Tuesday, November 15, 2022

गालियां-2

 @#*xi@#x!-2

______________


तो वादे के मुताबिक मैं हाज़िर हूं, गाली गाथा की दूसरी किस्त के साथ। लेकिन इसके पहले कि मैं अपने ऊपर लगे गाली देने के प्रकरण पर आऊं, मुझे एक लखनउआ साथी की आपत्ति का जवाब दे लेने दीजिए। इन भाई जान को दिक्कत यह थी कि मैंने गाली गाथा में नवाबी शहर को क्यों नज़रंदाज़ कर दिया। सॉरी ब्रो। आपको लगी ठेस जायज़ है। आपका शहर मेरे शहर से कतई कमतर नहीं। पर आपका अंदाज़ खफीफ सा अलग है। बस आप लोग गाली पाने सुपात्र के पहले 'आप' जोड़ देते हैं। दरअसल, इस तरह आप पहले टारगेट की इज़्ज़त बढ़ा देते हैं, ताकि उसे कायदे से नीचे गिरा सकें। 


अब आते हैं मुझ पर लगे आरोप पर। दरअसल, इसी कहानी को लिखने के लिए ही मैंने कलम उठाई थी। यह लेखन sombre नेचर का होना था। लेकिन दिमाग बहक गया और बात गाली गलौज़ तक चली गई।


इस सत्य कथा का शीर्षक है: जाने कहां गए वो लोग। कैसे लोग? वे लोग जो हिमालय जितने ऊंचे होते थे। अपने से छोटों से बदला लेने की कभी सोचते भी नहीं थे। ऐसा ही एक आदमी था। विद्वान, अत्यंत धनवान, बेहद इज्जतदार, सुदर्शन, गौरांग और छह फुटा। प्यार से हम कर्मचारियों ने उन्हें एक नाम दे रखा था। गंजा।

वे मेरे मालिक भी थे और संपादक भी। अखिल भारतीय ख्याति थी उनकी। लोग उनकी भृकुटि से भी डरते थे। मेरी बात और है। कुछ वैध कारणों मैं उन्हें पसंद नहीं करता था। दूसरी ओर उनका आशीर्वाद मुझ पर हमेशा बना रहा। 


तो हुआ यह कि एक शाम वे संपादकीय विभाग में आ गए। सन्नाटा छा गया। वे दिन की पाली के इंचार्ज के सामने खड़े हो गए। 


"कोई खास खबर, सक्सेना जी?"

"नो सर, कोई खास खबर नहीं।" इतना कह कर सक्सेना जी उनके सम्मान में कुर्सी छोड़ कर खड़े हो गए।


शिफ्ट इंचार्ज के खड़े होते ही वे तुरंत उस कुर्सी पर बैठ गए। पहले तो वे मेज़ पर रखे यूएनआई और पीटीआई के तार देखते रहे फिर उन्होंने रिजेक्टेड खबरों के लिए बने टब में हाथ डाल दिया।

फिर क्या था, शिफ्ट इंचार्ज की शामत आ गई। 

"अरे, तुमने यह टिंबकटू की इत्ती बड़ी खबर कूड़े में फेंक दी...और यह होनोलूलू में आई बाढ़ को क्यों छोड़ दिया"


इंचार्ज महोदय चुपचाप खरीखोटी सुनते रहे। यह डांट अनावश्यक थी। गलतियां होती हैं लेकिन उस दिन उनकी गलती नहीं थी। दरअसल, अखबार में जगह सीमित होती है और उसी के मुताबिक खबरें सिलेक्ट या रिजेक्ट करनी पड़ती हैं। कौन सी खबर किसी दिन जगह बना पाएगी या नहीं, यह फैसला सिर्फ वह शिफ्ट इंचार्ज ही कर सकता है। 


लेकिन मालिक सो मालिक!


रात की पाली का इंचार्ज मैं था। संपादकीय विभाग में घुसते ही मुझे दो घंटे पहले का यह विवरण मुझे आद्योपांत सुनाया गया। सहसा मेरा क्रोध भड़क गया और मैंने शिफ्ट इंचार्ज से कहा, "सारी गलती तुम्हारी है। क्यों सीट छोड़ कर खड़े हो गए थे...xxx xxx आए मेरी पाली में मैं सीट ही नहीं छोडूंगा। न वो तार देख पाएगा और न हड़का पाएगा।


इसके बाद मैं पहले पेज की तैयारी में लग गया और इस महत्वहीन घटना को भूल गया। लेकिन दफ्तर के कुछ बुड्ढों ने मेरा बयान दर्ज़ कर लिया था। वह मालिक तक पहुंच गया।


अगले दिन सुबह की पाली का इंचार्ज मैं था। जा कर सीट पर बैठा ही था कि साहब का चपरासी आ गया। चलिए, बुलावा आया है।


मैं कमरे में घुसा। मुझे देखते ही नीले सूट में दपदप करते इस सुदर्शन आदमी ने मुझे स्निग्घ दृष्टि से मुझे देखा और बोला, "बैठो...चाय पियोगे?"


"जी"

मेरे हां कहते ही उन्होंने चाय बनानी शुरू कर दी। बगल की मेज़ से खौलता पानी लिया। कप में डाला। फिर उसमें मिल्कपॉट से थोड़ा दूध डाला। 


"चीनी एक?" उन्होंने मुझसे पूछा।

"नहीं सर, चार क्यूब।"


मेरी बात पर उन्होंने जोरदार ठहाका लगाया।

मैं भी मुस्करा उठा। उन्होंने अपने हाथों से मुझे कप थमाया और साथ में मोनैको के कुछ बिस्किट भी।


हम दोनो चाय सिप करने लगे। सहसा एक सन्नाटा सा पसर गया, जिसे तोड़ते हुए वे हंस कर मेरी ओर मुखातिब हुए, "सुना है आप मुझे गालियां दिया करते हैं?"


"बिलकुल गलत बात, सर...ऐसा हो ही नहीं सकता।" मैं बिलकुल परेशान न था। मैंने अपने जीवन में अपने शत्रु को भी गाली नहीं दी थी। 


"याद कीजिए।"


"सर, क्या याद करूं मां बहन का नाम लेकर अश्लील गाली देने की मैं कल्पना ही नहीं कर सकता। वे शब्द बोलने में ही जबान लड़खड़ा जाएगी। मेरे संस्कार ही ऐसे नहीं हैं।"


मेरी बात सुनकर वे फिर मुस्कराने लगे। बोले, "अरे वो वाली गालियां नहीं।"


"फिर कैसी?"


"जैसे कि गंजा साला..."


मैं सन्न।


"क्या आपने कल यह नहीं कहा था...गंजा साला मेरी पाली में आकर तो दिखाए, मैं उसके लिए कुर्सी ही नहीं छोडूंगा!"


मेरी नजरें जमीन पर गड़ गईं। 


"अब बोलिए, इस तरह की गाली आप देते हैं या नहीं?" 


मैं उनके सम्मान में झूठ बोलना चाह रहा था। लेकिन बचपन में पिता तुल्य भइया को दिया वचन आड़े आ गया। वचन था अपनी रक्षा के लिए झूठ मत बोलना।(यह सच बात है। कभी भइया से लंबी भेंट कराऊंगा)


अतएव कलजुगी हरिश्चन्द्र ने कुबूल कर लिया, "जी, इस तरह की गाली तो मैं आपको दे देता हूं।"


उनका अगला सवाल और कठिन था। "ऐसा क्यों करते हैं आप!"


जवाब जुटाने में थोड़ा वक्त लगा। बहरहाल, मैने दिल की बात कह डाली, "सर, मालिक के नाते आप ऐसे काम भी कर डालते हैं, जो मुझे और साथियों को बहुत अखरते हैं। ऐसे में भड़ास तो निकलनी ही पड़ती है।"


मेरी बात पर वे हंसने लगे और उन्होंने जो बोला वह आज के इस युग में कोई भी सत्ताधारी नहीं कह पाएगा। उनका पूरा वाक्य मुझे अब तक याद है:


जब मुझ पर गुस्सा लगे मेरे कमरे में मेरे सामने जी भर कर गालियां दे लिया करो। सबके सामने नहीं।

उन्होंने मुझ पर संस्थान-द्रोह का आरोप कभी नहीं लगाया। मुझे कभी संपादक तो नहीं बनाया मगर कभी सजा भी नहीं दी।



No comments:

Post a Comment