बापू की हत्या का बदला
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हैमलेट में
'जियूं या मर जाऊं' के सवाल में उलझे
नायक के आगे जैसे आता है
भूत उसके बाप का
वैसे ही
दुःस्वप्नों में सिहरती मेरी नींद के बीच आता है
भूत बापू का
चंट सियारों की हुआ हुआ, और
पराया शिकार टोहते लकड़बग्घों की हंसी
और, उल्लू की अशुभ, डरावनी चीखों से भरे
मेरे डरावने सपने के बीच
दुलार भरी थपकी देकर
बापू मेरे कान में खुसफुसाते हैं
अपने क़ातिल का नाम
"यह नाम गलत है, बापू"
मैं प्रतिवाद करता हूं
"मैंने इतिहास पढ़ा है
गोली मारने वाले का नाम
जानता हूं...फांसी मिल चुकी है उसे
आपने तो उस युवक को देखा था
फिर झूठ क्यों..?"
बापू मुस्कराते हैं
"बच्चा था वह युवक
अबोध...था
बरेटा पिस्टल जैसा
बुद्धिहीन
आत्मघाती, जैसे कि अजमल क़साब.."
बापू फिर मुस्कराए, बोले
"तुम असली क़ातिल को याद रखो
ट्रिगर दबाने वाले लड़के को भूल जाओ
वह तो स्वर्ग में प्रार्थना सभा में आता है
क़साब के साथ, रोज़ शाम
और मेरे साथ गाता है
ईश्वर अल्ला तेरो नाम...
"मगर आपने तो क़ातिल का नाम
नफ़रत बताया है!...उसे कैसे मारूं?"
बापू मुस्करा कर बोले
"प्यार से"
"किससे प्यार करूं"
"सच्चाई से"
"लेकिन सच्चाई का बाप मुझे गोली मार देगा"
"मैं वही चाहता हूं...तुम मरोगे
तो मैं जिऊंगा"
सपना टूट गया है
मैं जाग गया हूं
मुझे साफ दिख रहा है
मेरे सामने
जियूं या मरूं
जैसा कोई ऊहापोह नहीं
मेरे पास बापू का मंत्र है
प्यार
मुझे मालूम है
कातिल को वार से नहीं
प्यार से डर लगता है
नफ़रत को
प्यार से डर लगता है
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