Wednesday, November 9, 2022

ग़ज़ल

 जब पंजीरी उड़ रही हो देस में

क्या रखा है आदमी के भेस में

शशक नफ़रत के नशे में चूर हैं

और कछुए अग्रणी हैं रेस में

उसने अपने पांव ही कटवा लिए

खुला रहता था बदन उस खेस में

वो नहीं समझेंगे गाओ तुम भले

टेनर, बैरीटोन में या बेस में


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