Monday, November 21, 2022

नशेबाज-2(किस्सा गेंदा सिंह का)

 नशेबाज़-2 (किस्सा गेंदा सिंह का)

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चौधरी गेंदा सिंह...

अगर चौधरी टाइटल पर आपको आपत्ति हो तो ठाकुर समझ लीजिए या रायबहादुर अथवा कुछ और। सरनेम भी सिंह की जगह सक्सेना कर सकते हैं या कुरेशी अथवा वाजपेयी। हां भई हां, शुक्ल भी। मुझे कोई आपत्ति नहीं। मेरा मक़सद आपका मनोरंजन है। वही: एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट।

तो ऊ ला ला, ऊ ला ला के मंत्र के साथ बिस्मिल्ला करते हैं। आपत्ति है? चलिए, तो श्री गणेश कर लेते हैं। अब खुश?


हां, तो मैं कह रहा था...गेंदा भाई। दरम्यानी कद। उम्र कोई 55 के आसपास। लेकिन इस कच्ची उम्र में ही बाल और दाढ़ी शफ्फाक, सफ़ेद। फिर आपत्ति? चलिए, श्वेत कह देता हूं। जैसा कि बताया नाम तो गेंदा ही था लेकिन ट्रिपल ज़ीरो जर्दे वाले पान के कारण उनके मुंह से ज़ाफ़रान  गमका करता था। कभी कभी फर्मेंटेड अंगूर भी महकने लगते थे।


मुझसे पहली मुलाकात के वक्त उनके मुंह से दोनों खुशबूएं निसृत होकर नोएडा के प्रदूषित वातावरण को पवित्र कर रही थीं।  हमपेशा थे वे। सहाफ़ी। मुझसे दसेक साल सीनियर। लेकिन कभी साथ काम न किया था। 


किसी काम से दिल्ली गया था। शाम को खाली हो गया तो साथियों से मिलने एक बड़े अखबार के दफ्तर नोएडा चला गया। सुबह की किसी ट्रेन से कानपुर लौटना था। ढाई बजे सब साथी फारिग हो गए। मुझे नई दिल्ली स्टेशन जा रही एक कार में बिठाया गया। कार चलने ही वाली थी कि एक साथी अचानक आए और बोले, "यार, अपने साथ गेंदा भइया को भी कानपुर लिए जाओ।"


एक से भले दो। मैने सोचा और गेंदा जी को कहा, "वेलकम।" 


 वे भीतर घुस आए। उन्होंने एक भारी भरकम ट्रेंच कोट पहन रखा था। जैसा कि मैंने बताया, वे सुवासित थे।


हेलो।"


उनकी आवाज़ अमिताभ बच्चाना बैरिटोन थी। खुशबू के बावजूद कोई लरज नहीं थी। मुझे अच्छा लगा। 


हम दोनों कंपू यानी कानपुर की बातें करने लगे। अब बोलने में स्लर आने लगा था। अंग्रेजी शब्दों की मात्रा भी बढ़ती जा रही थी। कुछ क्षणों की खामोशी के बाद वे फुल ऑन अंग्रेजी पर उतर आए।


"इ' वज़ अ हेssssक्टिक डेssss"


सहसा उन्होंने अपने ओवरकोट की गहरी जेब में हाथ डाला और एक क्वार्टर निकाल ली। 


"लेंगे" उन्होंने मुझे ऑफर की।


"नो, थैंक यू।"


मेरे मना करने पर उन्होंने ढट्ठी खोलकर बोतल मुंह में लगा ली। 


"अरे अरे अरे, नीट पी लेंगे क्या?"


"नईं अज्जू बेटा, नईं" दारू ने उन्हें पहली मुलाकात में ही बेतकल्लुफ कर दिया था, "पहले से पानी मिला कर रखी थी। देसी थोड़ी है। विलायती है असली।...अभी पांच क्वार्टर और हैं... फुल तैयारी करके चलता हूं।" 


कार अभी दल्लूपुरा भी नहीं पार कर पाई थी और एक ड्रिंक अंदर जा चुका था। गेंदा भाई की अंग्रेजी क्या अब हिंदी भी पल्ले नहीं पड़ रही थी। तिस पर खौफ यह कि पांच बोतलें उनकी जेब में पड़ी थीं। सबसे बड़ी परेशानी यह कि ट्रेन में मेरा कोई आरक्षण न था। और, न ही उनका।


उधर, गेंदा भाई को कोई परेशानी न थी। वे नोएडा खत्म होते होते दो क्वार्टर और अंदर कर चुके थे और समाचार अपार्टमेंट्स तक उनकी जेब में बस एक बोतल बची थी।


"गेंदा भाई" मैंने उन्हें जोर से हिलाया, "इस हालत में यात्रा कैसे होगी?"


"डोन वई, मैं हूं न" वे बमुश्किल अपनी बात कह पा रहे थे, "अये बो टीसी ऐ न, चेला ऐ मेया... सsssब बंदोsss..."


उनके मुंह से बस्त निकल ही नहीं पाया। वे ढेर हो चुके थे। जीवन का एकमात्र चिह्न उनकी सांस ही बची थी। बदबूदार।


नई दिल्ली स्टेशन आ गया था। मैंने उन्हें माल असबाब की तरह कंधे पर लाद कर कार से बाहर उतारा। पटकने की जरूरत न थी। वे स्वयमेव सड़क पर बिखर गए।


मैं सर्द, बेदिल दिल्ली की सड़क पर हताश खड़ा था। बगल में गमकता गेंदा पड़ा था। अंग्रेजी में कहूं तो मैं विट्स एंड पर था। लेकिन इस विकट स्थिति में भी मेरे कवि हृदय से एक तुकबंदी बह निकली...जीवन की सबसे बड़ी भूल, चुन लिया गेंदा डैमफूल। अपने कवित्व पर मैं मुस्करा उठा और खुद की पीठ ठोककर कर्तव्य मार्ग पर चल पड़ा।


मैंने पानी की छींटें मारकर  मुरझाए गेंदा को खिलाने का प्रयास किया। उसकी आंख की पंखुड़ियां खुली। मैने गेंदा को उठाने का प्रयास किया। सहसा गेंदा भइया सन्निपाती मरीज़ की तरह एक झटके में उकड़ू बैठ गए और अल्लबल्ल बोलने लगे। वे दरअसल मुझे पहचान नही पा रहे थे और समझ रहे थे कि मैं कोई लुटेरा हूं। उनकी अगड़म बगड़म का अनुवाद यह था ...खबरदार, मुझे हाथ मत लगाना। मुझ कनपुरिया को लूटोगे ...एक एक दिल्ली वाले की मां xxx दूंगा। यहां का पुलिस कमिश्नर भी जेब में पड़ा रहता है मेरी।


दरहकीकत उनकी जेब में सिर्फ एक दारू की बोतल पड़ी थी और पेट में चार।


बमुश्किल तमाम मैं उनकी याददाश्त वापस ला पाया। लेकिन होश और पावों की ताकत वापस लाना मेरे बस में न था। मैंने एक कुली बुलाया। कुली सामान ढोते हैं। जिंदा या मुर्दा मांस नहीं। उसने मना कर दिया। आखिरकार एक कुली गेंदा जी को कंधा देने को राजी हो गया। बैसाखी की तरह। सो, एक बैसाखी कुली बना और दूसरा मैं। हम दोनों गेंदा को कढ़ील कर ले चले। नॉर्थ ईस्ट एक्सप्रेस पहले ही प्लेटफार्म पर लगी मिल गई। ट्रेन छूटने में एक घंटा बाकी था। सभी डिब्बे लगभग खाली थे।


कुली बोला, "कहां धर दूं?"


"किसी जनरल डिब्बे में।" 


मैं जानता था कि आरक्षित डिब्बे में दाल नहीं गलेगी। कुली ने गेंदा को एक खाली बर्थ पर लुढ़का दिया।


गेंदा जी का दुर्भाग्य। वह डिब्बा फौजियों का था। थोड़ी देर में फ़ौजी आने लगे। अब आप तो जानते ही हैं कि फ़ौजी भले ही हमारे लिए जान देते रहते हैं, लेकिन अपने डिब्बे में बैठे किसी सिविलियन के साथ वे पाकिस्तानी घुसपैठिए की तरह पेश आते हैं। उन्होंने आते ही गेंदा जी को रौंद दिया। गेंदा जी ने बहुत समझाया कि उन्होंने आर्मी कैंटीन वाली दारू पी है। लेकिन वीर जवानों का दिल न पसीजा।


मैं गेंदा जी को सम्हाले दूसरी जगह तलाशने लगा। अब कहीं कोई सीट खाली न थी। आखिरकार भइयों के लिए रिजर्व्ड जनरल डिब्बे में स्थान मिला। फुटबॉर्ड के पास, फर्श पर। संडास के बगल में। 


सौभाग्य से संडास गंदा था। दरवाजा बंद होने के बावजूद भभका मार रहा था। गेंदा जी से निकल रही महक दब चुकी थी।


गेंदा जी दूसरे दरवाजे की तरफ अपने ओवरकोट के साथ लेट गए। थोड़ी देर में डिब्बा खचाखच भर गया। 


ट्रेन चल दी। कोई दिक्कत नहीं। भभके को भभका काट रहा था। गेंदा जी कुछ देर में खर्राटे भरने लगे।


खर्राटे टूटे तब जब ट्रेन अलीगढ़ पहुंची। इस बार प्लेटफार्म उसी तरफ था जिस तरफ का दरवाज़ा बोल्ट करके गेंदा जी अंटागुड़गुड़ थे। अंदर आने वाले मुसाफिर दरवाज़ा पीटने लगे। गेंदा जी की नींद में खलल पड़ी तो उनका कनपुरिया जाग गया। उनके मुखारविंद से गालियों का अजस्र झरना बहने लगा।


आखिरकार ट्रेन चल दी। थोड़ी ही देर में दूसरे दरवाजे से चढ़कर आए अलीगढ़िया गेंदा जी के सामने थे। वे ब्रजभाषा में गालियां दे रहे थे। कनपुरिया शेर का नशा घट गया। वह दो टांगों के बीच में दुम दबाने लगा। उसके ऊपर लात जूते पड़ने ही वाले थे कि इस गरीब ब्राह्मण की बुद्धि का बल्ब चाचा चौधरी की तरह भक्क से जल उठा। मैं पूरी ताकत से दहाड़ा, "मितरो, खबरदार। उसके पास भी नहीं जाना। उसे कुत्ते ने काटा था। रेबीज़ फैल चुका है, उसके शरीर में। वह पागल हो चुका है। थूक भी देगा तो मर जाओगे।"


हमलावर भीड़ के पांवों में ब्रेक लग गए। मैं बोलता गया, देखो ना, खुद मैं कितनी दूर खड़ा हूं। सगा भाई है मेरा। सगा भाई!"


हमलावर चले गए। गेंदा जी फिर सो गए। करीब 11 बजे ट्रेन कानपुर सेंट्रल पहुंची। मैंने गेंदा जी को जगाया। वो अंगड़ाई लेते हुए मुस्कराए। बोले, "अरे, इत्ती जल्दी कानपुर आ गया। तुम्हारे साथ सफर में मजा आ गया।"


मैने कहा, "जी।"

Sunday, November 20, 2022

नशेबाज़-1

 नशेबाज़-1

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कोई कितना तनहा हो सकता है? उतना, जिसकी कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। मैं भी नहीं कर सकता था, अगर वह मुझको न मिला होता। उसे कोई स्नेह नहीं करता था। कोई भी नहीं। उसे शायद खुद से भी कोई लगाव न था। लेकिन वह पूरी तरह शून्य न था। मन के कोने में कुछ फोन नंबर पड़े थे। यादें थीं,  लेकिन इस आदमी को याद करने वाला कोई नहीं था।


वह मुझे रात ढाई बजे मिला। रात की पाली निपटा कर घर कानपुर सेंट्रल पर कैंट साइड स्थित मस्जिद के नीचे शकील की दुकान पर पान खा रहा था। साथ में थे मेरे मित्र Ramji Gupta । बीड़ा मुंह में डाला ही था कि वह आदमी दिखा। हाथ के इशारे से भीख मांग रहा था।

मैं शकील की दुकान से बाहर निकल आया।


उस पर नज़र डाली: लंबा, छह फुटा, पंजाबी शरीर। वज़न भी 90 किलो से ऊपर। लेकिन कंधे झुके हुए। छोटी छोटी आंखें। पलकें बोझिल। चेहरा सपाट। भावहीन। Wooden. शरीर पर एक ढीला ढाला नाइटसूट। चीकट।


"आओ" मैंने उससे कहा और पान की दुकान के बगल में चाय-समोसे की दुकान पर पड़ी बेन्च पर बैठ गया। मैंने उससे भी बैठने को कहा। लेकिन वह खड़ा ही रहा। आसमान टपक रहा था। लेकिन उसे ठंड नहीं लग रही थी।


"इसे दो समोसे और चाय दे दो" मैंने दुकानदार से कहा। दुकानदार हंसने लगा, "साहब, इसको चाय समोसा नहीं पैसा चाहिए। लतिहड़ है। इसे स्मैक चाहिए। चार दिन से टेशन पर ऐसे ही मंडरा रहा है। लोग पैसा दे भी देते हैं इसे।...कभी खाना खाता तो दिखाई भी नहीं पड़ता।"


मैंने इस युवक की तरफ सवालिया नज़र फेंकी। वह इनकार में सर हिलाने लगा, "ऐसा नहीं है, सर। मैं तो मुसीबत का मारा हूं। मैं भीख नहीं मांगता... डू आय लुक लाइक अ बेगर?"


"न, बिलकुल नहीं" मैंने दिल में अर्जित सारा प्रेम उड़ेलते हुए स्निग्ध स्वर में कहा, "तुम मुझे परेशान दिखते हो। बहुत बहुत परेशान।


मैंने उसके कांधे पर हाथ रखा और उसकी तरफ देखने लगा। उसकी आंखों में मेरे उड़ेले प्रेम का कोई असर नहीं था। छोटी छोटी आंखें वैसी ही ठंडी और सपाट थीं।


"तुम करते क्या हो ?" मैने पूछा।


"कुछ नहीं।"


"पहले क्या करते थे?"


"आयम अ ट्रेंड डॉक्टर, एन एमबीबीएस। दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में काम करता हूं।"


मैंने चौंक कर उसकी तरफ देखा। उसका चेहरा भावहीन था।


"यहां कैसे आ गए?"


"घर से भाग आया।"


"क्यों?"


"घर वाले मेरी शादी कराने पर आमादा थे।"


"तो! कर लेते शादी!! कहीं और शादी करना चाहते थे क्या...कोई गर्लफ्रेंड का चक्कर?"


"नो, सर। ऐसा कुछ नहीं...दरअसल..." वह मेरे एकदम पास आ गया और कान पर झुक कर खुसफुसाया, " एक्चुअली आयम इंपोटेंट!"


मेरे मन में करुणा उपजने लगी। लेकिन मुझे इस आदमी पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। 


"क्या बेवकूफों की बात करते हो डॉक्टर साहब" मैने कहा, "तुम खुद जानते हो कि मेडिसिन की फील्ड में आदमी ने कित्ती तरक्की की है। डॉक्टर कोठारी से मिल आते। अरे भाई कुछ न करते तो पैरेंट्स को बता देते। आदमी बिना शादी के भी मस्त जी सकता हैं।"


उसका जवाब था, "मेरी मां मर चुकी हैं।"


"तो, पिता जी से कहते..."


"वो बड़े आदमी हैं। बहुत बड़े जज हैं। उनसे मेरी बात नहीं होती।"


"तो भाई से कहते...बहन बहनोई से कहते..."


"भाई फौज़ में अफसर था। शहीद हो गया। बहन कोई है ही नहीं।"


मेरे हर सवाल का जवाब था उसके पास। ठंडा और निष्ठुर। मेरे पास अब सवाल न थे। वह मुझे चुपचाप देख रहा था। उसने चाय पी ली थी। लेकिन दोनों समोसे वैसे ही प्लेट में पड़े थे।


सहसा मुझे कुछ सूझा। मैंने उससे कहा, "अपने अस्पताल के किसी डॉक्टर या मित्र का फोन नंबर दो।"


उसने तुरंत दिल्ली के एक बहुत बड़े प्राइवेट अस्पताल का नंबर दे दिया। मैंने तुरंत फ़ोन लगा दिया। उसका साथी दिल्ली में ही था। मैंने जैसे ही इस शख्स का नाम लिया वह गालियां बकने लगा। नशेबाज, शराबी, चरसी, स्मैकिया... जंकी। 


"बस इतना बता दीजिए कि क्या xxx आपके साथ काम करते हैं" मैंने गुज़ारिश की।


"है नहीं, करता था। छह महीने पहले निकाल दिया गया। दिन रात नशे में रहता था। मेरा दोस्त था। मेरी भी बदनामी होने लगी। एक दिन डायरेक्टर ने इसे नशे की हालत में पकड़ लिया और तुरंत निकाल दिया।"


"क्या इसकी शादी होने वाली थी?"


"इससे शादी कौन करेगा? कौन अपनी बेटी देगा इसे!मेरी जानकारी में शादी की कोई बात नहीं चल रही थी। हां, एक गर्लफ्रेंड की बात जरूर किया करता था, जिससे इसका ब्रेकअप हो गया था, कुछ साल पहले।"


"ओके " मैंने कहा, "यह यहां कानपुर में भटक रहा है। क्या करूं? दिल्ली की ट्रेन में बिठा दूं?"


"इसे वहीं गंगा में धक्का दे दो। और दोबारा मुझे फोन न करना।" उसने फोन काट दिया।


मैने एक लंबी सांस भरी और इस एमबीबीएस डॉक्टर को देखने लगा। इस बार उसकी आंखों में थोड़ी चमक दिखी।


 "क्या बोला उसने" उसने पूछा।

मैने जवाब देने की बजाय उसके पिता का नंबर मांग लिया।


यह नंबर भी उसे याद था। मैंने मिलाया। दूर चंडीगढ़ में जज साहब ने कुछ देर बाद ब्राह्म मुहूर्त की मेरी कॉल उठा ली।

जैसे ही मैंने उनसे उनके पुत्र के बारे में बोलना शुरू किया उन्होंने बड़ी ही गंभीरता से कहा, "मेरा एक पुत्र शहीद हो गया। तुम मेरा एक काम कर दो। इस कमीने को गोली मार दो। जब यह मर जाए तब फोन करना। मैं भरपूर इनाम दूंगा।


इतना कह कर उन्होंने भी फोन काट दिया।


मेरा कनपुरिया दिमाग़ अब भी शांत न हुआ। ससुरी कहानी का एंड ही नहीं मिल रहा था। अचानक एक जीआरपी के दरोगा जी दिख गए। मैंने तुरंत उनकी मदद मांगी, "दरोगा जी, इस लाश को दिल्ली जाती किसी ट्रेन में रखवा दीजिएगा।"


कहानी का समापन करके मैं चल दिया। पर क्या मुझे उस एमबीबीएस डॉक्टर को 'लाश' कहना चाहिए था?यह सवाल पाठकों से मैं कर रहा हूं। क्या यह आदमी इस समाज की उत्पत्ति नहीं। क्या इस आदमी को rehab में नहीं डाला जा सकता था। जब संजय दत्त की नशेबाजी छूट सकती थी, तो इसकी क्यों नहीं?


शायद किसी को इस brilliant युवक की परवाह ही नहीं थी। हमारे समाज में ऐसे instruments क्यों नहीं? सोचिए और बताइए।

इंतज़ार कर रहा हूं।

Tuesday, November 15, 2022

गालियां-2

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तो वादे के मुताबिक मैं हाज़िर हूं, गाली गाथा की दूसरी किस्त के साथ। लेकिन इसके पहले कि मैं अपने ऊपर लगे गाली देने के प्रकरण पर आऊं, मुझे एक लखनउआ साथी की आपत्ति का जवाब दे लेने दीजिए। इन भाई जान को दिक्कत यह थी कि मैंने गाली गाथा में नवाबी शहर को क्यों नज़रंदाज़ कर दिया। सॉरी ब्रो। आपको लगी ठेस जायज़ है। आपका शहर मेरे शहर से कतई कमतर नहीं। पर आपका अंदाज़ खफीफ सा अलग है। बस आप लोग गाली पाने सुपात्र के पहले 'आप' जोड़ देते हैं। दरअसल, इस तरह आप पहले टारगेट की इज़्ज़त बढ़ा देते हैं, ताकि उसे कायदे से नीचे गिरा सकें। 


अब आते हैं मुझ पर लगे आरोप पर। दरअसल, इसी कहानी को लिखने के लिए ही मैंने कलम उठाई थी। यह लेखन sombre नेचर का होना था। लेकिन दिमाग बहक गया और बात गाली गलौज़ तक चली गई।


इस सत्य कथा का शीर्षक है: जाने कहां गए वो लोग। कैसे लोग? वे लोग जो हिमालय जितने ऊंचे होते थे। अपने से छोटों से बदला लेने की कभी सोचते भी नहीं थे। ऐसा ही एक आदमी था। विद्वान, अत्यंत धनवान, बेहद इज्जतदार, सुदर्शन, गौरांग और छह फुटा। प्यार से हम कर्मचारियों ने उन्हें एक नाम दे रखा था। गंजा।

वे मेरे मालिक भी थे और संपादक भी। अखिल भारतीय ख्याति थी उनकी। लोग उनकी भृकुटि से भी डरते थे। मेरी बात और है। कुछ वैध कारणों मैं उन्हें पसंद नहीं करता था। दूसरी ओर उनका आशीर्वाद मुझ पर हमेशा बना रहा। 


तो हुआ यह कि एक शाम वे संपादकीय विभाग में आ गए। सन्नाटा छा गया। वे दिन की पाली के इंचार्ज के सामने खड़े हो गए। 


"कोई खास खबर, सक्सेना जी?"

"नो सर, कोई खास खबर नहीं।" इतना कह कर सक्सेना जी उनके सम्मान में कुर्सी छोड़ कर खड़े हो गए।


शिफ्ट इंचार्ज के खड़े होते ही वे तुरंत उस कुर्सी पर बैठ गए। पहले तो वे मेज़ पर रखे यूएनआई और पीटीआई के तार देखते रहे फिर उन्होंने रिजेक्टेड खबरों के लिए बने टब में हाथ डाल दिया।

फिर क्या था, शिफ्ट इंचार्ज की शामत आ गई। 

"अरे, तुमने यह टिंबकटू की इत्ती बड़ी खबर कूड़े में फेंक दी...और यह होनोलूलू में आई बाढ़ को क्यों छोड़ दिया"


इंचार्ज महोदय चुपचाप खरीखोटी सुनते रहे। यह डांट अनावश्यक थी। गलतियां होती हैं लेकिन उस दिन उनकी गलती नहीं थी। दरअसल, अखबार में जगह सीमित होती है और उसी के मुताबिक खबरें सिलेक्ट या रिजेक्ट करनी पड़ती हैं। कौन सी खबर किसी दिन जगह बना पाएगी या नहीं, यह फैसला सिर्फ वह शिफ्ट इंचार्ज ही कर सकता है। 


लेकिन मालिक सो मालिक!


रात की पाली का इंचार्ज मैं था। संपादकीय विभाग में घुसते ही मुझे दो घंटे पहले का यह विवरण मुझे आद्योपांत सुनाया गया। सहसा मेरा क्रोध भड़क गया और मैंने शिफ्ट इंचार्ज से कहा, "सारी गलती तुम्हारी है। क्यों सीट छोड़ कर खड़े हो गए थे...xxx xxx आए मेरी पाली में मैं सीट ही नहीं छोडूंगा। न वो तार देख पाएगा और न हड़का पाएगा।


इसके बाद मैं पहले पेज की तैयारी में लग गया और इस महत्वहीन घटना को भूल गया। लेकिन दफ्तर के कुछ बुड्ढों ने मेरा बयान दर्ज़ कर लिया था। वह मालिक तक पहुंच गया।


अगले दिन सुबह की पाली का इंचार्ज मैं था। जा कर सीट पर बैठा ही था कि साहब का चपरासी आ गया। चलिए, बुलावा आया है।


मैं कमरे में घुसा। मुझे देखते ही नीले सूट में दपदप करते इस सुदर्शन आदमी ने मुझे स्निग्घ दृष्टि से मुझे देखा और बोला, "बैठो...चाय पियोगे?"


"जी"

मेरे हां कहते ही उन्होंने चाय बनानी शुरू कर दी। बगल की मेज़ से खौलता पानी लिया। कप में डाला। फिर उसमें मिल्कपॉट से थोड़ा दूध डाला। 


"चीनी एक?" उन्होंने मुझसे पूछा।

"नहीं सर, चार क्यूब।"


मेरी बात पर उन्होंने जोरदार ठहाका लगाया।

मैं भी मुस्करा उठा। उन्होंने अपने हाथों से मुझे कप थमाया और साथ में मोनैको के कुछ बिस्किट भी।


हम दोनो चाय सिप करने लगे। सहसा एक सन्नाटा सा पसर गया, जिसे तोड़ते हुए वे हंस कर मेरी ओर मुखातिब हुए, "सुना है आप मुझे गालियां दिया करते हैं?"


"बिलकुल गलत बात, सर...ऐसा हो ही नहीं सकता।" मैं बिलकुल परेशान न था। मैंने अपने जीवन में अपने शत्रु को भी गाली नहीं दी थी। 


"याद कीजिए।"


"सर, क्या याद करूं मां बहन का नाम लेकर अश्लील गाली देने की मैं कल्पना ही नहीं कर सकता। वे शब्द बोलने में ही जबान लड़खड़ा जाएगी। मेरे संस्कार ही ऐसे नहीं हैं।"


मेरी बात सुनकर वे फिर मुस्कराने लगे। बोले, "अरे वो वाली गालियां नहीं।"


"फिर कैसी?"


"जैसे कि गंजा साला..."


मैं सन्न।


"क्या आपने कल यह नहीं कहा था...गंजा साला मेरी पाली में आकर तो दिखाए, मैं उसके लिए कुर्सी ही नहीं छोडूंगा!"


मेरी नजरें जमीन पर गड़ गईं। 


"अब बोलिए, इस तरह की गाली आप देते हैं या नहीं?" 


मैं उनके सम्मान में झूठ बोलना चाह रहा था। लेकिन बचपन में पिता तुल्य भइया को दिया वचन आड़े आ गया। वचन था अपनी रक्षा के लिए झूठ मत बोलना।(यह सच बात है। कभी भइया से लंबी भेंट कराऊंगा)


अतएव कलजुगी हरिश्चन्द्र ने कुबूल कर लिया, "जी, इस तरह की गाली तो मैं आपको दे देता हूं।"


उनका अगला सवाल और कठिन था। "ऐसा क्यों करते हैं आप!"


जवाब जुटाने में थोड़ा वक्त लगा। बहरहाल, मैने दिल की बात कह डाली, "सर, मालिक के नाते आप ऐसे काम भी कर डालते हैं, जो मुझे और साथियों को बहुत अखरते हैं। ऐसे में भड़ास तो निकलनी ही पड़ती है।"


मेरी बात पर वे हंसने लगे और उन्होंने जो बोला वह आज के इस युग में कोई भी सत्ताधारी नहीं कह पाएगा। उनका पूरा वाक्य मुझे अब तक याद है:


जब मुझ पर गुस्सा लगे मेरे कमरे में मेरे सामने जी भर कर गालियां दे लिया करो। सबके सामने नहीं।

उन्होंने मुझ पर संस्थान-द्रोह का आरोप कभी नहीं लगाया। मुझे कभी संपादक तो नहीं बनाया मगर कभी सजा भी नहीं दी।



Monday, November 14, 2022

गालियां

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बनारस गलियों का शहर है। मेरा कानपुर गालियों का शहर है। गालियां इन दिनों चर्चा में हैं। गालियों का सम्मान, कानपुर का सम्मान है। कानपुर गदगद है। 


गालियां अनंत काल से बोली जा रही हैं। अब वे तोली भी जा रही हैं। पर कैसे? कनपुरिया इसी बात से हैरान और परेशान हैं। वे तीन दिन से उस तराज़ू की तलाश में मारे मारे फिर रहे हैं, जिस पर वे अपने उत्पादन को तोल सकें। अब तक असफल हैं। मायूसी में अंदाज़ से ही काम चला रहे हैं। लेकिन, यहां किलो दो किलो वाला कोई नहीं। टन-दो टन से नीचे कोई नहीं। उच्चतम तो मेगा, गीगा और टेट्रा टन तक जाता है।


आपको शायद ये वजनदार बातें कनपुरिया लंतरानी लग रही हों। यकीन कीजिए, हो सकता है तराज़ू मिल जाए तो कोई टेट्रा के ऊपर भी निकल जाए। यहां बाप अपने पुत्र को मां की गाली देते मिल जाते हैं और पुत्र बाप को मां की गाली देते। वह भी बिना किसी बैर भाव के। कुछ तो ऐसे भी मिल जाएंगे जो लड़ाई झगडे में अगले को अर्दब में लेने के लिए खुद को गाली देते मिल जाते हैं...मुझसे न उलझना ...पता कर लो मुहल्ले में कि मैं कितना बड़ा xxxx हूं।

एक साथी था। बज्जर कनपुरिया। मुरहा। दफ्तर में बैठते ही गालियां देने लगता। किसी एक को अदावत में नहीं बल्कि सबको। प्रेमवश। चार शब्दों के वाक्य में भी एक गाली होना सामान्य भाषा थी उसकी। निर्जीव वस्तुएं भी उसके इस प्रेम से महरूम नहीं रहती थीं। मसलन, कंप्यूटर हैंग हो गया तो xxx हैंग हो गया। अखबार की दुनिया में सीनियर साथी चिंता में रहते थे कि कहीं वह खबर में कुछ न लिख दे। यह साथी बाद में बड़े बड़े पदों पर काबिज़ हुआ। उसकी गालियों का डंका दिल्ली तक बजा। टीवी तक पहुंचा। हालांकि किसी ने उसको स्क्रीन पर प्रस्तुत करने का साहस नहीं दिखाया।


उन दिनों एक विज्ञापन खूब आता था: 'दाग अच्छे हैं'। एक संपादक इसी तर्ज़ पर कहा करते थे, गालियां अच्छी हैं। उन्होंने गुरुमंत्र मुझको दे दिया कि कनिष्ठों की गालियां मिलने का अर्थ है कि तुम बढ़िया काम कर रहे हो। लेकिन, वे अपने कनिष्ठों को कभी गाली नहीं देते थे। उनकी जद में आते थे वरिष्ठ। सुना है कि एक बार एक बड़ी मीटिंग में उनके सुप्रीमो जैसे ही एक मिनट के लिए लघुशंका निवारण के लिए निकले। कनपुरिया मन का गरिहा कोना जाग उठा। उनके ओंठ हिले और उन्होंने तमाम मातहतों का दिलखुश करते हुए यह कह डाला: यार, यह तुम्हारा बॉस भी बहुतैxxx है। दबे कुचले कर्मचारियों ने खुश होकर ताली बजा दी। लेकिन एक एलआईयू पत्रकार ने स्टिंग कर दिया। दो दिन बाद बॉस ने उनको दरवाज़ा दिखा दिया। उन्होंने बहुत समझाया...बॉस हमारे कानपुर में यह सब प्यार में कहा जाता है। लेकिन, दूसरे शहर में पला बढ़ा अनकल्चर्ड बॉस कानपुर के कल्चर को एप्रिशिएट करने में नाकाम रहा।

तौ भइया अइस है हमार कानपुर। बिंदास। लेकिन यहां इस कलम घसीटू जैसे लोग भी हैं जो गाली दे ही नहीं पाते। ये लोग अमूमन संपादक भी नहीं बन पाते। मज़े की बात यह कि मुझ निरामिष पर एक दिन एक बहुत बड़े संपादक कम मालिक ने गाली देने का आरोप लगा दिया था...सुना है आप मुझे गाली दिया करते हैं। तब क्या हुआ, पढ़िए कल।



Wednesday, November 9, 2022

ग़ज़ल

 जब पंजीरी उड़ रही हो देस में

क्या रखा है आदमी के भेस में

शशक नफ़रत के नशे में चूर हैं

और कछुए अग्रणी हैं रेस में

उसने अपने पांव ही कटवा लिए

खुला रहता था बदन उस खेस में

वो नहीं समझेंगे गाओ तुम भले

टेनर, बैरीटोन में या बेस में


Tuesday, November 8, 2022

उर्दू दिवस

 उर्दू दिवस

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मुझे नस्तालीक (उर्दू वाली) लिपि नहीं आती। लेकिन, अगर मैं रोज़ाना की बातचीत में जानबूझ कर क्लिष्ट यानी कठिन शब्द न बोलूं तो वे उर्दू बोलने वाले जो देवनागरी नहीं जानते, यही मानते हैं कि मैं उर्दू बोल रहा हूं। 

पाकिस्तान वालों की तो बात छोड़िए, कभी मेरा एक रिपोर्टर था मज़ारे शरीफ (अफगानिस्तान) में, उसके साथ मैं स्काइप के ज़रिए मज़े में बातचीत किया करता था। और, तो और, अगर कोई हिन्दी बोलने वाला ईरान के प्रांत बलूचिस्तान पहुंच जाए तो वहां भी उसे भाषा की कोई दिक्कत नहीं महसूस होगी।

यह है उर्दू अथवा हिन्दी की रीच। मेरी नज़र में दोनों ज़बानें एक हैं। लिपियां भाषा नहीं होती। होतीं तो मराठी और हिन्दी एक भाषाएं एक होतीं। आज रोमन में हिन्दी खूब लिखी जाती है क्या वह एक अलग भाषा हो गई? भाषा निर्धारित होती है verbs से। कथित उर्दू की सारी क्रियाएं संस्कृत से निकली हैं। सारा पाकिस्तान भले ही खुद को अरबों से जोड़ने में लगा हो लेकिन उसका खाना, पीना, हंसना, जीना या मरना संस्कृत धातुओं से बनी verbs से ही होता है।

तकनीकी तौर पर मैं उर्दू, अरबी और फ़ारसी नहीं जानता। लेकिन मेरी भाषा में इन ज़बानों के अलावा तुर्की और पोर्चगीज शब्द शामिल हैं। एक बार मैंने एक इतालवी व्यक्ति की लैंग्वेज लर्निंग साइट के लिए एक कहानी का अंग्रेजी से हिन्दी में ट्रांसलेशन किया था। ट्रांसलेशन देवनागरी में नहीं रोमन में किया था। उच्चारण के लिए phonetic signs का इस्तेमाल करते हुए। उस इतालवी ने मेरा ट्रांसलेशन देख कर मेल किया। पूछा: क्या यही हिन्दी है। इसमें तो लगभग 50 फीसदी शब्द अरबी और फारसी के हैं। उस इतालवी को दरअसल अरबी और फारसी आती थी।

सच तो यह है कि आज उर्दू/हिन्दी यानी हिंदुस्तानी ज़बान अगर साउथ की कुछ ग्रामीण पॉकेट्स को छोड़ दें तो वह पूरे हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बोली और समझी जाती है। काश, हमारी लिपि एक होती!

अगर हो जाती तो उत्तर की सारी भाषाएं एक दूसरे को assimilate करना शुरू कर देंगी और क्या पता कालांतर में एक नई inclusive भाषा उभर आए।  दक्षिण की भाषाएं थोड़ा भिन्न हैं। लेकिन एक लिपि होने के बाद उनके साथ भी आदान प्रदान शुरू हो जाएगा।

लेकिन कोई अपनी लिपि क्यों छोड़े? इसके लिए पहले अहंकार छोड़ना होगा। 

चलिए झगड़ा छोड़ते हैं और परदेसी स्क्रिप्ट रोमन अपना लेते हैं। यह बात नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने भी सुझाई थी। जी, phonetic signs का इस्तेमाल कर कठिन से कठिन शब्द रोमन में लिखे जा सकते हैं। S के ऊपर नुक्ता लगा दो तो हो गया श और नीचे लगा दो तो बन गया ष।

इसी बात पर लगाइए तो जयकारा

बोलो, हिंदुस्तानी भाषा की जय।


Thursday, November 3, 2022

भाषाएं सीखिए

  लावण्या: बेंगलुरु -2

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बेंगलुरु से कानपुर लौट रहा हूं। ट्रेन गोरखपुर जा रही है। एक कन्नडिगा और एक तेलुगु फैमिली के अलावा डिब्बे में पूर्वांचल की भरमार है। अनेक सहयात्री बेंगलुरु में राज मिस्त्री या ऐसा ही कोई काम करते हैं। ये भी एसी कोच में यात्रा कर रहे हैं। है न खुशी की बात? बेंगलुरु बहुत फला है इन्हें। गुड।

बड़ा शोर है। भोजपुरी की भरमार है। मैंने गोरखपुर और पटना का नमक खाया है। मैं उनकी बातें समझ सकता हूं। ....

.... "ये कन्नड़ वाले बहुत बुरे हैं। " एक देवरिया वाला एक गोरखपुरिया से कह रहा है। (मैंने कर्नाटक के सम्मान में 'बुरा' शब्द लिखा है। सहयात्री ने जिस विशेषण का इस्तेमाल किया, उसकी आप कल्पना कर सकते हैं।)


"सही कह रहे हो। एक दिन मैं तुमकुर से माल लेकर बंगलौर आया था " दूसरा सहयात्री समर्थन में उदाहरण देता है, "माल उतारते वक्त वे सेठ के कर्मचारी कन्नड़ में बोलने लगे। मैं हिन्दी बोलने लगा तो मुझे उन लोगों ने जमकर हड़काया। बोले कर्नाटक में कमाओगे और कन्नड़ नहीं सीखोगे...यह तो नहीं चलेगा।"


मेरी नज़र कन्नडिगा सहयात्री पर पड़ी। वह मुस्कुरा रहा था। लेकिन मैं नहीं मुस्करा पाया। "तो कन्नड़ सीख लो न।" मेरे मुंह से निकल पड़ा।


उसने मुझे घूरा, मानो मैंने कोई राष्ट्रद्रोह कर दिया हो।"मैं क्यों सीखूं! वे हिन्दी क्यों नहीं सीखते? हिन्दी तो राष्ट्रभाषा है।"

मैं राष्ट्र और राष्ट्रभाषा का विरोध नहीं कर सकता। सो मैंने  कहा, "एसी का किराया तो बहुत ज्यादा होता है?" 


"किराया तो मालिक देता है। साल में एक बार घर जाने का। पेड लीव, छुट्टी के साथ।"


"अच्छा! मालिक तो बहुत बढ़िया है! क्या कन्नड़ नहीं है वो?"


जवाब में उसने एक पल मुझे घूरा और जोर देकर बोला, "नहीं।"


"तो क्या कोई यूपी, एमपी वाला है?" सहसा मुझे अरविंद अडिग की कहानी वाइट टाइगर याद आने लगी।


"नहीं, मेरा मालिक तमिल है।"


इस बातचीत ने मुझे चलती ट्रेन में लिखने को मजबूर कर दिया। मैं खिड़की से बाहर खूबसूरत द्रविड़ क्षेत्र के नज़ारे करने लगा। एक महिला खेत पर काम कर रही है। सांवली और खूबसूरत। (जी, मुझे सुंदरता बहुत दूर से दिख जाती है) 

....और, उस मेहनतकश को देखकर मुझे लावण्या की याद आ गई। मुझे बेंगलुरु के केआर मार्केट में मिली थी। धनतेरस की रात। 

दिवाली की सामग्री, सब्जी और फलों से भरे दो भारी भरकम झोले थे मेरे हाथ में। थक चुका था और बाज़ार से बाहर निकल ही रहा था कि पत्नी चौंक कर बोलीं, अरे रोली तो लेना भूल ही गए! 


"मैं अब कहीं न जाऊंगा" मैंने कहा, "मैं सुबह चूना ले आऊंगा। हल्दी मिलाके रोली बना लेना।"


वे न मानी और मुझे वहीं रुकने को कहकर रोली लेने चली गईं।


मेरे हाथ बहुत थक चुके थे। मैं झोले रखने की जगह देखने लगा क्योंकि जमीन में कीचड़ था। तभी मुझे कानों में बिहारी एक्सेंट की हिन्दी सुनाई दी। उधर देखा तो तख्त पर केले और मौसमी बेचता एक युवक मिला। 

"मैं झोले यहां रख लूं?" मैने तख्त पर बची खाली जगह पर झोले रखते हुए पूछा।


"अरे, इसमें पूछना क्या भइया, रख लो।"


फल वाला सहरसा का था। मैं चूंकि भागलपुर रह चुका हूं तो रिश्ता बनने में देर न लगी और हम अश्विनी चौबे और अजीत सिंह जैसी स्थानीय बातचीत करने लगे। 


तभी बगल में धनिया और मिर्चा बेच रही एक कृशकाय वृद्धा ने इस बिहारी से ज़ोर से आवाज लगा कर कुछ पूछा। मुझे सिर्फ एक शब्द समझ में आया: समयम्। 


बिहारी ने उतनी ही ज़ोर से कहा, "माई सात बजा बा।"


वृद्धा कुछ समझ न सकी और झुंझलाने लगी। तभी बिहारी के बगल में सूखे मेवे बेच रही महिला खिलखिला कर हंसने लगी। वह ज़ोर से ऐसा कुछ बोली, समयम एर मनी, अम्मा।


अम्मा उसे असीसने लगीं। इस बीच वह  महिला एक दढ़ियल अनीस भाई के सलाम पर वालेकुम अस्सलाम कह कर उनसे बतियाने लगी। फिर वह एक कन्नड़ भाषी ग्राहक से उसकी जबान में बात करने लगी।


मैं चमत्कृत होकर उसे निहार रहा था। मैं उसे एकटक निहार रहा था। उसके चेहरे पर मुस्कान लगातार खेल रही थी। बीच बीच में दांत खोल कर हंसने लगती। मुझे वह सुरभि वाली रेणुका शहाणे की याद दिला रही थी।

सहसा उसने मेरी ओर देखा और आंखों आंखों से बोली, क्या?"


"तुम्हें कितनी भाषाएं आती हैं?" मैंने पूछा।


"हिंदी, कन्नड़, तेलुगु और मलयालम..."


"बहुत बढ़िया" मैने खुशी जताते हुए हाथ से थम्स अप किया।


जवाब में एक मोहक मुस्कान के साथ जवाबी थम्स अप करते हुए वह बोली, "आय कैन स्पीक इंग्लिश ऐज़ वेल।"


"कहां की रहने वाली हो?"

"यहीं बेंगलुरु की।"

मेरा मतलब जन्म स्थान कहां है?


"यही बेंगलुरु।"

"पुरखे कहां के हैं?"


"महाराष्ट्र के। हम वहां के राजपूत हैं"


"कितना पढ़ी लिखी हो?"

"नाइंथ क्लास तक।"

"क्या नाम है?"

"लावण्या।"


तब तक पत्नी रोली खरीद कर लौट आईं। 


मैं फिर आऊंगा। यह कहकर मैं चल दिया। 


 मैं उससे दोबारा न मिल सका। अचानक कानपुर लौटना पड़ रहा है।

लेकिन मैं लौटूंगा और लावण्या से बातचीत कर फिर उसकी कहानी लिखूंगा। 

उसकी कहानी में कई कोण हैं। इनमे दो प्रमुख हैं: तमाम अवरोधों के बावजूद उभरता इंक्लूसिव भारत।  दूसरा है एक बेहद प्रतिभावान लड़की का फुटपाथ पर मेवे बेचना। 


मैं सोचता हूं कि महाराष्ट्र की होने के बावजूद उसने अपनी भाषाओं में मराठी को क्यों नहीं जोड़ा। क्या परिवार के कर्नाटक प्रवास के दौरान परिवार मराठी भूल चुका है। दोबारा मिला तो पूछूंगा। दरअसल, परदेस में रहने वाले लोगों में एक यह प्रजाति भी मिलने लगी है जो अपनी मातृभाषा भूल चुके हैं। कुछ बंगालियों और मलयालियो को मैं निजी तौर पर जानता हूं जो अपनी मातृभाषा नहीं जानते। और, उन्हें इसका अफसोस भी नहीं। न कोई गिल्टी फीलिंग। हां हिन्दी इन सबको आती है। हिंदी भाषी इस बात पर गर्व कर सकते हैं और किसी दूसरी भाषा न सीखने का प्रण कर सकते हैं।

बोलो हिन्दी मइया की जय।