Thursday, September 18, 2025

कोल्हू का बैल

 कोल्हू का बैल

**********


दो सौ करोड़ महीना! 


खबर सुनकर कोल्हू का बैल बेचैन हो उठा। 12-12, 14-14 घंटे की हाड़तोड़ मेहनत। और अंत में थोड़ा सा भूसा। बस!


"बाँsss" उसने ज़ोर से आर्तनाद किया। गोल गोल घूमना बंद कर वह सहसा खड़ा हो गया।


लक्ष्मी माता ने दूर क्षीर सागर से बैल का रंभाना सुना।  वे भागकर आईं। वे जानती थीं कि बैल रुका तो तेल निकलना बंद हो जाएगा। तेल नहीं निकलेगा तो धन नहीं पैदा होगा। तेली क्या खाएगा? आढ़ती क्या पिएगा? बेचारा पॉम ऑयल क्या करेगा? दो सौ करोड़ कैसे पैदा होंगे? आखिर मेरी पूजा के लिए धन तो चाहिए ही!


वे सीधे बैल के पास पहुंची। "क्या बात है, वरदराज!" लक्ष्मी जी ने पुचकारा।


"माते, इतनी मेहनत के बाद भी मुझे सिर्फ एक झावा भूसा! बस!!" बैल रोने लगा।


लक्ष्मी जी मुस्कुराईं, "तो क्या खाएगा?"


"वही, माते, जो यह तेली खाता है।"


लक्ष्मी जी की भृकुटि तन गई, "ये माते माते क्या लगा रखा है! मैं तेरी माता नहीं। बैल हो, बैल ही बने रहो। बैल की अम्मा होती है गऊ माता।"


"सॉरी मैम" बैल सहम गया, "देवी जी गऊ माता!कैसी माता! मेरी अम्मा का दूध घी तो यह तेली ही खा पी जाता है।"


लक्ष्मी जी मुस्कुराने लगीं। उन्हें बैल के मुंह से बगावत की बास आ रही थी। मामले की नज़ाकत भांप कर उन्होंने तेवर बदले और उपहास और झिड़कन मिले स्वर में बोलीं, "रे, बैल तू बुड्ढा होकर भी दूध पीने की लालसा करता है। छी, अम्मा का दूधू पीने में तुझे लाज न आएगी!"


बैल ने सर झुका लिया।


लक्ष्मी जी ने अंतिम प्रहार किया, " खैर मना कि भारत में पैदा हुआ है। अमेरिका में होता तो किसी के पेट में होता... जा भूसा खा। अब हड़ताल न करना। जा, तेली के लिए तेल पैदा कर और भगवान का शुकराना अदा कर।"


"जी देवी जी" बैल फिर चलने लगा।


"गुड, अब रुकना नहीं। रुके तो अगला जन्म चीन में करा दूंगी। वहां बैल को जिंदा भूनकर खाते हैं।


लक्ष्मी जी अंतर्ध्यान हो चुकी थीं।

Thursday, July 31, 2025

सोचता हूं

सोचता हूं

अगर...दरख़्त खुद अपने फलों को बेचते

...अगर वरुण देवता खुद अपना पानी बेचते

... और पवन देव खुद हवा के सिलिंडर बेचते

...और अग्निदेव घंटे के हिसाब से चूल्हा जलाते 

...अगर गाय खुद अपने दूध को बेचती


तो हम इन नेमतों का भुगतान

आख़िर किस तरह करते

किस मुद्रा में करते

Friday, July 18, 2025

चीनी लोक कथा

 नीलम और पन्ना का सूप

******************


बहुत पहले चीन में एक राजा हुआ करता था। एक बार दुश्मनों ने उस पर हमला कर दिया। राजा हार गया और बुरी तरह घायल होने के बाद वह मैदान से भाग निकला। 

लस्तपस्त होकर वह जंगल की शरण में पहुंचा और एक पेड़ के नीचे लेट गया। थोड़ी देर बाद भिखारियों का समूह वहां से गुजरा जो पास के गांवों से भीख मांगकर आ रहा था। उन्होंने घायल राजा को देखा तो उसे अपनी झोपड़ी में ले गए। उसके जख्मों पर जड़ी बूटियों का लेप लगाने के बाद उसे पीने के लिए सूप दिया। दो दिन के भूखे राजा को सूप बहुत अच्छा लगा। उसने और मांगा तो भिखारियों ने उसे झिड़क कर कहा, यह सूप दोबारा नहीं मिलता। बहुत महंगा है। इसमें पन्ना और नीलम का तड़का लगाया गया है।


राजा  ठीक होने लगा। वह रोज सूप की मांग करता लेकिन भिखारी मना कर देते। कहते, भीख में पन्ना नीलम दोबारा मिलेंगे तो फिर पिलाएंगे। एक दिन राजा स्वस्थ होकर लौट गया लेकिन वह सूप उसे दोबारा नहीं मिला। 

कालांतर में उसने अपना खोया राज्य फिर प्राप्त कर लिया। लेकिन उसे भिखारियों के पिलाए सूप की याद नहीं भूली। एक दिन उसने अपने चीफ खानसामा को बुलाया और कहा कि नीलम और पन्ना के तड़के वाला सूप बनाओ।

खानसामा ने सूप बनाया। नीलम और पन्ने का तड़का लगाया लेकिन राजा ने उसे सूंघते ही खारिज कर दिया। बोला, उसमें वह सुगंध ही नहीं है।

उसने मंत्री को बुलाया और उसे सूप के बारे में बताया। मंत्री ने रियासत में डुग्गी पिटवा दी। ऐलान किया गया  कि जो आदमी राजा का मनपसंद नीलम पन्ना का सूप बनाएगा, उसे दस गांवों की जागीर दी जाएगी।

कई बावर्ची आए। लेकिन कोई राजा को संतुष्ट नहीं कर पाया। एक दिन शहर में भीख मांगते उन भिखारियों ने भी वह ऐलान सुना। उन्होंने नीलम और पन्ने के सूप की बात सुनी तो वे आपस में हंस पड़े। उन्हें लगा कि हो न हो, यह वही आदमी है जिसने हमारा सूप पिया था। पुष्टि करने में देर न लगी। चौराहे पर राजा की मूर्ति लगी थी। उन्हें पहचानने में देर न लगी।


उन्होंने मंत्री के पास जाकर अपना दावा पेश कर दिया। मंत्री ने चीफ खानसामे को बुलाकर कहा, ये लोग सूप बनाएंगे। इन्हें हर वह चीज मुहैया कराई जाए जो ये चाहें।


भिखारियों ने खानसामे को सब्जियों और मसालों की सूची दी। "और नीलम पन्ना?" खानसामे ने पूछा। भिखारी बोले, उनकी चिंता न करो। सारे रत्न हमारे पास हैं।


थोड़ी देर में सब्जियां और मसाले आ गए। सब्जियां देखकर भिखारियों ने नाक भौं सिकोड़ ली। बोले, "ऐसी सब्जी से नीलम पन्ना का सूप नहीं बनता ... छोड़ो, अब हम सब्जी लाएंगे।"


वे सब्जी मंडी गए और सबसे सड़ी गली सब्जी और घोड़े का सड़ा गोश्त खरीद लाए। इसके बाद सूप बना। उसकी बदबू से महल गंधाने लगा। सूप राजा को पेश हुआ। उसने लंबी सांस लेकर सूप सूंघा और खानसामे को बुलाकर बोला, "देखो ऐसा होता है नीलम पन्ने का सूप। इन लोगों से सीख लो। इन्हें बार बार न बुलाना पड़े।

पूरा महल सूप का सत्य जानता था। लेकिन सबने हंसी रोक रखी थी। लेकिन मंत्री अपनी मुस्कान रोक नहीं पाया। राजा तमतमा गया, "क्यों हंसते हो जी?"

मंत्री ने अपना धर्म निभाते हुए आगाह किया, "महाराज इसमें थोड़ी बदबू नहीं आ रही?"

"मूर्ख मंत्री, यही तो सूप की खुसूसियत है। बिलकुल जन्नती सूप है।"


राजा सूप पीने लगा। फिर खानसामे को बुलाकर हुक्म दिया,"एक कटोरा मंत्री जी को भी।"

मंत्री ने एक चम्मच मुंह में डाला। उसे उबकाई आने लगी। राजा ठहाका मारकर हंसा और बोला, नीलम और पन्ना केवल राजा ही हजम कर सकता है।

(चीनी लोककथा)

Wednesday, April 23, 2025

गाओ गाना

 न क़द है न काठी लिए हाथ लाठी

उठाए अलम हैं बहकते क़दम हैं

नहीं कुछ भी पल्ले हैं पूरे निठल्ले

गला फाड़कर पर दिखाते हैं कल्ले 

कभी अल्ला बोलें कभी सिया रामा 

वो धोती पहनते वो ऊंचा पजामा 

ये जॉम्बी नहीं हैं ये आदम के बच्चे

कोशिश करो तो बनेंगे ये अच्छे

इन्हें दे दो पोथी इन्हें दे दो रोटी 

बनाओ नहीं इनको चौसर की गोटी

न इनसे ख़ुदाया खुदाई कराओ

नहीं इनको नफ़रत का काढ़ा पिलाओ

चलो फिर से हम एक गांधी को जगाएं

लड़ें सच की खातिर अंधेरा भगाएं

Sunday, April 20, 2025

पटरीआकी मटरीमाकी: 4

   


पटरीआकी मटरीमाकी: 4

********************

उर्वशी, रंभा, तिलोत्तमा, हूरें

********************


बलभद्दर ने फिर दौड़कर युवती को रोक लिया। "क्या है?" वह झल्लाते हुए बोली, "तुम्हारा ठेका लिया है क्या कि तुम्हें कांधे पर बिठाकर जन्नत की सैर कराऊं!"


"देवी जी!" बलभद्दर कातर भाव से बोला, "समझिए  न! मैं बिलकुल नया हूं...वापसी का रास्ता भी नहीं मालूम।"


युवती पसीज गई। उसने अपने बैग से एक  लिपस्टिक निकालकर उसे थमा दी। बोली, "जब लौटना हो तो अपने ओंठों पर इसे लगा लेना। मैं आ जाऊंगी... कोई मुसीबत पड़े तो भी लिपस्टिक का उपयोग कर लेना।"


इतना कहकर वह चली गई। थका माँदा बलभद्दर भी एक घने पेड़ के साए तले जाकर लेट गया। लेटते ही उसे नींद आ गई। नींद तब टूटी जब उसको खटाक खटाक की आवाज़ सुनाई दी। उसने आंख खोली तो चेहरे पर झुकी तीन सुंदर स्त्रियां दिखाई दीं। उनके गुलाबी वस्त्रों से भीनी भीनी सुगंध आ रही थी। 


अपने ऊपर झुके परीचेहरों को देख उसका मर्दाना दिमाग सक्रिय हो उठा। मन घोड़े की तरह दौड़ने लगा।  भय जाता रहा। उसे लगा वह युवती झूठ बोल रही थी... स्साली...यहां तो अप्सराएं हैं...मुख चूमने को आतुर...वाह रामकली वाह! थैंक यू... तुमने बैट से ज़रूर मारा लेकिन जीते जी स्वर्ग तो दिखा दिया...थैंक यू वेरी मच...


इसी पौरुषेय चिंतन के साथ वह उठ बैठा और बोला, "देवियो!" आप कौन हैं? उर्वशी, मेनका या रंभा?"


"इनमें से कोई नहीं।" एक स्त्री बोली। उसकी आवाज़ कड़क थी, जो उसके सुंदर चेहरे से बिलकुल मेल नहीं खा रही थी।


"तो फिर आप तिलोत्तमा, घृताची, कुंडा, अलम्बुषा, मिश्रकेशी, विद्युत्पर्णा, रक्षिता में से कोई होंगी!" उसने अन्य अप्सराओं के नाम भी गिना डाले।


"नहीं। हम वो भी नहीं।" दूसरी स्त्री भी उसी रूखे टोन में बोली।


"तो क्या यह स्वर्ग नहीं?"


"नो, यह स्वर्ग भी नहीं।"


"तो क्या यह जन्नत है? मुसलमानों वाला स्वर्ग।"


इस बात तीनों ने एक साथ ठहाका लगाया और अब तक खामोश रही तीसरी स्त्री मधुर स्वर में बोली, "मान लो कि यह जन्नत है। तो?"


"मुझे कोई दिक्कत नहीं कि यह जन्नत है।"


"फिर किसे है दिक्कत?"


"आपको होगी।" बलभद्दर ने सकुचाते हुए कहा।


"हमें? हमें क्या दिक्कत होगी?"


"चलो, मैं समझाता हूं। अगर यह जन्नत है तो आप सब हूरें होंगी। अब हूर तो मुसलमान होती हैं। अब मैं ठहरा बनिया। ओमर बनिया। हिन्दू। आप लोग एक हिन्दू की सोहबत कर पाओगी?" इतना कहकर वह रुका और परीचेहरों को कामनाओं से भरी नज़रों से देखने लगा।


तीनों स्त्रियों के चेहरे में विस्मय था।


"तो आप सोचिए कि क्या एक हिन्दू की सोहबत मंज़ूर है?" उसने बोलना जारी रखा, "मुझे तो कोई दिक्कत नहीं। स्त्री की कोई जाति नहीं होती। मैं बनिया हूं। मेरे लिए क्षत्राणी और ब्राह्मणी वर्जित है। लेकिन नीचे गिरने की कोई सख्त मनाही नहीं।" बलभद्दर ने स्त्रियों को फिर निहारा। वे गुस्से में दिखीं। वह क्षण भर ठिठका और शुरू हो गया, "गुस्सा न हों। मैं इस्लाम कुबूल कर लूंगा। दिलदार या दिलावर बन जाऊंगा। आखिर दिल दा मामला है..."


वह पूरा गाना गाने के मूड में आ गया था लेकिन उससे पहले वह मीठे स्वर वाली स्त्री कड़ककर चीखी, " लगाओ तो ज़रा इस गदहे के चूतड़ों पर दो लातें।"


आदेश के अनुपालन में विलंब नहीं हुआ। उसी के साथ दूसरी स्त्री को दो डंडे जमाने का हुक्म मिला। उसने भी हुक्म पर अमल करने में देर नहीं की।


बलभद्दर दर्द से तड़पकर उठ गया। अब उसने गौर से देखा कि स्त्रियों की गुलाबी ड्रेस तो पुलिस की वर्दी है! एक की वर्दी की आस्तीन में तीन फ़ीते लगे थे और मृदुभाषिणी के कांधे पर लगे थे तीन स्टार। यानी इंस्पेक्टर। तीसरी स्त्री एक स्टार वाली एएसआइ थी।


 इंस्पेक्टर ने फटाफट हथकड़ियां निकालीं और बलभद्दर की कांपती कलाइयों में पहना दीं। पीछे से दीवान ने एक बार पुनः चरण प्रहार किया और धक्का देते हुए बोली, "चल स्साले, भैन के जिज्जा! थाने में तेरी और उर्वशी की सुहागरात मनवाती हूं।"


बलभद्दर की बुद्धि काम नहीं कर रही थी। उसे युवती द्वारा दी गई लिपस्टिक की याद आ रही। मगर वह तो जेब में पड़ी थी और हाथ बंधे थे। वह चुपचाप चलता रहा और तीनों पुलिस वालियों की बातें सुनता रहा...


"यह साला है कौन?" दीवान बोली


"मुझे तो यह स्टड फार्म से भागा हुआ साँड़ लगता है.." एएसआइ ने बुद्धि दौड़ाई।


"मगर यह तो पागल है...बहकी बहकी बातें करता है। स्टड फार्म में तो सर्वोत्तम मर्दों को ही रखा जाता है। गर्भ में ही भ्रूण की जांच कर ली जाती है कि बच्चे की लंबाई चौड़ाई और आइक्यू कैसा होगा। आइंस्टाइन से नीचे तो चलता ही नहीं। ब्रेन की भी जांच होती है कि बच्चा बड़ा होकर पागल तो नहीं हो जाएगा..."


"बात तो सही है। हम लोग तो कमज़ोर पुरुष-भ्रूण को पेट में ही नष्ट कर देते हैं ताकि मुल्क में एक भी घटिया मर्द दिखाई ही न दे।"


"है तो यह स्टड फार्म का भगोड़ा ही...लेकिन एक मिनट...ज़रा सोचने दो...मुझे अभी अभी लगा कि शायद यह कई दिन का भूखा हो....इसीलिए पागलपन की बातें कर रहा हो!"


वार्तालाप में सुन रहे बलभद्दर की पीठ पर सहसा ज़ोर की धौल पड़ी। दीवान ने पूछा, "क्यों बे अपनी अम्मा के दूल्हे, तूने खाना कब से नहीं खाया?"


बलभद्दर सचमुच भूखा था। उसकी आंखों में आंसू आ गए। भर्राए गले से बोला, "बहन जी, 36 घंटे हो गए। पब में थोड़ा सा चखना खाया था बस। कल सुबह घर से खाली पेट चला था। रामकली ने कुछ बनाया ही नहीं था।" रामकली का नाम लेते ही वह सुबकने लगा। 


यह सुनकर तीनों पुलिस वालियों ने राहत की सांस ली। वे हंसने लगीं।  "वाउ, वी हैव सॉल्व्ड द पज़ल, येSS।" इंस्पेक्टर खुशी से चहक पड़ी, "चलो, पहले इसे खाना खिलाते हैं। मेरा टिफिन जीप में ही रखा है।"


कुछ देर चलने के बाद वे पार्क से बाहर सड़क पर आ गए। जीप वहीं खड़ी थी। टिफिन निकला और उसे बलभद्दर के आगे रख दिया गया। मगर उसके हाथ बंधे थे। वह पुलिस वालियों को बिसूरने लगा। एएसआइ ने हथकड़ी खोलने का प्रयास किया। मगर इंस्पेक्टर ने रोक दिया, "यह भाग सकता है।"


"तो?" 


"इसे मैं खिला दूंगी।" इतना कहकर वह हाथ से कौर बनाकर कैदी को खिलाने भी लगी।


इस सुर दुर्लभ दृश्य को देख दोनों पुलिस वालियां ताली बजाकर नाचने लगीं। देवताओं ने पुष्पवर्षा भी की होगी लेकिन बलभद्दर देख नहीं पाया। उसकी आंख से भल्ल भल्ल आंसू गिर रहे थे। एक परीचेहरा उसे अपने हाथ से लुकमे तोड़कर खिला रहा था। जन्नत भी कैसी कैसी होती हैं..वह सोच रहा था।


खिला पिला कर बलभद्दर को जीप में डाल दिया गया। स्टीयरिंग व्हील पर  दीवान जा बैठी। गियर डालते हुए उसने इंस्पेक्टर से पूछा, "तो मैडम स्टड फार्म चलें? इस साँड़ को जमा भी तो करना है।"


"नो, इसे थाने ले चल। स्टड फार्म में सुबह जमा करेंगे। रात में थाने में इसका कैबरे देखेंगे।" इंस्पेक्टर की बात सुनते ही कांस्टेबल और सब इंस्पेक्टर ने किलकारी भरी। जीप रात की सूनी सड़क पर सरपट दौड़ चली। बलभद्दर के बंधे हाथों ने सहसा दोनों पावों के संधिस्थल को ढक लिया।

*********************

अगली किस्त: मर्द का चीरहरण

**********************

Saturday, April 19, 2025

पटरीआकी मटरीमाकी: 3

 पटरीआकी मटरीमाकी: 3

***********************

बलभद्दर इन वंडरलैंड

************************


सुरंग अंततः एक विशाल बगीचे में जाकर खुली। वहां सुबह हो रही थी। बड़े बड़े दरख़्त हवा के मद्धम झोंकों में झूम रहे थे। हवा में इत्र सा घुला हुआ था। 

कुछ बूढ़ी और अधेड़ औरतें शरीर को तंदुरुस्त बनाए रखने के उपक्रम में जुटी थीं। कोई जॉग कर रही थी तो कोई ब्रिस्क वॉक तो कोई योगा। लेकिन मर्द एक भी नहीं । बलभद्दर को आश्चर्य हुआ।


वह अब थका हुआ महसूस कर रहा था। नींद भी आ रही थी। एक बोतल दारू और रात भर का जागरण अब भारी हो रहा था। वह बहुत धीमे धीमे चल प रहा था। लेकिन पब से उसके साथ आई युवती आगे निकल गई थी। उसने आवाज़ लगाई, "ज़रा सुनो, देवी जी..मैं चल नहीं पा रहा...ज़रा रुको तो"


आवाज़ सुनकर युवती ने पीछे मुड़कर देखा। मुस्कराई। फिर खिलखिलाई। मगर रुकी नहीं। उलटे रफ़्तार बढ़ा दी। 


बलभद्दर को उसे दौड़ कर रोकना पड़ा। हांफ़ते हांफ़ते बोला, "देवी जी, यहां तक लाई हो.... साथ तो न छोड़ो।"


"न बाबू न। हमारा साथ यहीं तक था। मुझसे तो रामकली ने कहा था सो मैं यहां तक ले आई।"


"रामकली ने?" वह कांप उठा। 


"हंजी, तुम्हारी अपनी रामकली ने।" वह रहस्यमय ढंग से मुस्कुराई।


"क्या कहा था?"


"कहा था कि मेरे बल्लू को जन्नत में छोड़ देना। बस छोड़ने को कहा था। न कि सैर कराने को।" इतना कहकर वह आगे चल दी।


बलभद्दर ने हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया। "यह जन्नत है?....क्या मैं मर चुका हूं!" उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। 


"नहीं, तुम अभी मरे नहीं हो।" वह मुस्कुराई, "मर्द अभी मरे नहीं हैं। मर ज़रूर रहे हैं। तिल तिल कर। जब तुम्हारी बच्ची गर्भ में मार दी जाती है, तुम थोड़ा सा मर जाते हो। जब तुम अपनी बहू को जलाते हो तब भी थोड़ा सा मर जाते हो। जब तुम किसी का बलात्कार करते हो, तब भी मर जाते हो।" 


"मगर मैंने तो ऐसा कभी नहीं किया..." वह बिसूरते हुए बोला।


"क्षुद्र बुद्धि बलभद्दर! तूने न किया होगा, मगर है तो मर्द ही। सब तेरी जानकारी में तो होता है। अब भुगतना तो पड़ेगा ही।"


"ठीक है, भुगत लूंगा..." शीतल, सुगंधित पवन झकोरों ने उसे कुछ चैतन्य कर दिया था। उसे अच्छा महसूस हो रहा था। कामनाएं जागने लगी थीं। उसने चारों ओर नज़र दौड़ाईं और बोला, "इस जन्नत में लैवेंडर, हिना, संदल, बेला आदि तो खूब ग़मक रहा है लेकिन इन खुशबुओं को लगाने वाली कहां हैं?"


"क्यों, हैं तो ये जॉगिंग, वॉकिंग करती महिलाएं। इन्हीं का पसीना ही तो महक रहा है।"


"तुम औरतें मर्द का मन नहीं समझतीं। बताओ तुम कहती हो यह जन्नत है। जन्नत ऐसी होती है?"


"फिर कैसी होती है?"


"जन्नत बूढ़ी औरतों से नहीं बनती।"


"फिर किससे बनती है? तुम लोग तो बूढ़ी मां के कदमों में जन्नत पा लेते हो!"


"देखो देवी जी, बात को घुमाओ नहीं। जन्नत यानी स्वर्ग में हूरें होती हैं। कुंवारी। अप्सराएं होती हैं। वो क्या नाम हैं रंभा, उर्वशी, मेनका...भले ही मैं बुद्धू लगता होऊं लेकिन दीनधर्म के प्रवचन खूब सुने हैं।"


बलभद्दर की बात सुन युवती ठहाका मार कर हंस पड़ी। देर तक हंसती रही। फिर बोली, "इस जन्नत में  कुंवारी हूरें नहीं, छोरे मिलते हैं। वह भी घंटों के रेट से। सरकार देती है किराए पर।" वह फिर हंसने लगी।


"हद है! कितना पापमय है यह स्वर्ग!! आदमी को कोठे पर बिठा दिया!!!"


"कोठे पर नहीं, स्टड फार्म में।"


"यह क्या होता है?" बलभद्दर ने यह शब्द ही नहीं सुना था


"हॉर्स ब्रीडिंग सुना है?"


"गुड। इस स्टड फार्म में उन्नत नस्ल की स्त्रियां और पुरुष ब्रीड किए जाते हैं। थॉरो ब्रेड।"


"यह कैसी जन्नत है?...जहां आदमी को पेशा करना पड़ता हो।"


"यह वो जन्नत नहीं, जो मरने के बाद मिलती है। यह 500 साल बाद वाली भविष्य की दुनिया है जहां मैं तुमको ले आई हूं। उस दुनिया में आज की तारीख है 19 अप्रैल 2025 और आज यहां की तारीख है 19 अप्रैल 2525...इसी भविष्य की दुनिया को हम औरतें जन्नत कहती हैं।"


इतना कह कर युवती फिर भाग पड़ी। बलभद्दर पीछे दौड़ पड़ा।

*****************************

अगली किस्त में हम वर्ष 2525 की दुनिया को एक्सप्लोर करेंगे। तब तक आप स्टड फार्म के जीवन की कल्पना करें। न कर पाएं तो गूगल करें 😊 


Diane translation

 

I loved your Allegiance poem. I translated it into English in my free way, taking liberties. Then I translated it back into English via AI tool GROK. Have a look and tell me if I can post it under your name.



Today, I declare
to my husband,
my 80-year-old husband,
my complete devotion, my fidelity.

He is the gardener of the orchard,
whose words
make tulip flowers bloom,
whose touch
sprouts seeds into life,
and makes buds blossom.

Clusters of vibrant tomatoes
adorn the branches,
hyacinths begin to bloom and spread fragrance,
and when the cool breeze flows,
alyssum and zinnia flowers
scatter color and scent through the air.

My heart brims with joy,
swells with respect,
seeing this gardener’s stubborn love
for the earth.

Today, I proclaim,
I love you,
my gardener,
I love you 100 percent.

आज मैं अपने पति के प्रति
अपने 80 साल के पति के प्रति
संपूर्ण निष्ठा की, वफ़ा की
घोषणा करती हूं
जो बगिया का माली है
जिसके शब्दों से
झरते हैं ट्यूलिप के फूल
जिसकी छुअन से बीज
अंकुरित हो उठते हैं
और खिल जाती हैं कलियां
सज उठते हैं डालियों पर
सुर्ख टमाटरों के गुच्छे
गुल खिलाने महकाने लगते हैं
हायसिंथ
जब शीतल पवन को पीकर
ऐलिसन और ज़िनिया के फूल
वातावरण में बिखरा देते हैं
रंग और खुशबू
मेरा मन पुलक से भर उठता है
सम्मान से भर उठता है
धरती के साथ
इस माली का प्यार देखकर
आज मैं घोषणा करती हु
आय लव यू
मेरे माली
लव यू 100 पर सेंट