हम हैं फूल हमारा मजहब हंसना, महकाना, सरसाना।
तुम हो कौन तुम्हारा मजहब क्यों धरती में आग लगाना।।
हमने डायनासुर देखे हैं तुम जिनके फॉसिल चुनते हो।
खशबू की सौं हमने देखा बड़े बड़ों का आना-जाना।।
पूजे है अवतार पयम्बर तुझसे भी ज़्यादा हमने।
धर्म हमारा खुशबू वाला ना बदला तो ना बदला ना।।
गंगा बैतरणी कर डाली फाड़ा तूने नील गगन।
यह जग कितना सुंदर होता जो तू पैदा ही होता ना।।