Sunday, November 20, 2022

नशेबाज़-1

 नशेबाज़-1

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कोई कितना तनहा हो सकता है? उतना, जिसकी कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। मैं भी नहीं कर सकता था, अगर वह मुझको न मिला होता। उसे कोई स्नेह नहीं करता था। कोई भी नहीं। उसे शायद खुद से भी कोई लगाव न था। लेकिन वह पूरी तरह शून्य न था। मन के कोने में कुछ फोन नंबर पड़े थे। यादें थीं,  लेकिन इस आदमी को याद करने वाला कोई नहीं था।


वह मुझे रात ढाई बजे मिला। रात की पाली निपटा कर घर कानपुर सेंट्रल पर कैंट साइड स्थित मस्जिद के नीचे शकील की दुकान पर पान खा रहा था। साथ में थे मेरे मित्र Ramji Gupta । बीड़ा मुंह में डाला ही था कि वह आदमी दिखा। हाथ के इशारे से भीख मांग रहा था।

मैं शकील की दुकान से बाहर निकल आया।


उस पर नज़र डाली: लंबा, छह फुटा, पंजाबी शरीर। वज़न भी 90 किलो से ऊपर। लेकिन कंधे झुके हुए। छोटी छोटी आंखें। पलकें बोझिल। चेहरा सपाट। भावहीन। Wooden. शरीर पर एक ढीला ढाला नाइटसूट। चीकट।


"आओ" मैंने उससे कहा और पान की दुकान के बगल में चाय-समोसे की दुकान पर पड़ी बेन्च पर बैठ गया। मैंने उससे भी बैठने को कहा। लेकिन वह खड़ा ही रहा। आसमान टपक रहा था। लेकिन उसे ठंड नहीं लग रही थी।


"इसे दो समोसे और चाय दे दो" मैंने दुकानदार से कहा। दुकानदार हंसने लगा, "साहब, इसको चाय समोसा नहीं पैसा चाहिए। लतिहड़ है। इसे स्मैक चाहिए। चार दिन से टेशन पर ऐसे ही मंडरा रहा है। लोग पैसा दे भी देते हैं इसे।...कभी खाना खाता तो दिखाई भी नहीं पड़ता।"


मैंने इस युवक की तरफ सवालिया नज़र फेंकी। वह इनकार में सर हिलाने लगा, "ऐसा नहीं है, सर। मैं तो मुसीबत का मारा हूं। मैं भीख नहीं मांगता... डू आय लुक लाइक अ बेगर?"


"न, बिलकुल नहीं" मैंने दिल में अर्जित सारा प्रेम उड़ेलते हुए स्निग्ध स्वर में कहा, "तुम मुझे परेशान दिखते हो। बहुत बहुत परेशान।


मैंने उसके कांधे पर हाथ रखा और उसकी तरफ देखने लगा। उसकी आंखों में मेरे उड़ेले प्रेम का कोई असर नहीं था। छोटी छोटी आंखें वैसी ही ठंडी और सपाट थीं।


"तुम करते क्या हो ?" मैने पूछा।


"कुछ नहीं।"


"पहले क्या करते थे?"


"आयम अ ट्रेंड डॉक्टर, एन एमबीबीएस। दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में काम करता हूं।"


मैंने चौंक कर उसकी तरफ देखा। उसका चेहरा भावहीन था।


"यहां कैसे आ गए?"


"घर से भाग आया।"


"क्यों?"


"घर वाले मेरी शादी कराने पर आमादा थे।"


"तो! कर लेते शादी!! कहीं और शादी करना चाहते थे क्या...कोई गर्लफ्रेंड का चक्कर?"


"नो, सर। ऐसा कुछ नहीं...दरअसल..." वह मेरे एकदम पास आ गया और कान पर झुक कर खुसफुसाया, " एक्चुअली आयम इंपोटेंट!"


मेरे मन में करुणा उपजने लगी। लेकिन मुझे इस आदमी पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। 


"क्या बेवकूफों की बात करते हो डॉक्टर साहब" मैने कहा, "तुम खुद जानते हो कि मेडिसिन की फील्ड में आदमी ने कित्ती तरक्की की है। डॉक्टर कोठारी से मिल आते। अरे भाई कुछ न करते तो पैरेंट्स को बता देते। आदमी बिना शादी के भी मस्त जी सकता हैं।"


उसका जवाब था, "मेरी मां मर चुकी हैं।"


"तो, पिता जी से कहते..."


"वो बड़े आदमी हैं। बहुत बड़े जज हैं। उनसे मेरी बात नहीं होती।"


"तो भाई से कहते...बहन बहनोई से कहते..."


"भाई फौज़ में अफसर था। शहीद हो गया। बहन कोई है ही नहीं।"


मेरे हर सवाल का जवाब था उसके पास। ठंडा और निष्ठुर। मेरे पास अब सवाल न थे। वह मुझे चुपचाप देख रहा था। उसने चाय पी ली थी। लेकिन दोनों समोसे वैसे ही प्लेट में पड़े थे।


सहसा मुझे कुछ सूझा। मैंने उससे कहा, "अपने अस्पताल के किसी डॉक्टर या मित्र का फोन नंबर दो।"


उसने तुरंत दिल्ली के एक बहुत बड़े प्राइवेट अस्पताल का नंबर दे दिया। मैंने तुरंत फ़ोन लगा दिया। उसका साथी दिल्ली में ही था। मैंने जैसे ही इस शख्स का नाम लिया वह गालियां बकने लगा। नशेबाज, शराबी, चरसी, स्मैकिया... जंकी। 


"बस इतना बता दीजिए कि क्या xxx आपके साथ काम करते हैं" मैंने गुज़ारिश की।


"है नहीं, करता था। छह महीने पहले निकाल दिया गया। दिन रात नशे में रहता था। मेरा दोस्त था। मेरी भी बदनामी होने लगी। एक दिन डायरेक्टर ने इसे नशे की हालत में पकड़ लिया और तुरंत निकाल दिया।"


"क्या इसकी शादी होने वाली थी?"


"इससे शादी कौन करेगा? कौन अपनी बेटी देगा इसे!मेरी जानकारी में शादी की कोई बात नहीं चल रही थी। हां, एक गर्लफ्रेंड की बात जरूर किया करता था, जिससे इसका ब्रेकअप हो गया था, कुछ साल पहले।"


"ओके " मैंने कहा, "यह यहां कानपुर में भटक रहा है। क्या करूं? दिल्ली की ट्रेन में बिठा दूं?"


"इसे वहीं गंगा में धक्का दे दो। और दोबारा मुझे फोन न करना।" उसने फोन काट दिया।


मैने एक लंबी सांस भरी और इस एमबीबीएस डॉक्टर को देखने लगा। इस बार उसकी आंखों में थोड़ी चमक दिखी।


 "क्या बोला उसने" उसने पूछा।

मैने जवाब देने की बजाय उसके पिता का नंबर मांग लिया।


यह नंबर भी उसे याद था। मैंने मिलाया। दूर चंडीगढ़ में जज साहब ने कुछ देर बाद ब्राह्म मुहूर्त की मेरी कॉल उठा ली।

जैसे ही मैंने उनसे उनके पुत्र के बारे में बोलना शुरू किया उन्होंने बड़ी ही गंभीरता से कहा, "मेरा एक पुत्र शहीद हो गया। तुम मेरा एक काम कर दो। इस कमीने को गोली मार दो। जब यह मर जाए तब फोन करना। मैं भरपूर इनाम दूंगा।


इतना कह कर उन्होंने भी फोन काट दिया।


मेरा कनपुरिया दिमाग़ अब भी शांत न हुआ। ससुरी कहानी का एंड ही नहीं मिल रहा था। अचानक एक जीआरपी के दरोगा जी दिख गए। मैंने तुरंत उनकी मदद मांगी, "दरोगा जी, इस लाश को दिल्ली जाती किसी ट्रेन में रखवा दीजिएगा।"


कहानी का समापन करके मैं चल दिया। पर क्या मुझे उस एमबीबीएस डॉक्टर को 'लाश' कहना चाहिए था?यह सवाल पाठकों से मैं कर रहा हूं। क्या यह आदमी इस समाज की उत्पत्ति नहीं। क्या इस आदमी को rehab में नहीं डाला जा सकता था। जब संजय दत्त की नशेबाजी छूट सकती थी, तो इसकी क्यों नहीं?


शायद किसी को इस brilliant युवक की परवाह ही नहीं थी। हमारे समाज में ऐसे instruments क्यों नहीं? सोचिए और बताइए।

इंतज़ार कर रहा हूं।

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