लावण्या: बेंगलुरु -2
+++++++++++++
बेंगलुरु से कानपुर लौट रहा हूं। ट्रेन गोरखपुर जा रही है। एक कन्नडिगा और एक तेलुगु फैमिली के अलावा डिब्बे में पूर्वांचल की भरमार है। अनेक सहयात्री बेंगलुरु में राज मिस्त्री या ऐसा ही कोई काम करते हैं। ये भी एसी कोच में यात्रा कर रहे हैं। है न खुशी की बात? बेंगलुरु बहुत फला है इन्हें। गुड।
बड़ा शोर है। भोजपुरी की भरमार है। मैंने गोरखपुर और पटना का नमक खाया है। मैं उनकी बातें समझ सकता हूं। ....
.... "ये कन्नड़ वाले बहुत बुरे हैं। " एक देवरिया वाला एक गोरखपुरिया से कह रहा है। (मैंने कर्नाटक के सम्मान में 'बुरा' शब्द लिखा है। सहयात्री ने जिस विशेषण का इस्तेमाल किया, उसकी आप कल्पना कर सकते हैं।)
"सही कह रहे हो। एक दिन मैं तुमकुर से माल लेकर बंगलौर आया था " दूसरा सहयात्री समर्थन में उदाहरण देता है, "माल उतारते वक्त वे सेठ के कर्मचारी कन्नड़ में बोलने लगे। मैं हिन्दी बोलने लगा तो मुझे उन लोगों ने जमकर हड़काया। बोले कर्नाटक में कमाओगे और कन्नड़ नहीं सीखोगे...यह तो नहीं चलेगा।"
मेरी नज़र कन्नडिगा सहयात्री पर पड़ी। वह मुस्कुरा रहा था। लेकिन मैं नहीं मुस्करा पाया। "तो कन्नड़ सीख लो न।" मेरे मुंह से निकल पड़ा।
उसने मुझे घूरा, मानो मैंने कोई राष्ट्रद्रोह कर दिया हो।"मैं क्यों सीखूं! वे हिन्दी क्यों नहीं सीखते? हिन्दी तो राष्ट्रभाषा है।"
मैं राष्ट्र और राष्ट्रभाषा का विरोध नहीं कर सकता। सो मैंने कहा, "एसी का किराया तो बहुत ज्यादा होता है?"
"किराया तो मालिक देता है। साल में एक बार घर जाने का। पेड लीव, छुट्टी के साथ।"
"अच्छा! मालिक तो बहुत बढ़िया है! क्या कन्नड़ नहीं है वो?"
जवाब में उसने एक पल मुझे घूरा और जोर देकर बोला, "नहीं।"
"तो क्या कोई यूपी, एमपी वाला है?" सहसा मुझे अरविंद अडिग की कहानी वाइट टाइगर याद आने लगी।
"नहीं, मेरा मालिक तमिल है।"
इस बातचीत ने मुझे चलती ट्रेन में लिखने को मजबूर कर दिया। मैं खिड़की से बाहर खूबसूरत द्रविड़ क्षेत्र के नज़ारे करने लगा। एक महिला खेत पर काम कर रही है। सांवली और खूबसूरत। (जी, मुझे सुंदरता बहुत दूर से दिख जाती है)
....और, उस मेहनतकश को देखकर मुझे लावण्या की याद आ गई। मुझे बेंगलुरु के केआर मार्केट में मिली थी। धनतेरस की रात।
दिवाली की सामग्री, सब्जी और फलों से भरे दो भारी भरकम झोले थे मेरे हाथ में। थक चुका था और बाज़ार से बाहर निकल ही रहा था कि पत्नी चौंक कर बोलीं, अरे रोली तो लेना भूल ही गए!
"मैं अब कहीं न जाऊंगा" मैंने कहा, "मैं सुबह चूना ले आऊंगा। हल्दी मिलाके रोली बना लेना।"
वे न मानी और मुझे वहीं रुकने को कहकर रोली लेने चली गईं।
मेरे हाथ बहुत थक चुके थे। मैं झोले रखने की जगह देखने लगा क्योंकि जमीन में कीचड़ था। तभी मुझे कानों में बिहारी एक्सेंट की हिन्दी सुनाई दी। उधर देखा तो तख्त पर केले और मौसमी बेचता एक युवक मिला।
"मैं झोले यहां रख लूं?" मैने तख्त पर बची खाली जगह पर झोले रखते हुए पूछा।
"अरे, इसमें पूछना क्या भइया, रख लो।"
फल वाला सहरसा का था। मैं चूंकि भागलपुर रह चुका हूं तो रिश्ता बनने में देर न लगी और हम अश्विनी चौबे और अजीत सिंह जैसी स्थानीय बातचीत करने लगे।
तभी बगल में धनिया और मिर्चा बेच रही एक कृशकाय वृद्धा ने इस बिहारी से ज़ोर से आवाज लगा कर कुछ पूछा। मुझे सिर्फ एक शब्द समझ में आया: समयम्।
बिहारी ने उतनी ही ज़ोर से कहा, "माई सात बजा बा।"
वृद्धा कुछ समझ न सकी और झुंझलाने लगी। तभी बिहारी के बगल में सूखे मेवे बेच रही महिला खिलखिला कर हंसने लगी। वह ज़ोर से ऐसा कुछ बोली, समयम एर मनी, अम्मा।
अम्मा उसे असीसने लगीं। इस बीच वह महिला एक दढ़ियल अनीस भाई के सलाम पर वालेकुम अस्सलाम कह कर उनसे बतियाने लगी। फिर वह एक कन्नड़ भाषी ग्राहक से उसकी जबान में बात करने लगी।
मैं चमत्कृत होकर उसे निहार रहा था। मैं उसे एकटक निहार रहा था। उसके चेहरे पर मुस्कान लगातार खेल रही थी। बीच बीच में दांत खोल कर हंसने लगती। मुझे वह सुरभि वाली रेणुका शहाणे की याद दिला रही थी।
सहसा उसने मेरी ओर देखा और आंखों आंखों से बोली, क्या?"
"तुम्हें कितनी भाषाएं आती हैं?" मैंने पूछा।
"हिंदी, कन्नड़, तेलुगु और मलयालम..."
"बहुत बढ़िया" मैने खुशी जताते हुए हाथ से थम्स अप किया।
जवाब में एक मोहक मुस्कान के साथ जवाबी थम्स अप करते हुए वह बोली, "आय कैन स्पीक इंग्लिश ऐज़ वेल।"
"कहां की रहने वाली हो?"
"यहीं बेंगलुरु की।"
मेरा मतलब जन्म स्थान कहां है?
"यही बेंगलुरु।"
"पुरखे कहां के हैं?"
"महाराष्ट्र के। हम वहां के राजपूत हैं"
"कितना पढ़ी लिखी हो?"
"नाइंथ क्लास तक।"
"क्या नाम है?"
"लावण्या।"
तब तक पत्नी रोली खरीद कर लौट आईं।
मैं फिर आऊंगा। यह कहकर मैं चल दिया।
मैं उससे दोबारा न मिल सका। अचानक कानपुर लौटना पड़ रहा है।
लेकिन मैं लौटूंगा और लावण्या से बातचीत कर फिर उसकी कहानी लिखूंगा।
उसकी कहानी में कई कोण हैं। इनमे दो प्रमुख हैं: तमाम अवरोधों के बावजूद उभरता इंक्लूसिव भारत। दूसरा है एक बेहद प्रतिभावान लड़की का फुटपाथ पर मेवे बेचना।
मैं सोचता हूं कि महाराष्ट्र की होने के बावजूद उसने अपनी भाषाओं में मराठी को क्यों नहीं जोड़ा। क्या परिवार के कर्नाटक प्रवास के दौरान परिवार मराठी भूल चुका है। दोबारा मिला तो पूछूंगा। दरअसल, परदेस में रहने वाले लोगों में एक यह प्रजाति भी मिलने लगी है जो अपनी मातृभाषा भूल चुके हैं। कुछ बंगालियों और मलयालियो को मैं निजी तौर पर जानता हूं जो अपनी मातृभाषा नहीं जानते। और, उन्हें इसका अफसोस भी नहीं। न कोई गिल्टी फीलिंग। हां हिन्दी इन सबको आती है। हिंदी भाषी इस बात पर गर्व कर सकते हैं और किसी दूसरी भाषा न सीखने का प्रण कर सकते हैं।
बोलो हिन्दी मइया की जय।
No comments:
Post a Comment