Tuesday, November 8, 2022

उर्दू दिवस

 उर्दू दिवस

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मुझे नस्तालीक (उर्दू वाली) लिपि नहीं आती। लेकिन, अगर मैं रोज़ाना की बातचीत में जानबूझ कर क्लिष्ट यानी कठिन शब्द न बोलूं तो वे उर्दू बोलने वाले जो देवनागरी नहीं जानते, यही मानते हैं कि मैं उर्दू बोल रहा हूं। 

पाकिस्तान वालों की तो बात छोड़िए, कभी मेरा एक रिपोर्टर था मज़ारे शरीफ (अफगानिस्तान) में, उसके साथ मैं स्काइप के ज़रिए मज़े में बातचीत किया करता था। और, तो और, अगर कोई हिन्दी बोलने वाला ईरान के प्रांत बलूचिस्तान पहुंच जाए तो वहां भी उसे भाषा की कोई दिक्कत नहीं महसूस होगी।

यह है उर्दू अथवा हिन्दी की रीच। मेरी नज़र में दोनों ज़बानें एक हैं। लिपियां भाषा नहीं होती। होतीं तो मराठी और हिन्दी एक भाषाएं एक होतीं। आज रोमन में हिन्दी खूब लिखी जाती है क्या वह एक अलग भाषा हो गई? भाषा निर्धारित होती है verbs से। कथित उर्दू की सारी क्रियाएं संस्कृत से निकली हैं। सारा पाकिस्तान भले ही खुद को अरबों से जोड़ने में लगा हो लेकिन उसका खाना, पीना, हंसना, जीना या मरना संस्कृत धातुओं से बनी verbs से ही होता है।

तकनीकी तौर पर मैं उर्दू, अरबी और फ़ारसी नहीं जानता। लेकिन मेरी भाषा में इन ज़बानों के अलावा तुर्की और पोर्चगीज शब्द शामिल हैं। एक बार मैंने एक इतालवी व्यक्ति की लैंग्वेज लर्निंग साइट के लिए एक कहानी का अंग्रेजी से हिन्दी में ट्रांसलेशन किया था। ट्रांसलेशन देवनागरी में नहीं रोमन में किया था। उच्चारण के लिए phonetic signs का इस्तेमाल करते हुए। उस इतालवी ने मेरा ट्रांसलेशन देख कर मेल किया। पूछा: क्या यही हिन्दी है। इसमें तो लगभग 50 फीसदी शब्द अरबी और फारसी के हैं। उस इतालवी को दरअसल अरबी और फारसी आती थी।

सच तो यह है कि आज उर्दू/हिन्दी यानी हिंदुस्तानी ज़बान अगर साउथ की कुछ ग्रामीण पॉकेट्स को छोड़ दें तो वह पूरे हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बोली और समझी जाती है। काश, हमारी लिपि एक होती!

अगर हो जाती तो उत्तर की सारी भाषाएं एक दूसरे को assimilate करना शुरू कर देंगी और क्या पता कालांतर में एक नई inclusive भाषा उभर आए।  दक्षिण की भाषाएं थोड़ा भिन्न हैं। लेकिन एक लिपि होने के बाद उनके साथ भी आदान प्रदान शुरू हो जाएगा।

लेकिन कोई अपनी लिपि क्यों छोड़े? इसके लिए पहले अहंकार छोड़ना होगा। 

चलिए झगड़ा छोड़ते हैं और परदेसी स्क्रिप्ट रोमन अपना लेते हैं। यह बात नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने भी सुझाई थी। जी, phonetic signs का इस्तेमाल कर कठिन से कठिन शब्द रोमन में लिखे जा सकते हैं। S के ऊपर नुक्ता लगा दो तो हो गया श और नीचे लगा दो तो बन गया ष।

इसी बात पर लगाइए तो जयकारा

बोलो, हिंदुस्तानी भाषा की जय।


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