नशेबाज़-2 (किस्सा गेंदा सिंह का)
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चौधरी गेंदा सिंह...
अगर चौधरी टाइटल पर आपको आपत्ति हो तो ठाकुर समझ लीजिए या रायबहादुर अथवा कुछ और। सरनेम भी सिंह की जगह सक्सेना कर सकते हैं या कुरेशी अथवा वाजपेयी। हां भई हां, शुक्ल भी। मुझे कोई आपत्ति नहीं। मेरा मक़सद आपका मनोरंजन है। वही: एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट।
तो ऊ ला ला, ऊ ला ला के मंत्र के साथ बिस्मिल्ला करते हैं। आपत्ति है? चलिए, तो श्री गणेश कर लेते हैं। अब खुश?
हां, तो मैं कह रहा था...गेंदा भाई। दरम्यानी कद। उम्र कोई 55 के आसपास। लेकिन इस कच्ची उम्र में ही बाल और दाढ़ी शफ्फाक, सफ़ेद। फिर आपत्ति? चलिए, श्वेत कह देता हूं। जैसा कि बताया नाम तो गेंदा ही था लेकिन ट्रिपल ज़ीरो जर्दे वाले पान के कारण उनके मुंह से ज़ाफ़रान गमका करता था। कभी कभी फर्मेंटेड अंगूर भी महकने लगते थे।
मुझसे पहली मुलाकात के वक्त उनके मुंह से दोनों खुशबूएं निसृत होकर नोएडा के प्रदूषित वातावरण को पवित्र कर रही थीं। हमपेशा थे वे। सहाफ़ी। मुझसे दसेक साल सीनियर। लेकिन कभी साथ काम न किया था।
किसी काम से दिल्ली गया था। शाम को खाली हो गया तो साथियों से मिलने एक बड़े अखबार के दफ्तर नोएडा चला गया। सुबह की किसी ट्रेन से कानपुर लौटना था। ढाई बजे सब साथी फारिग हो गए। मुझे नई दिल्ली स्टेशन जा रही एक कार में बिठाया गया। कार चलने ही वाली थी कि एक साथी अचानक आए और बोले, "यार, अपने साथ गेंदा भइया को भी कानपुर लिए जाओ।"
एक से भले दो। मैने सोचा और गेंदा जी को कहा, "वेलकम।"
वे भीतर घुस आए। उन्होंने एक भारी भरकम ट्रेंच कोट पहन रखा था। जैसा कि मैंने बताया, वे सुवासित थे।
हेलो।"
उनकी आवाज़ अमिताभ बच्चाना बैरिटोन थी। खुशबू के बावजूद कोई लरज नहीं थी। मुझे अच्छा लगा।
हम दोनों कंपू यानी कानपुर की बातें करने लगे। अब बोलने में स्लर आने लगा था। अंग्रेजी शब्दों की मात्रा भी बढ़ती जा रही थी। कुछ क्षणों की खामोशी के बाद वे फुल ऑन अंग्रेजी पर उतर आए।
"इ' वज़ अ हेssssक्टिक डेssss"
सहसा उन्होंने अपने ओवरकोट की गहरी जेब में हाथ डाला और एक क्वार्टर निकाल ली।
"लेंगे" उन्होंने मुझे ऑफर की।
"नो, थैंक यू।"
मेरे मना करने पर उन्होंने ढट्ठी खोलकर बोतल मुंह में लगा ली।
"अरे अरे अरे, नीट पी लेंगे क्या?"
"नईं अज्जू बेटा, नईं" दारू ने उन्हें पहली मुलाकात में ही बेतकल्लुफ कर दिया था, "पहले से पानी मिला कर रखी थी। देसी थोड़ी है। विलायती है असली।...अभी पांच क्वार्टर और हैं... फुल तैयारी करके चलता हूं।"
कार अभी दल्लूपुरा भी नहीं पार कर पाई थी और एक ड्रिंक अंदर जा चुका था। गेंदा भाई की अंग्रेजी क्या अब हिंदी भी पल्ले नहीं पड़ रही थी। तिस पर खौफ यह कि पांच बोतलें उनकी जेब में पड़ी थीं। सबसे बड़ी परेशानी यह कि ट्रेन में मेरा कोई आरक्षण न था। और, न ही उनका।
उधर, गेंदा भाई को कोई परेशानी न थी। वे नोएडा खत्म होते होते दो क्वार्टर और अंदर कर चुके थे और समाचार अपार्टमेंट्स तक उनकी जेब में बस एक बोतल बची थी।
"गेंदा भाई" मैंने उन्हें जोर से हिलाया, "इस हालत में यात्रा कैसे होगी?"
"डोन वई, मैं हूं न" वे बमुश्किल अपनी बात कह पा रहे थे, "अये बो टीसी ऐ न, चेला ऐ मेया... सsssब बंदोsss..."
उनके मुंह से बस्त निकल ही नहीं पाया। वे ढेर हो चुके थे। जीवन का एकमात्र चिह्न उनकी सांस ही बची थी। बदबूदार।
नई दिल्ली स्टेशन आ गया था। मैंने उन्हें माल असबाब की तरह कंधे पर लाद कर कार से बाहर उतारा। पटकने की जरूरत न थी। वे स्वयमेव सड़क पर बिखर गए।
मैं सर्द, बेदिल दिल्ली की सड़क पर हताश खड़ा था। बगल में गमकता गेंदा पड़ा था। अंग्रेजी में कहूं तो मैं विट्स एंड पर था। लेकिन इस विकट स्थिति में भी मेरे कवि हृदय से एक तुकबंदी बह निकली...जीवन की सबसे बड़ी भूल, चुन लिया गेंदा डैमफूल। अपने कवित्व पर मैं मुस्करा उठा और खुद की पीठ ठोककर कर्तव्य मार्ग पर चल पड़ा।
मैंने पानी की छींटें मारकर मुरझाए गेंदा को खिलाने का प्रयास किया। उसकी आंख की पंखुड़ियां खुली। मैने गेंदा को उठाने का प्रयास किया। सहसा गेंदा भइया सन्निपाती मरीज़ की तरह एक झटके में उकड़ू बैठ गए और अल्लबल्ल बोलने लगे। वे दरअसल मुझे पहचान नही पा रहे थे और समझ रहे थे कि मैं कोई लुटेरा हूं। उनकी अगड़म बगड़म का अनुवाद यह था ...खबरदार, मुझे हाथ मत लगाना। मुझ कनपुरिया को लूटोगे ...एक एक दिल्ली वाले की मां xxx दूंगा। यहां का पुलिस कमिश्नर भी जेब में पड़ा रहता है मेरी।
दरहकीकत उनकी जेब में सिर्फ एक दारू की बोतल पड़ी थी और पेट में चार।
बमुश्किल तमाम मैं उनकी याददाश्त वापस ला पाया। लेकिन होश और पावों की ताकत वापस लाना मेरे बस में न था। मैंने एक कुली बुलाया। कुली सामान ढोते हैं। जिंदा या मुर्दा मांस नहीं। उसने मना कर दिया। आखिरकार एक कुली गेंदा जी को कंधा देने को राजी हो गया। बैसाखी की तरह। सो, एक बैसाखी कुली बना और दूसरा मैं। हम दोनों गेंदा को कढ़ील कर ले चले। नॉर्थ ईस्ट एक्सप्रेस पहले ही प्लेटफार्म पर लगी मिल गई। ट्रेन छूटने में एक घंटा बाकी था। सभी डिब्बे लगभग खाली थे।
कुली बोला, "कहां धर दूं?"
"किसी जनरल डिब्बे में।"
मैं जानता था कि आरक्षित डिब्बे में दाल नहीं गलेगी। कुली ने गेंदा को एक खाली बर्थ पर लुढ़का दिया।
गेंदा जी का दुर्भाग्य। वह डिब्बा फौजियों का था। थोड़ी देर में फ़ौजी आने लगे। अब आप तो जानते ही हैं कि फ़ौजी भले ही हमारे लिए जान देते रहते हैं, लेकिन अपने डिब्बे में बैठे किसी सिविलियन के साथ वे पाकिस्तानी घुसपैठिए की तरह पेश आते हैं। उन्होंने आते ही गेंदा जी को रौंद दिया। गेंदा जी ने बहुत समझाया कि उन्होंने आर्मी कैंटीन वाली दारू पी है। लेकिन वीर जवानों का दिल न पसीजा।
मैं गेंदा जी को सम्हाले दूसरी जगह तलाशने लगा। अब कहीं कोई सीट खाली न थी। आखिरकार भइयों के लिए रिजर्व्ड जनरल डिब्बे में स्थान मिला। फुटबॉर्ड के पास, फर्श पर। संडास के बगल में।
सौभाग्य से संडास गंदा था। दरवाजा बंद होने के बावजूद भभका मार रहा था। गेंदा जी से निकल रही महक दब चुकी थी।
गेंदा जी दूसरे दरवाजे की तरफ अपने ओवरकोट के साथ लेट गए। थोड़ी देर में डिब्बा खचाखच भर गया।
ट्रेन चल दी। कोई दिक्कत नहीं। भभके को भभका काट रहा था। गेंदा जी कुछ देर में खर्राटे भरने लगे।
खर्राटे टूटे तब जब ट्रेन अलीगढ़ पहुंची। इस बार प्लेटफार्म उसी तरफ था जिस तरफ का दरवाज़ा बोल्ट करके गेंदा जी अंटागुड़गुड़ थे। अंदर आने वाले मुसाफिर दरवाज़ा पीटने लगे। गेंदा जी की नींद में खलल पड़ी तो उनका कनपुरिया जाग गया। उनके मुखारविंद से गालियों का अजस्र झरना बहने लगा।
आखिरकार ट्रेन चल दी। थोड़ी ही देर में दूसरे दरवाजे से चढ़कर आए अलीगढ़िया गेंदा जी के सामने थे। वे ब्रजभाषा में गालियां दे रहे थे। कनपुरिया शेर का नशा घट गया। वह दो टांगों के बीच में दुम दबाने लगा। उसके ऊपर लात जूते पड़ने ही वाले थे कि इस गरीब ब्राह्मण की बुद्धि का बल्ब चाचा चौधरी की तरह भक्क से जल उठा। मैं पूरी ताकत से दहाड़ा, "मितरो, खबरदार। उसके पास भी नहीं जाना। उसे कुत्ते ने काटा था। रेबीज़ फैल चुका है, उसके शरीर में। वह पागल हो चुका है। थूक भी देगा तो मर जाओगे।"
हमलावर भीड़ के पांवों में ब्रेक लग गए। मैं बोलता गया, देखो ना, खुद मैं कितनी दूर खड़ा हूं। सगा भाई है मेरा। सगा भाई!"
हमलावर चले गए। गेंदा जी फिर सो गए। करीब 11 बजे ट्रेन कानपुर सेंट्रल पहुंची। मैंने गेंदा जी को जगाया। वो अंगड़ाई लेते हुए मुस्कराए। बोले, "अरे, इत्ती जल्दी कानपुर आ गया। तुम्हारे साथ सफर में मजा आ गया।"
मैने कहा, "जी।"