चिट्ठी का सफर
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वो भी क्या दिन थे, जब
ख़त के संग
लिफाफे में
आत्मा भी बंद हो जाती थी
और, निकल जाती थी
लंबे सफ़र पर
भेजती रहती थी
शरीर को सफ़र का ब्योरा
...पूरी रात लाल डिब्बे में गुज़री..
..अब बड़े डाकखाने में हूं...
...अब बंबई की ट्रेन में...
...कालपी आने वाला है, मीठी गुझिया वाला
...गाड़ी जमुना जी को पार कर रही है
... लो उरई भी निकल गया
... अब झांसी गुजरा...
...आगे है बबीना, छावनी...
...ललितपुर भी हुआ पार ...
... ये निकला बीना ...
...और विदिशा...
...और सांची...
....भोपाल स्टेशन पर उतार दिया गया हूं
...आरएमएस में कट रही है रात
...सॉर्टिंग के बाद फिर डाकिए के बैग में हूं
... लो पहुंच गया बरखेड़ा डाकखाने में
...और अब चला गंतव्य को
... दरवाज़े पर ही खड़ा है पाने वाला
डाकिया मुस्कुराता है
पाने वाला चिट्ठी ले कर भाग जाता है
बंद कमरे में खुल गई चिट्ठी
खुशबुओं से भरी हुई चिट्ठी
आंसुओ में नहा रही चिट्ठी
रेडियो पर गा रही है प्रीति सागर
...मेरे खत का जवाब आया है
चांद नजरों में मुस्कुराया है...