सुपुर्द कर दिया।


अगले ही पल उनका मुंह जल उठा। वे चोखे में गलती से अनकटी समूची मिर्च चबा बैठे थे। उन्होंने गुस्से में प्लेट पटक दी। रामकली दौड़ कर कांसे के लोटे में पानी लाई। बलभद्दर ने पानी पिया लेकिन जलन कम न हुई। गुस्सा और भड़क गया। उन्होंने आव देखा न ताव और रामकली के सर का निशाना लेकर लोटे को बम की तरह चला दिया। 


रामकली ने झुककर अपना सर बचा लिया। क्षण भर को उसने अपने धरम पति को जलती हुई नजरों से देखा और बिना कुछ बोले बड़े पुत्र के कमरे में चली गई। उधर पति देव भी मुंह में घी मलकर बिस्तर पर जा लेटे। नींद तब खुली जब उनके सर पर भीषण प्रहार हुआ। उन्होंने दर्द से बिलबिलाते हुए आँखें खोलीं तो उनके सामने रामकली खड़ी थी। उसके हाथ में बेटे का बैट था। बलभद्दर ने भागने की कोशिश की तो रामकली ने दोहत्था बैट घुटने पर दे मारा।

इसके बाद वे भागने के लायक नहीं बचे। उन्होंने खुद को रामकली की भलमनसाहत के हवाले कर दिया। बैट की मार बंद नहीं हुई। बस प्रहार हल्का हो गया। रामकली प्रहार करती जाती और हर प्रहार के साथ चिल्लाती, "साले, औरत पर हाथ उठाता है...अभी तेरी पटरीआकी-पटरीमाकी निकालती हूं।" 


पटरीमाकी शब्द तो उन्हें मां की गाली जैसा कुछ लगा लेकिन पटरीआकी में वे अटक गए। दसवीं तक की अपनी पढ़ाई में उन्होंने यह शब्द नहीं सुना था। बलभद्दर कराहते रहे और पटरीआकी-पटरीमाकी के बारे में सोचते रहे। दसवीं फेल आदमी ने पैट्रीआर्की शब्द कभी सुना न था।

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रामकली अंततः थक कर चली गई। बलभद्दर रात भर कराहते रहे और सुखद अतीत को याद करते रहे।...15 साल पहले की बातें।

...15 साल पहले उनकी शादी हुई थी। बला की ख़ूबसूरत थी रामकली। बलभद्दर देखते ही न्योछावर हो गया था। बड़ी बड़ी शरबती आंखें। गोरा रंग। अंडाकार चेहरा। छरहरी काया। और, बेहद फुर्तीली। वह उसे हेमा मालिनी कहा करता था। सुनकर वह लजा जाया करती थी। 


रामकली ने ससुराल आते ही पूरा घर संभाल लिया। 

सुबह पांच बजे उठती। झाड़ू-बुहारा-पोंछे के बाद स्नान। फिर पूजा। पूजा के बाद सास ससुर को चाय। चाय के बाद वह देवर के लिए नाश्ता और टिफिन बनाने में लग जाती, जो  गनफैक्ट्री में फिटर था। उसे सात बजे से पहले निकलना होता था। 


उसने खुद चाय नहीं पी होती थी अब तक। अभी नौवीं में पढ़ने वाले 15 साल के छोटे देवर के लिए नाश्ता और टिफिन तैयार करना होता था। उसे विदा कर वह दो कप चाय बनाती। एक अपने लिए और एक अपने उनके लिए। 


चाय लेकर बेडरूम जाती तो बलभद्दर चाय तो बाद में पीता, पहले रामकली को पलंग में खींच लेता। चाय ठंडी होती रहती और सांसें गरम। कई बार इन्हीं लम्हों के बीच ससुर जी की पुकार सुनाई देती: बहू, एक कप चाय और मिल जाएगी क्या। सुबह वाली ज़रा फ़ीक़ी थी। इस बार दालचीनी, लौंग, इलायची, जायफल और इलायची भी डाल देना।" 


वह पति को धक्का देकर चाय बनाने को भागती। पीछे से बलभद्दर हंसता, "खुद को भी कूटकर चाय में डाल देना। पता नहीं बापू को चाय की कितनी प्यास है! बेटे की भूख प्यास की सोचते ही नहीं।"


रामकली मशीन बन गई थी। चाय के बाद पूरे घर के लिए भोजन। भोजन के बाद घर भर के कपड़ों की धुलाई, आयरन। शाम ढलती तो फिर चाय की बारी। चाय के बाद फिर भोजन। भोजन के बाद सासू के पांव दबाने का दायित्व। फिर पति का दायित्व, जो बेडरूम में उसकी बाट जोहता रहता था। 


वह हंस कर सारे दायित्व निभाती गईं। सब उसकी तारीफ करते। पड़ोसी और नाते रिश्तेदार सब कहते: बहू हो तो रामकली जैसी। प्रशंसा उसे ऊर्जा देती और वह बैल की मानिंद घर के कोल्हू में घूमती गई। हालांकि वह बैल नहीं थी। पति हाइस्कूल फेल था तो वह भी इंटर फेल थी। किताबें और पत्रिकाएं पढ़ने का शौक था उसे। उस घर में लेकिन न तो किताबें थीं और न ही समय।

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समय बीतता गया। सास ससुर गुजर गए। देवरों ने अलग घर बसा लिए। लेकिन रामकली की मजदूरी के घंटे कम न हुए। वह उदास रहने लगी। रात में बिस्तर पर आते आते उसे कभी सर में तो कभी कमर में दर्द रहने लगा। पति नाराज़ रहने लगा। धीमे धीमे दोनों के बीच प्रेम में कमी आने लगी। तो भी उसने घर को चलाने में कोई कोताही न आने दी। फर्श और बर्तन चमकते रहते। सुस्वादु भोजन बनता रहा। अलबत्ता पति को अब कभी दाल में नमक कम या ज्यादा लगने लगा था। लेकिन थाली फेंकने की नौबत अब तक न आई थी।

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यही सब सोचते बलभद्दर जी की सुबह हुई। उम्मीद के विपरीत रामकली हल्दी वाला दूध लेकर आई। फिर दोपहर में उन्हें मातृशक्ति संस्था से जुड़ी एक डॉक्टरनी के पास ले गई। डॉक्टरनी को पूरा केस समझाया। उसने मरहम पट्टी की। उसने बलभद्दर को बताया कि रामकली रोज़ शाम उनकी संस्था मातृशक्ति में सत्संग करने आती है। औरतों को हमीं  सिखाते हैं कि ईंट का जवाब पत्थर से दो। इसीलिए तुम्हें तुम्हारे लोटे का जवाब बैट से मिला। अब गलती न करना। विदा देते हुए उसने सर पर हाथ फेरा। इस मातृभाव से बलभद्दर द्रवित हो उठा। उसकी आंख में आंसू और दिल में थोड़ी सी हिम्मत आ गई। बोला, "थैंक यू डाक्टर साहब। एक सवाल मुझे मथ रहा है। आप मुझे बस पटरीआकी-पटरीमाकी का मतलब बता दीजिए।" डॉक्टर ठहाका मारकर बोली, अब जाओ। अपनी बीवी से पूछ लेना।

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एक हफ्ते बाद थोड़ा चलने लायक होने पर बलभद्दर बाबू जब नयागंज स्थित अपनी किराने की दुकान पर जब बैठे तब भी उनके दिमाग में वही शब्द,  पटरीआकी-पटरीमाकी गूंज रहे थे।  सो, दुकान पर जैसे ही एक प्रोफेसर साहब गरम मसाला बंधवाने आए तो उन्होंने जायफल, जावित्री और दालचीनी आदि तोलते हुए पूछ ही लिया, "परफोसर साहब, ये  पटरीआकी-पटरीमाकी क्या होता है? आजकल की मेहरियां ये लफ़ज़ बहुत बोलती हैं।"


"तुमने कहां सुना भाई?" प्रोफेसर ने पूछा।


मर्द की ज़ात बलभद्दर से जवाब देते न बना।


"बोलते क्यों नहीं?" प्रोफेसर साहब ने पूछा।


"कुछ नहीं साहब" बलभद्दर मुंह घुमा कर कालीमिर्च निकालते हुए बोला, "वो मेरे पड़ोस में एक औरतिया है। अपने पति को आए दिन पीटती है। और जब पीटती है तो पटरीआकी-पटरीमाकी चिल्लाती रहती है। मुझको तो कोई गाली टाइप बात मालूम होती है..." 


प्रोफेसर साहब कुछ नहीं बोले। बस लाल मिर्च की बोरी को घूरते रहे और मसाला बंधवाने के बाद चुपचाप चले गए। बलभद्दर ने देखा, प्रोफेसर साहब लंगड़ा कर चल रहे थे।

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कहानी जारी है मगर अगली किस्त में क्या होगा, वह मुझे खुद नहीं मालूम। रात भर सोचने दें।

 

Sunday, April 13, 2025

नफ़रतानंद 7

 कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद (7)

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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)


कुछ दिन बाद 'खून का बदला खून से लेंगे' जैसे नारे बंद हो गए। एक दिन नफरती पार्क में अन्यमनस्क भाव से बैठा था। तभी एक बूढ़ा उसके बगल में आ बैठा। स्वभाव के मुताबिक नफरती ने आंखे तरेरीं। बुड्ढा मुस्कराया, "तुम्हारा यही अंदाज़ तो मुझे तुम्हारे पास खींच लाया है।"

"कैसा अंदाज़, बुड्ढे...क्या बक रहा है तू..फटाफट इड़ीदुड़ीतिड़ी हो जा..पंगा मत लेना.. तू मुझे जानता नहीं..काट डालता हूं काट।" 


"तुम्हें जानने के बाद ही तो तुम्हारे पास आया हूं। मैंने पिछले दिनों तुम्हारा हस्तकौशल देखा है। पुलिस में भी तुम्हारी चर्चा है" बूढ़े ने एक बार फिर मुस्करा कर कहा, "तुम्हारे पास बड़ी ऊर्जा है। मैं चाहता हूं तुम इसे राष्ट्रहित में लगाओ। भारत माता की सेवा में लगाओ।"

"मैं तो गऊ माता की सेवा में लगा रहता हूं" नफरती ने कहा, "दो दो माताओं की सेवा कैसे करूंगा?"

"वाह!" बुड्ढा खुशी से उछल पड़ा, "गऊ माता की सेवा करते हो..फिर तो सोने में सुहागा। गऊ माता और भारत माता की सेवा में कोई फर्क नहीं है। बस तुम हमारे साथ आ जाओ।"


"बुढ़ऊ" नफरती उकता कर बोला, "अब हिन ते तुम कटि लेव, नहीं तौ हेइँ फोड डरिबे।" ठेठ कनपुरिया स्लैंग में हड़का कर नफरती रेल पटरी की तरफ चल दिया। उसे कमरुन्निसा की याद आ रही थी।


(कमरुन्निसा ने भगा दिया नफरती को: पढ़ें कल)

नफ़रतानंद 6

 कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद (6)

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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)


नूर मंजिल की दवाओं ने नफरती को स्वस्थ कर दिया। वह स्कूल जाने लगा। स्कूल में उसने कोई बड़ा कांड नहीं किया। बस कभी कभार मारपीट कर लिया करता था। इसी से उसका मन भर जाता। 


समय बीतता गया। नफरती हाईस्कूल में पहुंच गया। बस पहुंच गया। उसे लांघ नहीं पाया। सो, जब दूसरे साल भी वह फेल हो गया तो मामा जी ने उसे वापस अपनी बहन के पास वापस कानपुर भेजने का फैसला कर लिया। वहां अब कोई खतरा भी नहीं थी। तीर से काने हुए लड़के की फैमिली किसी पराए शहर जा बसी थी। पुलिस ने भी केस फाइल बंद कर एफआर यानी फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी।


सो, मामा जी ने एक दिन अपने भांजे को चारबाग में कानपुर जाती बस में बिठा दिया। इस तरह अक्टूबर 1984 की एक शाम नफरती कई साल बाद फिर अपनी जन्मभूमि, कानपुर आ पहुंचा। डी ब्लॉक गोविंद नगर। कानपुर का मिनी पंजाब।


अक्टूबर अपने अंतिम सप्ताह में चल रहा था। जाड़े की तरफ बढ़ते रातों की हवा में एक खुनक थी। भूरी से काली होती मूछों वाले नफरती को कानपुर का यह खुशगवार मौसम बड़ा अच्छा लग रहा था। अच्छा लगने का एक और कारण भी था। उनको एक लड़की से लड़की से मुहब्बत हो गई थी। लड़की का नाम था कमरुन्निसा। घर से थोड़ी दूर रेल लाइन के किनारे उसका परिवार झोपड़ी में रहता था। नफरती अकसर गुजरती ट्रेनों को देखने पटरी के किनारे खड़ा हो जाता था। वहीं झोपड़पट्टी की इस लड़की से उसकी आंखें चार हो गईं।

लेकिन भाग्य का लिखा कौन टाले। जिसकी क़िस्मत में नफरतानंद बनना बदा है वह कमरुन्निसा से मुहब्बत करे या मुमताज़ महल से, शाहजहां कैसे बन सकता है?

तो विधि के विधान से हुआ यह कि 31 अक्टूबर की सुबह इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और उसी शाम नफरती का पुराना मर्ज शॉडेनफ्रायडा फिर उभर आया। वह भी शहर में बहती खून की गंगा में हाथ धोने में जी जान से जुट गया। ऐसा नहीं कि उसे इंदिरा से कोई प्रेम था या कि वह खालिस्तान समर्थक आतंकियों से गुस्सा था। उसे तो बस मजा आता था।


(आज भी तकनीकी दिक्कत के कारण दो हिस्सों में पोस्ट करना पड़ रहा है। बाकी हिस्से को सातवें एपिसोड के नाम से तुरंत पोस्ट कर रहा हूं )

नफ़रतानंद 5

 कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद (5)

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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)


डॉक्टर ने कहा, "इस बीमारी का नाम शॉडेनफ्रायडा है। इस नाम का ताल्लुक जर्मनी से है। वहां की जबान में शॉडेन का अर्थ होता है चोट करना, नुकसान करना या दुख पहुंचाना। और  फ्रायडा का मतलब होता है आनंदित होना। सो, इस शब्द का अर्थ हुआ किसी दुखी प्राणी को देखकर या किसी आदमी को दुख देकर सुख की अनुभूति करना। वैसे यह भावना कुछ मात्रा में शायद हर व्यक्ति में पाई जाती है। जब पड़ोसी की फॉरच्यूनर चोरी हो जाती है तो डिजायर कार वाले को जो आनंद मिलता है उसका कारण यह शॉडेनफ्रायडा ही होता है। यह रोग की स्थिति नहीं है। लेकिन यही भावना रोग की श्रेणी में उस वक्त आ जाती है जब डिजायर मालिक पड़ोसी की फॉरच्यूनर की चोरी करा देता है।


"आपका भांजा इस रोग के ऊंचे पायदान में है। बालक के दांतों में दर्द इसलिए है कि वह अपनी इच्छाओं पर अमल नहीं कर पा रहा। आपने उसे गऊ माता की सौगंध दे रखी है।  वह तो बहुत कुछ करना चाहता है मगर वह गऊ माता की सौगंध नहीं तोड़ सकता। उसकी यही छटपटाहट दांत के दर्द का रूप लेकर बह रही है...अतएव आपसे प्रार्थना है कि बच्चे को सौगंध से मुक्त कर दीजिए।"


"ठीक है डॉक्टर साहब, मैं बालक को कसम से मुक्त कर दूंगा लेकिन ऐसा न हो कि मुक्त होते ही मेरे सर पर पत्थर दे मारे!?" मामा जी ने अपनी चिंता बताई।


"चिंता न करिए। कंस मामा" डॉक्टर हंस पड़ा,"मैं दवाएं दे दूंगा और उम्मीद है कि यह ऐसा कुछ नही करेगा। लेकिन यह रोग पूरी तरह कभी भी नहीं ठीक होगा।शॉडेनफ्रायडा कमोबेश हर आदमी के अंदर होता है। संतों और महात्माओं के अंदर भी। सुना नहीं मठों और डेरों के अंदर संपत्ति के लिए मर्डर हो जाते हैं।"


(नफरती को पार्क में मिला एक आदमी: पढ़ें कल)

नफ़रतानंद 4

 कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद(4)

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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)

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नाना की मौत को जलेबियों से सेलिब्रेट करने की घटना को सब लोग बालसुलभ नादानी मान कर भूलने लगे। नफरती भी नेशनल ज्योग्राफिक और डिस्कवरी चैनलों के जरिए रक्तपान में मशगूल रहने लगा।  तभी एक दिन उसे अपने दांतों में दर्द उमड़ आया। मामी ने उसे लौंग के तेल की फुरेहरी दे दी लेकिन दर्द घटने की बजाय और बढ़ गया। शाम को मामा जी डेंटिस्ट के पास ले गए।


"किस दांत में दर्द है" डेंटिस्ट ने पूछा।


"सारे के सारे दांतों में" नफरती ने दर्द से कराहते हुए जवाब दिया।


डॉक्टर ने मुंह खुलवाकर एकएक दांत की जांच की। उसे कुछ नहीं मिला। 

हैरान होकर डॉक्टर ने कहा, "इसके दांतों में तो कोई रोग नहीं। न कैरीज़ है, न जिनजिवाइटिस। न ही मसूढ़े सूजे हैं और न कोई ब्लीडिंग है। कोई दांत भी नहीं हिल रहा है।"


"फिर!?" मामा जी ने पूछा।


"मैं खुद नहीं समझ पा रहा" डेंटिस्ट ने कहा, "ऐसा करता हूं, इसे पेनकिलर्स  दे देता हूं। सुबह किसी अच्छे फिजिशियन को दिखा लीजिए।"


सुबह नफरती को लखनऊ के मशहूर डॉक्टर भार्गव को दिखाया गया। लेकिन यह बड़ा डॉक्टर भी बीमारी डायग्नोज़ करने में नाकाम रहा। 

"इट कुड बी ए केस ऑफ़ इमोशनल ओवरले" डॉक्टर भार्गव ने कहा, "ऐसा कीजिए, आप इसे नूर मंज़िल में दिखा लीजिए।"


नूर मंज़िल। मायने लखनऊ का प्रसिद्ध मनोरोग अस्पताल। 


दूसरे दिन नफरती को मनोरोग चिकित्सालय ले जाया गया। आधेआधे घंटे के दो सेशन के बाद सायकायट्री के  डॉक्टर ने नफरती के सुख के स्रोत और दर्द का कारण समझ लिया।


"He is suffering with Schadenfreude" डॉक्टर ने कहा।


"आंय" मामा जी चौंक पड़े, "यो का होत है, हमार लरिका बचि तौ जई?"


"परेशान न हों, इसका बाल भी बांका नहीं होगा" डॉक्टर ने एश्योर करते हुए कहा, "लेकिन इसके हाथ से किसी दूसरे की जान जा सकती है। मामा जी आपकी भी।"


मामा जी खुद को कंस जैसा महसूस कर रहे थे। बहरहाल, खुद को संयत करते हुए उन्होंने बीमारी के बारे में पूछा।

(कुछ technical glitch के कारण पूरा एपिसोड पेस्ट नहीं हो पा रहा। बाकी हिस्सा पांचवें एपिसोड के नाम से तुरंत डाल रहा हूं)

नफ़रतानंद 3

 कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद(3)

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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)


आंख से खून बहता देख, नफरती खुशी से उछल पड़ा। उसने 'बो काटा' की स्टाइल में  'बो मारा' का जयघोष किया और मौके से भाग निकला। उसे इस बात में कोई इंटरेस्ट नहीं था कि उस लड़के की आंख का क्या होगा। उसे थाना-पुलिस की भी चिंता न थी। चिंता सिर्फ इतनी-सी थी कि बाप बेल्ट से मारेगा अथवा घर में रखी सन सत्तावन की तलवार से। 


सो, नफरती बाबू ने वहां से जो दौड़ना शुरू किया तो सीधे कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर ही जाकर रुके। नौ नंबर प्लेटफार्म पर लखनऊ वाली मेमू शायद उन्हीं का इंतजार कर रही थी। वे जैसे ही ट्रेन में बैठे, वह चल दी। करीब ढाई घंटे बाद वे गणेश गंज, लखनऊ में अपने मामा के घर बैठे थे।


कुछ ही देर में मामा ने कानपुर फोन करके सारा किस्सा पता कर लिया। नफरती की मा ने भाई से रिक्वेस्ट की और उन्होंने भांजे को अपनी पनाह में महफूज़ कर लिया:  लेकिन गऊ माता की कसम खिलाने के बाद।

गऊ माता की कसम नफरती तोड़ नहीं सकता था। सो, उसके हाथ बंध गए। पर इस अहिंसक जीवन ने उसे बहुत बेचैन कर दिया। सौभाग्य से उसे कुछ ही दिन में सुख का नॉन वेज जरिया टेलीविजन में मिल गया। वह डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक और एनिमल प्लैनेट देखने लगा। जब वह शेरों द्वारा किसी भैंसे को मारा जाना देखता तो उसे ऐसी अनुभूति होती कि मानो वह खुद शेर हो और भैंसे का शरीर फ़ाड़ रहा हो। ध्रुवीय भालू द्वारा सील का शिकार, चीते द्वारा हिरन का शिकार भी उसे बहुत रोमांचित करते थे। लेकिन उसका सबसे प्रिय प्रोग्राम वह था जिसमें मगरों को मिलने वाली विल्डरबीस्टो॑ की सालाना दावत का वीभत्स चित्रण किया जाता है। 


दिलचस्प बात यह कि यह सब उस तरुण को अच्छा लगता था जो अंडे भी नहीं खाता था। अंडे भले न खाता था नफरती लेकिन उसे जब भी मौका मिलता, चिकन शॉप के बाहर खड़ा हो जाता और ब्रॉयलर्स को कटता देखता रहता। यही नहीं, गणेश गंज के पीछे लाटूश रोड पर जब एक सड़क दुर्घटना हुई तो रक्तरंजित शरीर को वह बहुत पास जाकर देखता रहा था।


कालांतर में नफरती के सुख बिंदुओं का और विस्तार हुआ। उन्हें रोते हुए बच्चे, भीख मांगते अपाहिज और सड़क से गुजरती अर्थी भी मज़ा देने लगी।

क्या विडंबना है! अर्थी देखकर ही सिद्धार्थ ने दुख को जाना था और वे अंततः बुद्ध बन गए थे। और, यहां अर्थी हमारे नफरती को किक दे रही थी। अर्थी देखने के बाद सिद्धार्थ को चत्वारि आर्य सत्यानि का फॉर्मूला बनाने में बरसों लग गए थे। और, यहां गणेश गंज में नफरती ने अर्थी रूपी दुख को ही सुख की अनुभूति का माध्यम बना लिया था। दुख समुदय, निरोध और मार्ग जैसे चूतियापों की नफरती को जरूरत ही न थी। उसका फॉर्मूला सिंपल था: दुख इज ईक्वल टु सुख। यह शायद बुद्ध के आगे की सोच थी!


समय गुजरता गया। एक दिन नफरती के नाना जी गुजर गए। पूरा ननिहाल शोक में डूब गया। सिवाय नाना के नाती यानी नफरती के। उसे तो जलेबियां खाने का मन हो रहा था। वह तीर की तरह निकला और गली के नुक्कड़ वाले भगत मिष्ठान्न भंडार पर जा पहुंचा। 


"हां, बताओ बेटा" मिठाई वाले ने पूछा।


"वो अंकल दो किलो जलेबी दे दीजिए।" नफरती ने कहा,"नाना जी मर गए हैं ना..सो मामा जी ने जलेबी मंगाई है। पैसे वही देंगे।"


हलवाई को बड़ा आश्चर्य हो रहा था। तो भी उसने दो किलो जलेबी नफरती को पकड़ा दीं। 

वह जलेबी लेकर चला ही था कि तभी उसके पास आकर एक रिक्शा रुका। रिक्शे में नफरती की अम्मा थीं। रोती और बिलखती। अम्मा कानपुर से चली आ रही थीं। बाप के अंतिम दर्शन करने।


"यहां क्या कर रहा है।" मा ने पूछा।


"अरे कुछ जलेबी लेने आया था। दो किलो हैं। लो मा तुम भी खाओ।"


मा का दिमाग  सन्न रह गया। सोचने लगी: कैसा है ये आदमी जो नाना की मौत पर मिठाइयां बांट रहा है! "चंडाल, तू ही जश्न मना नाना के मरने का" इतना कह कर वे रिक्शे वाले से बोलीं,"चलो भइया, बस उस मंदिर के पास ही मेरा घर है।"


बेचारा नफरती समझ ही नही पा रहा था कि अम्मा जलेबियों पर क्यों गुस्सा हो रही थीं।


(नफरती को इलाज़ के लिए मामा ले गए नूर मंजिल: पढ़िए कल)

नफ़रतानंद 2

 कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद(2)

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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है। इसके किसी भी पात्र का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं। संयोग की बात दीगर है)


नफरतानंद को अपनी माता से अधिक गऊ माता से प्रेम था क्योंकि उन्होंने चतुष्पदी मा का ही दूध  पिया था। सगी मा से तो उनको नफ़रत-सी थी क्योंकि उसने छठे महीने से ही उनको दूध पिलाना बंद कर दिया था। वह करती भी क्या? छठे महीने में जब उनके मुंह में दंत पंक्ति उभरनी शुरू हुई तो उन्होंने उसका सर्वप्रथम उपयोग मा की छाती पर ही किया। बहुतेरी कोशिश के बाद मा जब उनकी कुटेव छुड़वा नही पाई तो उसने नन्हे शैतान को गऊ माता के सुपुर्द कर दिया।


जैसे जैसे वे बड़े होते गए, वे सुख के नए साधन खोजते गए। घुटनों पर चलने तक वे शिकार में सुख तलाशने लगे। वे चीटों का शिकार करते। जहां कहीं चीटों की कतार मिलती वे एंबुश की मुद्रा में पालथी मारकर बैठ जाते और चपत मारमार कर चीटों को यमलोक पहुंचाते जाते। वे यहीं पर न रुकते। अपने गेम को वे खा भी डालते थे। खट्टे फॉर्मिक एसिड की उनको लत पड़ गई। लत तब छूटी जब एक दिन एक चीटे ने टांगों के बीच घुसकर ऐसा काटा कि तीन दिन तक सूसू करना मुहाल हो गया। उस दिन से आज तक उन पर चीटों का खौफ इस कदर तारी है कि वे एक भी चीटे को देख लेते हैं तो उनका हाथ क्रॉच को ढक लेता है।


नफरतानंद अगर अपनी मा से चिढ़ते थे तो बाप से बाकायदा घृणा करते थे। घृणा रेसीप्रोकल थी, जो समय के साथ बढ़ती चली गई। छह-सात साल की उम्र तक बाप उनको लगभग हर दिन पीटने लगे थे क्योंकि उलाहने भी तो रोज़ आने लगे थे। नफरती कभी किसी बच्चे का सर फोड़ देता तो किसी के गाल में पेंसिल घुसेड़ देता। 


एक दिन उसने छत पर बिल्ली को खदेड़ा तो वह तीन मंजिल से कूद गई। नफरती को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि इतनी दूर से कूदने के बाद बिल्ली मरी नहीं थी और दौड़कर सड़क के उस पार वाली बिल्डिंग में घुस गई थी। अगले ही दिन नफरती ने एक एक्सपेरिमेंट कर डाला। उसने पड़ोसी के पोमेरियन को छत से फेंक दिया।


उस शाम बाप ने उसे चमड़े की बेल्ट से पीटा। उसी शाम नफरती ने स्कूल में सीखी मा की गाली का पहला प्रयोग किया। बेल्ट की हर सटाक के साथ वह ज़ोर से चीखता ... माxxxद।


नफरती जब 12-13 साल का हुआ तो एक बार उसे दशहरा में रामलीला देखने का अवसर प्राप्त हुआ। राम और रावण का युद्ध देखने का असर यह हुआ कि कई दिन तक वह कभी क्रिकेट बैट को गदा की तरह भांजता मिलता तो कभी दफ्ती की तलवार बनाकर स्वांग करता दिखता। एक दिन उसे कहीं से बांस की खपच्चियां मिल गईं। फिर क्या था। बन गया रामचंद्र जी का धनुष। खपच्ची का ही तीर भी बन गया, जिसकी नोक उसने एक चाकू से पैनी कर ली। धनुर्धारी ने कई दिन तक चिड़ियों पर निशाना साधा। हर बार चिड़िया बच गई। हार कर नफरती ने एक पड़ोसी बच्चे को टारगेट प्रैक्टिस के लिए बुला लिया। पहले बीस फुट से तीर चलाया गया। तीर लड़के से दो फूट दूर से गुजरा। अगली बार 15 फुट से कोशिश की मगर निशाना नाकाम। फिर 10 फुट...निशाना नाकाम। अंत में पांच फुट से तीर चलाया गया। इस बार तीर लगा मगर निशाने से डेढ़ बालिश्त ऊपर। उसकी नोक बाईं आंख में घप्प से घुस गया। खून की धार बह निकली।


(जारी)

नफ़रतानंद

 कनपुरिया लंतरानियाँ: स्वामी नफरतानंद

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(यह पूरी कथा काल्पनिक यानी सरासर गप्प है. इसके किसी भी पात्र का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं. संयोग की बात दीगर है) 


पिता ने तो नाम रखा था प्रेमानंद लेकिन वॉट्सएप यूनिवर्सिटी से इतिहास में आचार्य की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने केसरिया बाना धारण कर लिया और अपना नया नाम रख लिया: श्री श्री 108 श्री स्वामी नफरतानंद।

उनका सबसे बड़ा गुण यही था कि वे किसी से भी नफरत कर सकते थे। स्वयं से भी। यह उनका चरम सुख था। इस स्थिति को वे मोक्षदायनी परम गति कहते थे। खुद से नफरत करने की स्थिति रोज़ रात शयन के वक्त आती थी, जब उन्हें अपनी गर्लफ्रेंड याद आती थी। "कुतिया!" उनके मुंह से यह गाली बरबस फूट पड़ती। उस लड़की का कुसूर बस इतना था कि उसने एक दिन नफरतानंद को किस कर लिया था। स्वामी जी को मुंह जूठा होने की अनुभूति से उबकाई आ गई और वे वहीं बगीचे में खिले गुलाबों पर थूक की पिचकारी मारकर  बोले, "छी! अब तुझसे  प्रेम नहीं कर सकता। यह पाश्चात्य वासना और तुम्हारे थूक से सना फ्रेंच किस मुझे बर्दाश्त नहीं। मैं तो राधा और कृष्ण के पवित्र आध्यात्मिक प्रेम में विश्वास करता हूं। मैं तो चला। तू यहीं पार्क में कोई ग्राहक तलाश ले।"


लड़की का चेहरा अपमान, नारी सुलभ लज्जा और क्रोध से लाल हो गया और वह तमतमा कर बोली, "कभी सूरदास को और संस्कृत आती हो तो जयदेव को पढ़ लेना। तब तुम्हे राधा और कृष्ण के प्रेम का ज्ञान होगा।"


नफरतानंद ने 'मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहौं' और 'मैं नहि माखन खायो' से आगे सूरदास को नहीं पढ़ा था। संस्कृत में स्कूल में चंद श्लोक पढ़े थे। जयदेव का तो नाम ही नहीं सुना था। वॉट्सएप यूनिवर्सिटी में तो इस तरह के अश्लील ज्ञान का कोई सिलेबस ही नहीं था।


बिस्तर पर लेटे नफरतानंद की बंद आंखें प्रेमिका से विछोह का यह मंजर हर रात विडियो क्लिप की तरह देखतीं। नफरतानंद कुत्ते की तरह हांफने लगता। टेस्टोस्टेरॉन एक तरफ उबाल मारता और उच्च संस्कार विचार दूसरी तरफ। यही वह क्षण होता जब उसे खुद से नफ़रत हो जाती। वह उठता और एक गिलास पानी के साथ विजया मिश्रित लवणभास्कर चूर्ण फांक कर सो जाता।

(जारी)

बेतुकी बातें H

 बेतुकी बातें

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क्या लिखूं? कई दिन से यही सोच सोच कर परेशान हूं। दिल्ली में ज्वलनशील नोटों पर लिखूं? लेकिन मैं तो यह भी नहीं जानता कि आत्मदाह करने वाले नोट चूरन वाले थे या आईएसआई निर्मित। यह भी तो हो सकता है कि नोटों की होली का वीडियो AI ने बनाया हो! उम्मीद है कि करेंसी नोटों से निकलने वाली miasma की फोरेंसिक जांच से सच का पता चल जाएगा। अब आप पूछेंगे कि यह मियाज़्मा क्या होता है? अगर मैं कहूं कि इसे समझने के लिए अंग्रेजी पढ़िए तो आप मुझे देशद्रोही कहने लगेंगे। चलिए मत पढ़िए। हालांकि यह अर्थ नहीं लेकिन आप मियाज़्मा को चिरायंध समझ लीजिए। चिरायंध का अर्थ न पूछिएगा। समझाऊंगा तो चिरायंध फैल जाएगी। इस मुहावरे का मतलब? इसे समझने के लिए आपको मेरे शहर कानपुर में रहना होगा। कानपुर वह शहर है जिसने अपने सपूत गणेश शंकर विद्यार्थी की आज के ही दिन हत्या की थी। हर साल की तरह इस बार भी यह शहर आज बलिदान दिवस पर बुक्का फाड़ कर हर साल रो रहा है। न न न! यह रोउनों का शहर नहीं है। सुबह यह शहर बैक टू स्क्वॉयर वन की अधोगति को प्राप्त कर लेगा। असली श्रद्धांजलि कानपुर तब देता है जब कोई दंगा होता है। मौका मिलये ही जम कर पार्टिसिपेट करता है। सन 84 हो या 92/93 का साल। दंगे सेकुलर रहे हैं। मैंने 84 में दंगे के बाद एक सरदार जी के घर नया टीवी सेट देखा था।


मैं इस उच्चस्तरीय चिंतन में लगा ही था कि मेरे अखंड मित्र झम्मन और सिरम्मन आ धमके। मैं नोटों के चिंतन से उबर चुका था। लेकिन ये दोनों उसी में डूबे थे। झम्मन नोटों को लेकर क्रांति की बातें कर रहा था क्योंकि उसने लाल शर्ट पहन रखी थी। सिरम्मन नोटों को लेकर धर्म और ज्योतिष की बातें कर रहा था क्योंकि उसने ऑरेंज कलर का कुर्ता पहन रखा था। 


चाय पीने और सनकी का पाउच फांकने के बाद सिरम्मन नोट जलने की ज्योतिषीय व्याख्या में जुट गए। मुझे आश्चर्य हुआ कि इस पोंगा पंडित को ज्योतिष का ज्ञान कैसे हो गया। सो मैंने पूछ लिया, "क्यों पंडत आज का पंचांग पता है?"


इनकार में सर हिलाते हुए वह बोला, " आय डोनो, यू नो आय वेंट टु अ मिशनरी स्कूल।"


"फिर तू ज्ञान पांड़े काहे बन रहा है?"


वह हंसने लगा। बोला, "आय कंसल्टेड विद स्वामी ग्रोकानंद सरस्वती..."


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ग्रोकानंद सरस्वती ने क्या कहा? यह जानने का मन हो तो सूचित करें।

बेतुकी बातें F

 बेतुकी बातें: 3

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नाम में क्या रखा है

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झम्मन और सिरम्मन में आज सुबह झगड़ा हो गया। और फैसला कराने के लिए वे मेरे ग़रीबख़ाने आ गए। 


मैंने मेज़ पर चाय रखवा दी। सिरम्मन सुड़कने लगा। लेकिन झम्मन ने चाय इग्नोर कर दी और आंखों को लाल लाल करके चीखा, "इस दो कौड़ी के आदमी ने मुझे गाली दी है!"


"मा बहन की?" मैंने आश्चर्य जताते हुए पूछा।


"उससे भी बुरी..." झम्मन सुबकने लगा।


एमसी बीसी से बुरी गाली! मुझे उत्सुकता होने लगी, "आखिर क्या गाली दी?"


"इसने मुझे जुम्मन कहा!"


अपनी हंसी को बमुश्किल रोकते हुए मैंने कहा, "यह भला कैसी गाली है! झम्मन और जुम्मन एक ही जैसे नाम हैं। फिर, प्रेमचंद ने तो जुम्मन शेख को अमर बना दिया है।"


"ज़्यादा साहित्यिक ज्ञान मत पेलिए। मेरे गांव में जुम्मन का नाम गाली है। यह बात सिरम्मन भी जानता है।"


"मगर कोई नाम गाली कैसे हो सकता है? मैंने पूछा। 


 सिरम्मन ने झम्मन को जवाब देने का मौका नहीं दिया। मुस्कराते हुए बोला, "हमारे गांव में जुम्मन नाम का एक हज्जाम था। एक बार उसने ज़मींदार साहब की हजामत बनाते हुए उस्तरे से गला काट दिया था।"


"तो उससे क्या!" मैंने अचरज जताते हुए कहा,"इस मामले से झम्मन का क्या रिश्ता?


"भाई, कल शाम मैं घर के पीछे मुर्ग़ा काट रहा था।" इस बार झम्मन बोला, "गर्दन अलग ही की थी कि यह ख़बीस आ गया और बोला, " वाह भई, सर धड़ से जुदा! जुम्मन मियां ज़िंदाबाद!"


मैं सीरियस हो गया। "झम्मन" मैंने पूछा, "क्या तुम मुसलमान हो?


मेरी बात पर झम्मन हत्थे से उखड़ गया, "आपसे मतलब! और, मान लो कि मुसलमान हूं। तो क्या आप मुझको औरंगज़ेब कह देंगे?"


"नहीं तो। वैसे औरंगज़ेब तो बहुत अच्छा कश्मीरी लड़का था" मैंने कहा, "बड़ा देशभक्त था..."


"अरे रेरेरे!" सिरम्मन ने मुझे बोलने न दिया, "होली की भांग अब तक चढ़ी है क्या, पत्रकार जी...मैं तो आपको पढ़ा लिखा मानता था। औरंगज़ेब यानी बुतशिकन बादशाह, हमारे शिवाजी और गुरु गोबिंद सिंह जी का दुश्मन।" 


"हां, वह भी था। मैंने कहा, "उसका असली नाम अबुल मुज्जफर मुहिउद्दीन मोहम्मद था। आलमगीर और औरंगज़ेब जैसे नाम तो उसने खुद धारण कर रखे थे। वैसे ही जैसे आज कल कई लोग खुद को गुरु, स्वामी, 1008 श्री कहने लगते हैं।"


"अपना नाम उसने औरंगज़ेब क्यों रखा" झम्मन ने पूछा।


"पहले अर्थ समझ लो, "मैंने कहा, "औरंग का अर्थ होता है सिंहासन। और ज़ेब माने होता है शोभा। यानी वह शख्स जिसके बैठने से सिंहासन की शोभा बढ़े। समझे?"


"थोड़ा थोड़ा।"


"अरे भाई, जैसे तंज़ेब यानी वह कपड़ा जो तन की शोभा बढ़ाए। जैसे पाज़ेब जो पांव की शोभा बढ़ाए। एक लफ्ज़ बदज़ेब भी है यानी बदसूरत"


"अब समझे" सिरम्मन ने कहा।


"क्या ख़ाक समझे। यह भी समझो कि जहर का नाम अमृत कर देने से जहर अमृत नहीं हो जाता। अबुल मुज्जफर मुहिउद्दीन मोहम्मद औरंगज़ेब नाम रखने के बाद भी सबसे रद्दी मुगलों में गिना जाता है।"


मेरी बात पर दोनों सर हिलाने लगे। मेरा प्रवचन जारी रहा, "अब बताओ मुगलों में असली औरंगज़ेब कौन था जिसने सिंहासन की शोभा बढ़ाई?"


"अकबर" दोनों एक साथ बोले, "उसे तो इतिहासकारों ने भी अशोक की तरह महानता की पदवी दी।"


"बिलकुल सही" मैंने कहा, " अकबर ही नहीं। देश में अनेक राजा हुए हैं जिन्हें औरंगज़ेब कहा जा सकता है, जिनके बैठने से सिंहासन धन्य हुआ। नाम बताओगे?"


दोनों ने शिवाजी, चंद्रगुप्त, रणजीत सिंह आदि कई नाम बताए। नेहरू के बाद मैंने उन्हें रोक दिया। वे बड़ा गुस्साए। किसी तरह देशभक्त औरंगज़ेब की कहानी सुनाकर किसी तरह शांत किया। आप भी सुनिए:


देशभक्त औरंगज़ेब एक कश्मीरी युवक था। वतन के लिए जान देने का जज्बा था। सो फौज में भर्ती हो गया था। आतंकवादियों ने जून 2018 में उसे उस वक्त अगवा कर लिया था जब वह छुट्टी लेकर ईद मनाने घर जा रहा था। आतंकियों ने उसे तड़पा तड़पा कर मार डाला था लेकिन उसने सेना का कोई राज़ नहीं बताया था। औरंगज़ेब की मौत के बाद उसके दो भाई तारिक और शब्बीर भी सेना में भर्ती हो गए थे।


तो भइया झम्मनो और सिरम्मनो,  नाम में कुछ नहीं रखा। शेक्सपीयर कह भी गए हैं


What's in a name? That which we call a rose/ By any other name would smell as sweet

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सलग्न फोटो राइफलमैन औरंगज़ेब की है।

बेतुकी बातें G

 बेतुकी बातें: 4

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आ अब लौट चलें

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सिरम्मन: आओ जंगल चलें


झम्मन: वाह क्या बात है! कविता लिख रहे हो क्या?


सिरम्मन: हां। गंभीर कविता। 


झम्मन: तो अगली लाइन मेरी


सिरम्मन: बोलो


झम्मन: आओ जंगल चलें...लोटा लेकर चलें


सिरम्मन: तुझसे तो मन की बात करना भी गुनाह है। मैं जंगल को लौट चलने की बात कह रहा था।


झम्मन: कहां से लौट चलें?


सिरम्मन: इस समाज से, इस सिविलाइजेशन से।


झम्मन: वहां क्या होगा?


सिरम्मन: जंगल में मंगल होगा। 


झम्मन: वहां रहोगे कहां? खाओगे क्या?


सिरम्मन: मैं शहद पीऊंगा, फल खाऊंगा


झम्मन: और मैं? 


सिरम्मन: तुम हिरन की शाही रान चबाना।


झम्मन: कच्ची?


सिरम्मन: नहीं। तुम साथ में मानव के सबसे बड़े आविष्कार माचिस को साथ ले जाना ताकि जंगल को आग लगा सको।


झम्मन: जंगल सरकार का होता है। शहद सरकार का। फल सरकार के। हिरन सरकार के। जंगल तुम्हारे बाप का नहीं। 


सिरम्मन: तो क्या सरकार के बाप का है?


झम्मन: और किसका है? उसने ढेर सारे कानून बना रखे हैं।


सिरम्मन: तो हम प्राचीन जंगल में जाएंगे। 20000 BC के अक्षत जंगल में, जहां इन सरकारों का नहीं,  कुदरत का निज़ाम होगा...जहां सिर्फ एक कानून होगा। 


झम्मन: एक कानून! कौन सा?


सिरम्मन: शक्तिरेव जयते।


झम्मन: आंय! 


सिरम्मन: सही सुना। सत्यमेव नहीं, शक्तिरेव जयते। यानी ताकत की ही जीत होती है। यह कुदरत का कानून है। सभी जानवर इसे जानते हैं। इसीलिए चीता और हिरन दोनों दौड़ने की शक्ति बढ़ाने में लगे रहते हैं। 


झम्मन: इस बार चैत में ही जेठ वाली गर्मी आ गई है। तेरी खोपड़ी में चढ़ गई है।


सिरम्मन: गलत। दरअसल, जूते खाते खाते तेरी खोपड़ी का भेजा उड़ गया है। सुन, तुझे जंगल के कानून के गुण बताता हूं।


झम्मन: बता।


सिरम्मन: देख, आज के निज़ाम में कोई चिंदी चोर भी गामा पहलवान की खोपड़ी गोली से उड़ा सकता है। है कि नहीं?


झम्मन: उड़ा सकता है...


सिरम्मन: लेकिन जंगल में कभी कोई हिरन सोते हुए शेर के पेट में सींग नहीं घुसेड़ सकता...


झम्मन: बरोबर। लेकिन जंगल में हत्याएं बहुत होती हैं! गलत कह रहा हूं?


सिरम्मन: बिलकुल। जंगल में वध और हत्या जैसा कोई विचार नहीं। जानवर बस भोजन करते हैं। तुम क्या सोचते हो, शेर किसी रंजिश के तहत हिरन को को मारता है! न भाई न। वह तो उन्हें भूख लगने पर मारता है। न कभी हाथ पांव बांधकर बलि देता है न कुरबानी। 


झम्मन: बात तो सही है लेकिन...


सिरम्मन: लेकिन क्या? जंगल में मंगल है। वहां मॉरल और इममॉरल जैसा कुछ नहीं होता। सब कुछ एमॉरल। सब नंगे रहते हैं। सब चंगे रहते हैं। कोई किसी की छाती नहीं घूरता न रेप करता है।


झम्मन: समझा। सब नंगा सी, सब चंगा सी!


सिरम्मन: और, हां! वहां कोई पॉल्यूशन भी नहीं। न कोई गंदगी।


झम्मन: सुलभ शौचालय बने होते हैं क्या?


सिरम्मन: हां, मदर नेचर वहां सुलभ शौचालय भी चलाती है। उसके वर्कर हर अपशिष्ट पदार्थ को पंच तत्वों में विलीन कर देते हैं। लाशों को भी। 


झम्मन: मतलब यह सारी गंदगी हमारी देन है!


सिरम्मन: ऑफ कोर्स। हमारे विकास की देन। आदमी ने धरती माता को सिवाय गंदगी के और दिया ही क्या है?


झम्मन: और, हम जो मंगल गृह में बसने जा रहे हैं! उसका क्या?


सिरम्मन: उससे धरती को क्या फायदा? क्या चंद्रमा पर चढ़ाई करने से धरती पर चांदनी के फूल खिलने लगते हैं? क्या हवाई जहाज़ के उड़ने से मलयानिल बहने लगती है? क्या फैक्ट्री लगाने से गाय ज्यादा दूध देने लगती है?


झम्मन: तो फिर चला जाए?


सिरम्मन: लेकिन लोटा या जमालगोटा ले कर न चलना। वहां धरती अम्मा ने सारा इंतज़ाम कर रखा है।

बेतुकी बातें E

 बेतुकी बातें: 5

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🌙 हैपी ईद 🌙  

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सिरम्मन: चांद रात मुबारक। हैपी ईद


झम्मन: तू मुझे गुस्सा क्यों दिलाता रहता है। मैं मुसलमान नहीं, नहीं, नहीं। अब बस त्रिबाचू कह दिया।


सिरम्मन: ठीक है बाबा। तू मुसलमान नहीं। दत्तात्रेय गोत्र का ब्राह्मण है। नाउ ओके? 


झम्मन: नोके।


सिरम्मन: अमां, अजब अहमक हो। मुसलमान न सही। ईद मनाने में क्या दिक्कत है। कुछ नहीं मुझको हैपी ईद बोल। गले लग। यह क्या हुआ! खुशी के इतने बड़े मौके पर मुंह लटकाए बैठा है।


झम्मन: मेरी उदासी का कारण मत पूछ। तू समझ नहीं पाएगा।


सिरम्मन: बता के देख। थोड़ा ग़म बांट लूंगा। हल्का हो जाएगा।


झम्मन: बात यह है कि मैं फिलस्तीनियों को लेकर बहुत परेशान हूं। बेचारे कैसे ईद मना रहे होंगे। हे राम! कैसा वक्त आ गया है। एक मुल्क इस दुनिया में बिलकुल तनहा खड़ा है। सब मिल कर कूट रहे हैं उसे।


सिरम्मन: सही बात है। बेचारे तनहा खड़े हैं। पर तू एक बात बता। तूने कभी सड़क पर घायल किसी आदमी को अस्पताल पहुंचाया है?


झम्मन: नहीं। वह मेरा काम नहीं।


सिरम्मन: ओके। चलो यह बताओ कि कभी किसी दबंग या सिपाही के हाथों कुटते गरीब रिक्शे वाले के पक्ष में मोर्चा लिया है?


झम्मन: क्यों भाई। अपने ऊपर पुलिस मुज़हमत का केस चलवाना है क्या?


सिरम्मन: चलो, कोई बात नहीं। दफ्तर में अपने सेठ जी की गलत बात का कभी विरोध किया है क्या?


झम्मन: वाह भई वाह! चार पैसे की नौकरी खोनी है क्या?


सिरम्मन: कभी किसी भूखे को खाना खिलाया है?


झम्मन: काले कुत्ते को खिलाता हूं। रोज़। एक पांच रुपए का बिस्कुट का पैकेट। बेनागा।


सिरम्मन: किसी आदमी को नहीं?


झम्मन: ये भिखमंगे बड़े बदमाश होते हैं। दिन में मांगते हैं। रात में डाका डालते हैं।


सिरम्मन: तुझे अपने समाज, अपने लोगों के दुख से कोई वास्ता नहीं और चला है फिलस्तीनियों का हमदर्द बनने। वाहियाद आदमी!


झम्मन: क्यों गरीब आदमी के पीछे पड़े हो, भाई। किसी तरह रोटी कमा रहा हूं और तू चाहता है कि मैं बरबाद हो जाऊं।


सिरम्मन: नहीं भाई, झम्मन। ये बेतुकी बातें हैं। इनका कोई सर पैर नहीं। तू उदास मत हो। लेकिन हैपी ईद तो बोल


झम्मन: हैपी ईद।


सिरम्मन: सुबह आना मेरे घर। गले मिलने।


झम्मन: और सिवइयां?


सिरम्मन: वह भी।

बेतुकी बातें D

 बेतुकी बातें: 8

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मुक्ति दिवस

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सिरम्मन: सुना तुमने? दो अप्रैल को अमेरिका मुक्त हो गया! 


झम्मन: तो 4 जुलाई 1776 को क्या हुआ था? क्या उस दिन रेड इंडियंस ने मुक्ति पाई थी।


सिरम्मन: बौड़मदास तुम्हें कब अकल आएगी? 4 जुलाई को इंडिपेंडेंस डे मनाते हैं। दो अप्रैल को लिबरेशन डे सेलिब्रेट किया गया है। दोनों में फर्क है। विद्वान लोग इंडिपेंडेंस को स्वतंत्रता मानते हैं और लिबरेशन को मुक्ति, मोक्ष।


झम्मन: मोक्ष! वाह!! मोक्ष तो हर भारतीय की बकेट लिस्ट में होता है। पुरुषार्थ चतुष्टय: धर्म, अर्थ, काम और अंत में मोक्ष। समझा। वहां तो स्टेच्यू ऑव लिबर्टी भी है। लगता है कि अमेरिका वालों ने इस नवरात्र में मोक्ष देवी यानी मुक्ति देवी की इतनी आराधना कर डाली कि सिद्धिदात्री ने नवमी के पहले ही वर दे दिया।


सिरम्मन: तू हर जगह धरम को न घुसेड़ा कर। मैं राजनीति की बात कर रहा हूं।


झम्मन: सियासत! तो फिर बता कि वी द पीपुल ऑव इंडिया अपना लिबरेशन डे कब मनाते हैं?


सिरम्मन: 15 अगस्त को।


झम्मन: गलत। वह तो स्वतंत्रता दिवस है।


सिरम्मन: फिर?


झम्मन: मई में


सिरम्मन: तारीख?


झम्मन: तारीख तो भगना नआवत ने बताई थी एक बार। तू भूल गया?


सिरम्मन: यह किस शै का नाम लिया तूने?


झम्मन: शै और मात नहीं। यह कोरिया के प्रसिद्ध इंडोलॉजिस्ट एवं इतिहासकार का नाम है।


सिरम्मन: क्या तारीख बताई थी उन्होंने?


झम्मन: मई 1545


सिरम्मन: क्या हुआ था उस दिन?


झम्मन: तारीख नहीं याद पर उस साल मई में शेरशाह सूरी का निधन हुआ था।


सिरम्मन: क्या बेतुकी बात करते हो! शेरशाह की मौत यानी लिबरेशन डे! धत्तेरे की...


झम्मन: क्यों भाई? उस दिन मुगलों को अफगानों से निजात यानी मुक्ति नहीं मिल गई थी?


सिरम्मन: तो तुम्हारी नजर में मुगल माने भारत होता है? कमीने, बाबर की औलाद! बहुत कूटे जाओगे। 


झम्मन: सॉरी यार। थोड़ा बहक गया था। हां तो तुम अमेरिका के लिबरेशन डे के बारे में बता रहे थे...क्या हो रहा है वहां।


सिरम्मन: काफी कुछ। लिबरेशन डे के दूसरे ही दिन डॉलर ने रुपए की गति पकड़ ली। 


झम्मन: क्या?


सिरम्मन: पहाड़ चढ़ने की बजाय वह खाई में कूदने लगा। डॉलर को मुक्ति की हवा लग गई है। वह सरकार के कंट्रोल में नहीं।


झम्मन: बाकी तो सब ठीक है?


सिरम्मन: बिलकुल ठीक है। शक की गुंजाइश नहीं। खुद राष्ट्रपति ट्रंप कह रहे हैं कि सब ठीक है। 


झम्मन: हां, भाई। हम लोग भी तो कहते हैं: फटी हो या चिथड़ी, साहब कहें तो ढोलक मढ़ी। और बताओ कुछ...


सिरम्मन: और खबर यह है कि शेयर मार्केट धड़ाम हो गया है। एक दिन में 2.5 ट्रिलियन डॉलर हवा में उड़ गए।  टैरिफ टैरिफ का बांस उलटे बरेली की तरफ चल दिया है। एक्सपर्टों को विश्वव्यापी मंदी की आशंका सता रही है।


झम्मन: ट्रंप थोड़ा बहुत तो परेशान होंगे ही?


सिरम्मन: नॉट ऐट ऑल। उन्हें सिर्फ पुतिन परेशान कर सकते हैं। जनता क्या परेशान करेगी जो खुद परेशान है।  बदहाली की खबरें ट्रंप पर वही असर डाल रही हैं जो पानी चिकने घड़े पर डालता है। सीएनएन के मुताबिक ट्रंप ने कहा है: यह मरीज की सर्जरी जैसा है। बहुत बड़ा काम है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। बाजार बूम करने जा रहा है...स्टॉक मार्केट बूम करने जा रहा है...अमेरिका बूम करने जा रहा है।


झम्मन: वाह! इसे कहते हैं मर्द। ऐसा मर्द भारत में क्यों नहीं हुआ। 


सिरम्मन: हो चुका है और तुम उसका अपमान कर रहे हो।


झम्मन: किसका?


सिरम्मन: मेरे ग्रेट ग्रेट ग्रेट ग्रेटेस्ट ग्रैंड फादर का


झम्मन: कौन थे वो?


सिरम्मन: सुल्ताने हिन्द मोहम्मद बिन तुग़लक़।


झम्मन: पर तू तो हिन्दू है?


सिरम्मन: तो? तुझे पता नहीं! भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है। 

(pratibimbmedia.com में प्रकाशित)

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बेतुकी बातें A

 बेतुकी बातें: 9


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जॉब इंटरव्यू

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साक्षात्कारकर्ता: अपना संक्षिप्ततम परिचय दीजिए?


उम्मीदवार: मैं एक आकांक्षी हूं।


साक्षात्कारकर्ता: क्या चाहते हो?


उम्मीदवार: दो जून की रोटी और एक छत।


उम्मीदवार: पक्की छत? छप्पर से काम नहीं चलेगा?


साक्षात्कारकर्ता: छप्पर न हो तो भी चलेगा


साक्षात्कारकर्ता: एक्सीलेंट। कोई महत्वाकांक्षा नहीं?


उम्मीदवार: आकांक्षी की कोई महत्वाकांक्षा नहीं होती। महत्वाकांक्षी लोग टू मच डेमोक्रेसी की उपज होते हैं। ये लोग आंदोलनजीवी भी होते हैं। संक्षेप में कहूं तो वे ग़द्दार होते हैं। 


साक्षात्कारकर्ता: साहित्य पढ़ा है?


उम्मीदवार: थोड़ा थोड़ा


साक्षात्कारकर्ता: सबसे ख़राब होता है सपनों का मर जाना। यह एक मशहूर कविता की लाइन है। इस पर टिप्पणी करो।


उम्मीदवार: बेहूदी कविता है। सपनों के मरने से भी ज्यादा ख़राब होता है अपना ख़ुद का मर जाना। 


साक्षात्कारकर्ता: तुम्हारे रेज्यूमे में दर्शनशास्र का भी उल्लेख है। बताओ सत्य क्या है?


उम्मीदवार: सत्य वही है जो मालिक को अच्छा लगे। वहीं सुंदर और शिव भी है। सत्यं शिवं सुंदरम्। मैं अद्वैत में यकीन करता हूं। इस ब्रह्मांड में सिर्फ एक सत्य है, सत्ता है। और वह है मेरा मालिक। मेरा साहब। सिर्फ वही करता है। वहीं कर्ता है। कबीर बहुत पहले कह गए थे: साहब सों  सब होत है , बंदे ते कछु नाहिं राई ते परबत करै , परबत राई माहिं।


साक्षात्कारकर्ता: वाह! कमाल है!! तुम नौकरी के लिए बिल्कुल फिट हो। तुम्हारे जैसे कर्मवीरों के लिए ही कहा गया है: न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं, नौकरी के लिए। 


उम्मीदवार: मतलब?


साक्षात्कारकर्ता: यू आर सिलेक्टेड।

बेतुकी बातें C

 बेतुकी बातें: 10

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ASS ऐस, ऐस माने गदहा

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चेला: मास्साब, क्या अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वाइट हाउस में गदहा पाल रखा है?


गुरु जी: पता नहीं बेटा। लेकिन तुझे क्या? तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। तूने तुग़लक़ वाला चैप्टर याद किया कि नहीं? तू आउट ऑफ द बॉक्स मत सोचा कर।


चेला: नथिंग आउट ऑफ द बॉक्स, गुरु जी। यह देखो इंटरनेट न्यूज़ है... ट्रंप कह रहे हैं "दे आर किसिंग माय ऐस।" ऐस माने गदहा ही होता है न? A S S ऐस।


गुरु जी: कुछ समझ में नहीं आ रहा बेटा। ऐस माने गदहा ही होता है। और डंकी माने भी गदहा होता है।


चेला: गुरु जी, डंकी रूट भी होता है, जिससे मेरा भाई अमेरिका गया था। 


गुरु जी: फिर आउट ऑफ द सिलेबस! चुप!! मुझे गधे पर कंसंट्रेट करने दे।


चेला: छोड़ो गुरु जी। मान लेते हैं कि ट्रंप जी ने गदहा पाल लिया होगा। अब दो सवाल हैं: पहला कि क्यों पाला? पिछली बार तो उन्होंने मक्खी भी नहीं पाली थी, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपतियों में जानवर पालने की परंपरा रही है। और दूसरा.. 


गुरु जी: रुक रुक! पहले पहले सवाल से तो निपट लूं। गूगल बता रहा है कि वाइट हाउस में पहले भी गदहा बंध चुका है। यह जॉर्ज वॉशिंगटन के कार्यकाल में हुआ था। उन्होंने एक उन्दुलूसी गदहे को पाला था।


चेला: समझ गया, गुरु जी। समझ गया। यह गधा पालन मागा, यानी MAGA मुहिम का हिस्सा है। मेक अमेरिका ग्रेट अगेन।


गुरु जी: कैसे?


चेला: पहले बताइए, जॉर्ज वॉशिंगटन ग्रेट थे कि नहीं?


गुरु जी: यू मीन महान? अरे बच्चे, वे तो महानों में महान थे।


चेला: मतलब जॉर्ज वॉशिंगटन जैसी महानता पाने के लिए ही वाइट हाउस में गदहा पाला गया है। हो सकता है कि ज्यादा महानता पाने के लिए अभी कुछ और गदहे पाल लिए जाएं।


गुरु जी: सही कह गया है अपना शेक्सपियरवा। Some are born great, some achieve greatness, and some have greatness thrust upon them


चेला: समझ गया


गुरु जी: क्या समझा? मैं हिन्दी में समझाता हूं। थोड़ी चूक हो तो क्षमा करना। माय इंग्लिश इज कमज़ोर। और मेरी हिन्दी वीक है। सो, मेरे मुताबिक इसका अर्थ है:  कुछ लोग पैदाइशी महान होते हैं, कुछ अपने कर्मों से महानता हासिल कर लेते हैं और कुछ लोग अपने ऊपर महानता थोप लेते हैं।


चेला: गुरु जी, जो लोग ट्रंप के गदहे को चूम रहे हैं, वे कौन हैं? उनके क्या नाम हैं? और वे गदहे को क्यों चूम रहे हैं?


गुरु जी: जैसे स्विस बैंक के खाता धारकों के नाम बैंक और खाताधारक के अलावा कोई नहीं जानता, वैसे ही गदहे को चूमने वालों के नाम गदहे और चुम्बन लेने वाले के सिवाय कोई नहीं जानता। कयास लगाए जा सकते हैं। लेकिन यह काम भी वही कर सकता है जिसकी आत्मा शरीर त्यागने को आतुर हो।


चेला: चलिए, यही बता दीजिए कि इतने बड़े बड़े लोग गर्दभ चुम्बन क्यों कर रहे है?


गुरु जी: महानता हासिल करने के लिए। 


चेला: महानता क्या है?


गुरु जी: जिससे लोग डरें।

(English translation on request)

बेतुकी बातें B

 बेतुकी बातें: 11

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बाबा खड़ा बाज़ार में ले गुलाब का पेय

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बाबा: आ गया, आ गया, आ गया


ख़रीददार: क्या आ गया बाबा?


बाबा: शीतल, सुशीतल, वैदिक शरबत


ख़रीददार: इसकी ख़ास बात क्या है?


बाबा: इसे पीने से मन, शरीर...सब कुछ ठंडा हो जाता है। आत्मा भी। 


ख़रीददार: लौकी का जूस या गोधन अर्क तो नहीं पड़ा इसमें?


बाबा: अरे,नहीं भाई। यह गुलाब से बना है। ताज़ी, अक्षत गुलाब की कलियों से, जिन्हें देश को बरबाद करने वाला एक नेता शेरवानी में लगाता था। उसी की प्रिय कलियों को कूट पीस कर इसे तैयार किया गया है।


ख़रीददार: बाबा जी, इसमें रूह-ऊह तो नहीं पड़ी जिन्नातों की। 


बाबा: क्या कहते हो बेटा। जी ख़राब कर दिया। यह शुद्ध, सात्विक, स्वदेशी पेय है। इसमें रूह नहीं, आत्मा पड़ी है। मेरी। मरी हुई।


ख़रीददार: आपने अपनी आत्मा को मार डाला?


बाबा: बड़े उद्देश्य के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं।


ख़रीददार: क्या है आपका उद्देश्य?


बाबा: कल्याण।


ख़रीददार: किसका?


बाबा: यह भी कोई पूछने वाली बात है। बच्चा बच्चा जानता है। गूगल में सर्च कर लो। हजारों पेज मेरे कृतित्व से रंगे पड़े हैं। 


ख़रीददार: लेकिन बाबा यह बताइए कि आपने स्वदेशी ड्रिंक में गुलाब क्यों डाला। गुलाब तो विदेशी फूल है...


बाबा: कौन भकुआ कहता है विदेशी?


ख़रीददार: यह बात तो कोई भी वनस्पति शास्त्री बता देगा। आपके पास भी तो एक बॉटनिस्ट है। पूछिएगा कि गुलाब का नेटिव प्लेस कौन सा है। 


बाबा: तुम्हारी बातों में देशद्रोह की बदबू आ रही है। गुलाब शुद्ध भारतीय है। संस्कृत में इसे शतपत्री कहते हैं।


ख़रीददार: संस्कृत में तो शतदल भी होता है। यानी कमल। दल और पत्री में क्या फर्क?


बाबा: तुम बकवास कर रहे हो। संस्कृत में पाटल पुष्प शब्द भी है गुलाब के लिए।


ख़रीददार: छोड़ो बाबा। अब बोलूंगा तो ज्यादा हो जाएगा। आप समझ भी नहीं पाओगे।


बाबा: तू मेरा अपमान कर रहा है। ग्राहक न होता तो तुझे अष्टांग योग कराके समाधिस्थ कर देता।


ख़रीददार: मैं तो आपको भारतीय पेय बनाने के लिए प्रेरित कर रहा हूं। शरबत खुद विदेशी है। बाबर खरबूजों के साथ लाया था।


बाबा: तो मैं क्या बनाऊं?


ख़रीददार: सोमरस बनाइए न!


बाबा: बड़ा कठिन है..


ख़रीददार: तो लस्सी बनाइए...ठंडाई बनाइए। बस दिमाग़ का दही मत बनाइए।

बेतुकी बातें

 बेतुकी बातें: 12

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कौआ और कोयल

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कौआ: कांव  कांव कांव 


कोयल: बड़ा चहक रहे हो काकराज! कोई मोटा चूहा जीमने को मिल गया क्या?


कौआ: मैं शाकाहारी बन गया हूं..


कोयल: कब से?


कौआ: जब से मुझे गर्व हुआ


कोयल: किस बात का गर्व?


कौआ: अपने होने का।


कोयल: कौआ होने का?


कौआ: हां, कौआ होने का।


कोयल: इसमें गर्व की क्या बात है? इस धरती में कोई कौआ होता है तो कोई तोता। कोई गधा होता है तो कोई सुअर। कोई शेर तो कोई हिरन। किसी के पास ऐसा कोई ऑप्शन नहीं होता कि वह मुर्गी के अंडे से निकले कि बकरी के पेट से। आप जो होते हैं गर्भ से होते हैं।


कौआ: लेकिन मैं जो हूं गर्व से हूं।


कोयल: कुछ समझ में नहीं आ रहा। गर्व..गर्व..गर्व! मुझे समझाओ।


कौआ: तुम जानती हो कि मैं किसका वंशज हूं?


कोयल: मैं क्या जानूं! तुम ही बता दो। मैं तो अपने मा बाप को ही भूल चुकी हूं। 


कौआ: तो सुन, मैं काकभुशुण्डि का वंशज हूं। जानती हो वे कौन थे?


कोयल: क्यों नहीं जानती?  रामायण पढ़ी है मैंने। तभी तो मैं डाल-डाल फुदकते हुए राम का नाम ही लिया करती हूं। कोयलों की ज़बान में कुहूकुहू का मतलब राम राम ही होता है।


कौआ: मैं तो समझता था कि मिलन की बेताबी में तू कुहूकुहू बोलकर आशिक को बुलाती है?


कोयल: वाह रे राम भक्त काकभुशुण्डि के वंशज! तुझे हर बात में गंदगी ही दिखती है। बने फिरते हैं एक ऋषि के पोते। मुझे तो लगता है कि तू जयंत की संतान है।


कौआ: ये जयंत कौन?


कोयल: अरे पाखंडी, तूने रामायण नहीं पढ़ी क्या?  


कौआ: न भाई न। मैंने तो बस राम के नाम का उपयोग करना ही सीखा है।


कोयल: हद हो गई! जिस काकभुशुण्डि ने संसार को रामकथा दी उसकी संतान कहती है कि उसने रामायण नहीं पढ़ी!! 


कौआ: अब जो है तुम्हारे सामने है। जयंत के बारे में बता दो। 


कोयल: जयंत ने वन में सीता माता के पांव में चोंच मारी थी। ज्यादा जानना हो तो चित्रकूट में स्फटकशिला देख आना। या रामायण पढ़ लेना। वैसे यह तो बता कि तुझे यह कैसे पता चला कि तू काकभुशुण्डि की संतान है?


कौआ: आज ही सुबह एक चूहे ने बताया था। 


कोयल: मतलब तेरे शिकार ने? और तू उसे मारकर खा गया?


कौआ: अरे सुनो तो! हुआ यह कि सुबह मैं कूड़े घर के ऊपर भोजन की तलाश में मंडरा रहा था। जैसे ही एक लड़के ने चूहेदान को खोला मैं भयभीत नन्हे जीव पर झपट पड़ा। 


कोयल: फिर?


कौआ: मैं पंजे में छटपटाते चूहे की छाती में अपनी चोंच भोंकने ही वाला था कि वह चींचीं करने लगा।


कोयल: क्या?


कौआ: चींचीं करते हुए वह बोला: आप रामकथा मर्मज्ञ काकभुशुण्डि के कुल के हैं... मांसाहार करना आपको शोभा नहीं देता...ऋषि काकभुशुण्डि क्या मांसाहार कर सकते थे? 


कोयल: तुमने क्या कहा?


कौआ: मैंने चूहे से पूछा: तो मैं क्या खाऊं? चूहे ने फल खाने को कहा और मैं आम खाने तुम्हारे बगल में आ गया। 


कोयल: यार तुमको सबसे अधिक बुद्धिमान प्राणी माना जाता है। लेकिन एक अदना सा चूहा तुमको उल्लू बना गया! 


कौआ: मैं कुछ सोचने की हालत में नहीं हूं। बहुत भूख लगी है। कोई मीठा आम दिखे तो बताना।

Wednesday, April 9, 2025

Poem I always fought


They never lost

For they never fought 

I never won

But fought forever.


They eat donuts

And hazel nuts
I eat dry bread
I thank my God
I am very glad.

They are not bad
Yet they are sad.
Under the sky
I feel very light
I sleep very tight
Yes every night
They sleep underneath
A Banian tree
With the souls tethered
To the roots of the tree
They cry all night
Like Faustus did
When the Devil laughed
And Mephistopheles walked