Monday, November 14, 2022

गालियां

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बनारस गलियों का शहर है। मेरा कानपुर गालियों का शहर है। गालियां इन दिनों चर्चा में हैं। गालियों का सम्मान, कानपुर का सम्मान है। कानपुर गदगद है। 


गालियां अनंत काल से बोली जा रही हैं। अब वे तोली भी जा रही हैं। पर कैसे? कनपुरिया इसी बात से हैरान और परेशान हैं। वे तीन दिन से उस तराज़ू की तलाश में मारे मारे फिर रहे हैं, जिस पर वे अपने उत्पादन को तोल सकें। अब तक असफल हैं। मायूसी में अंदाज़ से ही काम चला रहे हैं। लेकिन, यहां किलो दो किलो वाला कोई नहीं। टन-दो टन से नीचे कोई नहीं। उच्चतम तो मेगा, गीगा और टेट्रा टन तक जाता है।


आपको शायद ये वजनदार बातें कनपुरिया लंतरानी लग रही हों। यकीन कीजिए, हो सकता है तराज़ू मिल जाए तो कोई टेट्रा के ऊपर भी निकल जाए। यहां बाप अपने पुत्र को मां की गाली देते मिल जाते हैं और पुत्र बाप को मां की गाली देते। वह भी बिना किसी बैर भाव के। कुछ तो ऐसे भी मिल जाएंगे जो लड़ाई झगडे में अगले को अर्दब में लेने के लिए खुद को गाली देते मिल जाते हैं...मुझसे न उलझना ...पता कर लो मुहल्ले में कि मैं कितना बड़ा xxxx हूं।

एक साथी था। बज्जर कनपुरिया। मुरहा। दफ्तर में बैठते ही गालियां देने लगता। किसी एक को अदावत में नहीं बल्कि सबको। प्रेमवश। चार शब्दों के वाक्य में भी एक गाली होना सामान्य भाषा थी उसकी। निर्जीव वस्तुएं भी उसके इस प्रेम से महरूम नहीं रहती थीं। मसलन, कंप्यूटर हैंग हो गया तो xxx हैंग हो गया। अखबार की दुनिया में सीनियर साथी चिंता में रहते थे कि कहीं वह खबर में कुछ न लिख दे। यह साथी बाद में बड़े बड़े पदों पर काबिज़ हुआ। उसकी गालियों का डंका दिल्ली तक बजा। टीवी तक पहुंचा। हालांकि किसी ने उसको स्क्रीन पर प्रस्तुत करने का साहस नहीं दिखाया।


उन दिनों एक विज्ञापन खूब आता था: 'दाग अच्छे हैं'। एक संपादक इसी तर्ज़ पर कहा करते थे, गालियां अच्छी हैं। उन्होंने गुरुमंत्र मुझको दे दिया कि कनिष्ठों की गालियां मिलने का अर्थ है कि तुम बढ़िया काम कर रहे हो। लेकिन, वे अपने कनिष्ठों को कभी गाली नहीं देते थे। उनकी जद में आते थे वरिष्ठ। सुना है कि एक बार एक बड़ी मीटिंग में उनके सुप्रीमो जैसे ही एक मिनट के लिए लघुशंका निवारण के लिए निकले। कनपुरिया मन का गरिहा कोना जाग उठा। उनके ओंठ हिले और उन्होंने तमाम मातहतों का दिलखुश करते हुए यह कह डाला: यार, यह तुम्हारा बॉस भी बहुतैxxx है। दबे कुचले कर्मचारियों ने खुश होकर ताली बजा दी। लेकिन एक एलआईयू पत्रकार ने स्टिंग कर दिया। दो दिन बाद बॉस ने उनको दरवाज़ा दिखा दिया। उन्होंने बहुत समझाया...बॉस हमारे कानपुर में यह सब प्यार में कहा जाता है। लेकिन, दूसरे शहर में पला बढ़ा अनकल्चर्ड बॉस कानपुर के कल्चर को एप्रिशिएट करने में नाकाम रहा।

तौ भइया अइस है हमार कानपुर। बिंदास। लेकिन यहां इस कलम घसीटू जैसे लोग भी हैं जो गाली दे ही नहीं पाते। ये लोग अमूमन संपादक भी नहीं बन पाते। मज़े की बात यह कि मुझ निरामिष पर एक दिन एक बहुत बड़े संपादक कम मालिक ने गाली देने का आरोप लगा दिया था...सुना है आप मुझे गाली दिया करते हैं। तब क्या हुआ, पढ़िए कल।



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